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ध्यान मुक्त हो जाने की कला है- श्री श्री रविशंकर

ऋचा कुलश्रेष्ठ

1st January 2016

जब मन शांत हो जाता है, तब ध्यान व पूर्ण विश्राम की अवस्था आती है। जब तुम्हारे अन्दर अशांति होती है, , भविष्य के प्रति आशंका होती है, योजनाएं होती हैं, महत्वाकांक्षाएं होती हैं और तुम बिस्तर पर सोने के लिए प्रयास करते हो, तो गहरी नींद नहीं आती। ऐसे में मन पूरी तरह खाली नहीं हो पाता है, मुक्त नहीं हो पाता है। सच्चे अर्थ में मुक्त होने से तात्पर्य है, भविष्य एवं विगत से मुक्ति।

ध्यान मुक्त हो जाने की कला है- श्री श्री रविशंकर

ध्यान को कैसे परिभाषित किया जा सकता है? वर्तमान क्षण में पूरी तरह सजग मन ही ध्यान की अवस्था है। ऐसा मन जो अपना अस्तित्व भुला दे, ध्यान की अवस्था में होता है। बेझिझक व अगले पल होने वाली घटना की आशंका से मुक्त मन ही ध्यान की अवस्था में होता है। मन जो मूल स्रोत से जुड़ा है, वही ध्यान की अवस्था है।

विश्राम की अवस्था में तुम पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हो। यह निष्क्रियता तुम्हारी स्वयं के वश में क्रियाओं के प्रति होती है, लेकिन वह क्रियाएं जो तुम्हारे वश में नहीं हैं, जैसे कि सांस लेना, हृदय का धड़कना, पाचन तंत्र की कार्य प्रणाली, रक्त प्रवाह इत्यादि, ये सभी क्रियाशील रहती हैं। जब केवल यही क्रियाएं चलती हैं और अन्य सभी क्रियाएं जैसे कि चलना, बातचीत करना इत्यादि समाप्त हो जाती है तब विश्राम की अवस्था आती है। यही निद्रा की अवस्था भी है।

जब मन शांत हो जाता है, तब ध्यान व पूर्ण विश्राम की अवस्था आती है। जब तुम्हारे अन्दर अशांति होती है, इच्छाएं होती हैं, भविष्य के प्रति आशंका होती है, योजनाएं होती हैं, महत्वाकांक्षाएं होती हैं और इस अवस्था में तुम बिस्तर पर सोने के लिए प्रयास करते हो, तो गहरी नींद नहीं आती। ऐसे में मन पूरी तरह खाली नहीं हो पाता है, मुक्त नहीं हो पाता है। सच्चे अर्थ में मुक्त होने से तात्पर्य है, भविष्य एवं विगत से मुक्ति।

जब तुम वर्तमान क्षण में सुखी नहीं होते हो तो तुम बेहतर भविष्य की इच्छा मन में रखते हो। मन में इच्छा होने का अर्थ है कि तुम वर्तमान से संतुष्टï नहीं हो। यही तनाव का कारण बनता है। ऐसे में ध्यान संभव है ही नहीं। सिर्फ आंखें बंद करके बैठने से ही ध्यान नहीं होता है। इच्छाओं के साथ ध्यान संभव नहीं है।

ध्यान, केंन्द्रित करने का अर्थ है- वर्तमान में पूरी तरह संतुष्टि जो सबसे ऊपर है, उसकी ओर ध्यान, स्थिरता एवं शांत अवस्था। जब तुम शांत हो तब तुम ध्यान में हो। बिना शांत हुए ध्यान संभव नहीं है। जब ध्यान केंन्द्रित होता है तब मन शांत होता है। अन्यथा मन इधर-उधर भागता रहता है।

जब तक तुम्हारे मन में इच्छाएं उठती रहेंगी तब तक तुम्हारा मन पूर्ण रूप से शांत नहीं हो पायेगा। इन इच्छाओं का अच्छी तरह से निरीक्षण करो। यह इच्छाएं किसलिए हैं? परिपक्व दृष्टिïकोण से यह इच्छाएं तुच्छ प्रतीत होती हैं। परिपक्वता ही भेद करने की क्षमता उत्पन्न करती है। भेद करने का अर्थ है यह समझना कि इच्छाओं का कोई महत्त्व नहीं है। इच्छाओं से मुक्ति पाने का एक और तरीका है कि तुम इतनी बड़ी इच्छा करो कि तुम्हें उसके बारे में कोई चिन्ता न रहे। बालू का एक कण आंख में किरकिरी पैदा कर सकता है, लेकिन एक बड़ा पत्थर तुम्हारी आंख में प्रवेश नहीं कर सकता। छोटी-छोटी बातें ज्यादातर दुख का कारण बनती हैं।

गीता में कहा गया है कि तुम तब तक योग नहीं कर सीख सकते जब तक कि तुम इच्छाओं का परित्याग नहीं करते। इच्छाओं से जुड़े रहने पर मन स्थिर नहीं हो पाता है। जितनी अधिक व्यग्रता किसी भी चीज को लेकर रहेगी, उतनी ही अधिक कठिनाई विश्राम पाने में महसूस होगी। सोने के पहले जब तुम सारी चिन्ताएं छोड़ देते हो, तभी अच्छी नींद आती है।

यह विधि तुम जाग्रत अवस्था में भी अपना सकते हो। कम से कम जब ध्यान की अवस्था में बैठो तो अपने आपको सारी इच्छाओं से मुक्त कर लो। एक तरीका इसके लिए है कि ऐसा विचार करो कि सारा संसार लुप्त हो रहा है व सभी कुछ समाप्त हो रहा है। जब तक तुम अपने को पूरी तरह से खाली नहीं कर देते तब तक तुम ध्यान नहीं कर पाओगे। कई बार मृत्यु के बाद भी आत्मा भटकती रहती है। बुद्धिमान वही है, जिसका मन जीवित अवस्था में स्थिर है।

जीवन में सच्चे आनन्द का अनुभव केवल अन्दर की गहराई में संभव है। जब तुम सारी भावