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ध्यान का पहला सोपान है चिंतन

आचार्य महाप्रज्ञ

28th December 2015

जहां ज्ञान चंचलता से मुक्त होगा, वहां वह ध्यान बन जाएगा। सस्पंदनं ज्ञानम्ï- अर्थात्ï चंचलता ज्ञान है। निस्पंदनं ध्यान- अर्थात अचंचलता ध्यान है। जहां स्पंदन है, वह ज्ञान और निस्पंदन है, वह ज्ञान ध्यान है।

ध्यान का पहला सोपान है चिंतन

मनुष्य के विकास के दो महत्त्वपूर्ण स्थान हैं- 'ज्ञान और ध्यान। शेष सभी प्राणियों से मनुष्य की अतिरिक्ता इन दो के द्वारा होती है। मनुष्य ने पहले ज्ञान का विकास किया है और बाद में ध्यान का। उसकी ये दो अतिरिक्त शक्तियां हैं। वास्तव में ज्ञान और ध्यान दो नहीं, एक ही हैं। ज्ञान का नाम ही ध्यान है और जहां ध्यान है वहां ज्ञान है। अगर ध्यान है और ज्ञान नहीं है तो वह मूर्खता है। ज्ञान जरूरी है। कभी-कभी यह तो हो सकता है कि ज्ञान है पर ध्यान नहीं है, क्योंकि जहां ज्ञान होता है, वहां चंचलता होती है। वह ज्ञान पर अधिकार कर लेती है। वहां केवल ज्ञान रहता है, ध्यान नहीं होता। जहां ज्ञान चंचलता से मुक्त होगा, वहां वह ध्यान बन जाएगा। सस्पंदनं ज्ञानम्ï- अर्थात्ï चंचलता ज्ञान है। निस्पंदनं ध्यान- अर्थात अचंचलता ध्यान है। जहां स्पंदन है, वह ज्ञान और निस्पंदन है, वह ज्ञान ध्यान है।

चंचलता के कारण ज्ञान समस्याएं पैदा करता है। मनुष्य में आसक्ति है, द्वेष है, क्योंकि चंचलता जुड़ी हुई है। चंचलता को कम कर एकाग्रता को प्राप्त करना, यह है ध्यान का विकास। इसका अर्थ है चिन्तन। ध्यान शब्द 'ध्येयं चिंतायाम्ï धातु से बनता है। इसका मूल अर्थ है चिन्तन करना। यह ध्यान का पहला सोपान है। आदमी चिन्तन करना जानता है तथा चिन्तन करना ही मानव-विकास का पुष्टï आधार है। जिसमें चिन्तन नहीं होता, वह आदमी बनकर भी पशु की तुलना में चला जाता है। पर ध्यान का अर्थ केवल चिंतन करन ही नहीं। ध्यान का अर्थ चिंतन ही होता तो ध्यान-शिविरों में कौन आता? चिंतन की पद्धतियों को वैज्ञानिक ढंग से सिखाने वाले संस्थान हैं, विद्यालय हैं, विश्वविद्यालय हैं। विद्या की एक शाखा है- थिंकिंग। उसका बहुत विकास हुआ है। इसकी तीन अवस्थाएं हैं- पहली है चिंतन करने की क्षमता का होना। दूसरी है चिन्तन में विराम का न होना। तीसरी है चिन्तन की क्षमता होने पर भी अचिन्तन की स्थिति में रहना। इसका नाम है ध्यान, ध्यान की अग्रिम अवस्था।

प्रश्न है कि जब चिन्तन से हमारी जीवन-यात्रा सुगमता से चल जाती है, तब अचिन्तन के प्रपंच में क्यों फंसा जाए? चिन्तन चंचलता को बढ़ाता है। वह चक्र इतना तीव्र हो जाता है कि विचार बन्द ही नहीं होते। परेशानी बढ़ती है, इसलिए विचारों को विराम देना जरूरी होता है। हमारी लिपि में अद्र्ध-विराम, पूर्ण-विराम का विकास हुआ। विराम नहीं होता तो पढऩे वाला कुछ भी समझ नहीं पाता। सारा एकाकार हो जाता। विराम है, इसलिए इस भाषा को समझ सकते हैं। बोलने में भी विराम होता है। अन्यथा बात कोई समझ में नहीं आ पाती।

आश्चर्य है कि हमारे चिन्तन में कोई विराम नहीं है। यह चिन्तन इसीलिए दुश्चिन्तन बन गया है। विराम का चिन्तन, चिन्तन है। अविराम का चिन्तन, चिन्तन नहीं होता। मनुष्य में आसक्ति की तीव्रता, मूच्र्छा आदि का कारण है 'चंचलता। इस चंचलता ने आसक्ति और मूच्र्छा को इतना तीव्र कर डाला कि आदमी का यथार्थ बोध ही नष्टï हो गया। यथार्थ बोध के नष्टï होने पर आदमी अपने चारों ओर समस्याओं का ताना-बाना बुन लेता है, दुखों का जाल बिछा लेता है। आदमी यथार्थ को यथार्थ नहीं मानता। शरीर केवल शरीर है। कपड़ा केवल कपड़ा है। भोजन केवल भोजन है। आदमी इन सबको ऐसा कहां मानता है? यदि भोजन को केवल भोजन मानता तो स्वादिष्टï होने पर भी अधिक नहीं खाता। उसमें तब स्वादिष्टï-अस्वादिष्टï की बात नहीं होती।

स्वादिष्टï-अस्वादिष्ट का तर्क उसी में पैदा होता है जो भोजन को केवल भोजन नहीं मानता, और कुछ मानता है। पदार्थ हमारे लिए केवल पदार्थ नहीं है। यदि पदार्थ होता तो उस नश्वर के प्रति हमारी आसक्ति नहीं जुड़ती। यह सारा काम चंचलता कर रही है। यथार्थता पर आवरण डालती है चंचलता। तब शरीर, शरीर मात्र नहीं रहता, जन्म केवल जन्म नहीं है, मृत्यु, मृत्यु नहीं है। यदि उसे थथार्थ बोध होता तो वह मृत्यु से नहीं डरता और जीने का मोह नहीं करता। यथार्थ, यथार्थ होता है। न उनके साथ राग होता है और न मोह, न द्वेष और न घृणा। यथार्थ बोध होने पर दृष्टिï दोष मिट जाते हैं।

ध्यान यथार्थ की चेतना को जगाने का एक माध्यम है। जैसे-जैसे यथार्थ की चेतना जागेगी, वैसे-वैसे आसक्ति और मूच्र्छा टूटती जाएगी। आसक्ति के कारण मनुष्य कितना मिथ्या अभिमान करता है, दूसरों को कितना धोखा देता है?

आदमी आसक्ति के कारण धोखा देता है, क्रूर कर्म करता है, क्रूर व्यवहार करता है। आसक्ति और अयथार्थ-बोध होगा तो आसक्ति होगी। अनासक्ति की बात तब तक नहीं सोची जा सकती, जब तक सम्यकदर्शन न हो जाए। यथार्थ-बोध के लिए ध्यान और यथार्थ तथ्यों की जानकारी जरूरी है। सूक्ष्म सत्यों को जानने के लिए पढऩे से बुद्धि का विकास हो सकता है, पर प्रज्ञा का विकास नहीं हो सकता। प्रज्ञा के बिना सूक्ष्म सत्य नहीं जाने जा सकते। आदमी स्थूल सत्यों में उलझ जाता है। उसकी स्थूल जानकारी उसे सत्य का दर्शन नहीं होने देती। जब सूक्ष्म सत्यों की ओर एकाग्रता बढ़ेगी तो प्रज्ञा जागेगी। जब मन की एकाग्रता और चित्त की निर्मलता बढ़ती है, तब सूक्ष्म सत्यों का स्पष्टï अनुभव होने लगता है।

वैज्ञानिक को भी बहुत एकाग्र होना पड़ता है तभी वह नये-नये अन्वेषण कर पाता है। उसे ध्यानी बनना पड़ता है। ध्यान में गये बिना वह सूक्ष्म सत्य नहीं खोज सकता। उसने उपकरणो का विकास किया है, पर केवल उपकरणों से ही काम नहीं होते। वे तो मात्र साधन हैं, माध्यम हैं। वैज्ञानिक की तन्मयता को वे सहारा दे सकते हैं। मुख्य बात है एकाग्रता। उसे भी ज्ञान की भूमिका से हटकर ध्यान की भूमिका में जाना पड़ता है।

विज्ञान ने ऐसे सूक्ष्म सत्यों का पता लगाया है जो ध्यान के लिए भी बहुत उपयोगी हैं। विज्ञान अनेक दिशाओं में काम कर रहा है। यह न माने कि उसने केवल विध्वंस के साधनों की खोज की है। उसने अध्यात्म की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण खोजें की हैं। उसकी मस्तिष्क संबंधी खोजें अपूर्व हैं।

वैज्ञानिकों ने माना कि श्वास का और मस्तिष्क का गहरा संबंध है। लयबद्ध श्वास से मस्तिष्क में अल्फा तरंगें उत्पन्न होती हैं। वैज्ञानिकों ने इस बात पर मुहर लगा दी कि प्राणी का स्वरचक्र बदलता रहता है और उसके साथ ही साथ व्यक्ति भी बदलता है। मूड बदलता है। मूड के बनने-बिगडऩे के पीछे स्वर या श्वास का योग होता है। मस्तिष्क का योग होता है। जिस समय मस्तिष्क संतुलित होता है, स्वर ठीक चलता है तो मूड ठीक होता है। स्वर-विज्ञान भारत की समृद्ध विद्या है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसको आगे बढ़ाया है आज विज्ञान इसमें नए-नए तथ्य जोड़ रहा है।

बुद्धि की अगली भूमिका है 'प्रज्ञा जागे। सारा संसार इन्द्रिय-चेतना, मन की चेतना और बुद्धि की चेतना में अटका हुआ है। इसे ही वह अंतिम मानता है। वह प्रज्ञा को जगाना चाहता नहीं या जानता नहीं। प्रज्ञा के जागे बिना बुद्धि बहुत काम नहीं देती। निर्णय के लिए अन्तर्दृष्टिï या प्रज्ञा आवश्यक होती है। बुद्धि के साथ आसक्ति और मूच्र्छा जुड़ी है। जहां ये दोनों हैं, वहां पक्षपात रहता है। इसको टाला नहीं जा सकता। पक्षपात चाहे परिवार में हो, समाज में हो या राष्टï्रीय स्तर पर हो, इसके पीछे आसक्ति काम करती है।

पक्षपात होना आश्चर्य नहीं है। यह आसक्ति और मोह का निश्चित परिणाम है। मोह और चंचलता युक्त बुद्धि का अनिवार्य परिणाम है 'पक्षपात। हमें बुरा नहीं मानना है। बुरा मानते हैं तो भ्रान्ति है। जब तक यह भ्रान्ति नहीं टूटेगी, प्रज्ञा का जागरण नहीं होगा। जब तक हमारी चेतना आसक्ति और मूच्र्छा से विमुक्त नहीं होगी, प्रज्ञा नहीं जागेगी।

सारी एकाग्रता वांछनीय नहीं होती। एकाग्रता अवांछनीय भी होती है। बगुले की एकाग्रता किस काम की? एकाग्रता वोट और नोट गिनने में भी होती है। हमें जानना है कि एकाग्रता कहां हो? आसक्ति और मूच्र्छा-शून्य एकाग्रता प्रशस्य होती है, पवित्र होती है। यदि हमारे सामने चित्तशुद्धि या चेतना को निर्मल बनाने का उद्देश्य नहीं है तो एकाग्रता कामचलाऊ बनकर रह जाएगी, अधिक कारगर नहीं होगी। वह एकाग्रता वांछनीय है, जो प्रज्ञा को जगा सके, चित्त और चेतना को पवित्र बना सके।

निष्कर्ष की भाषा में कहा जा सकता है, दुखचक्र से मुक्त होने तथा कार्य की पवित्रता के लिए अनासक्ति का होना जरूरी है। अनासक्ति के लिए यथार्थ-बोध का और यथार्थ-बोध के लिए प्रज्ञा का जागरण जरूरी है। प्रज्ञा-जागरण के लिए ध्यान जरूरी है।

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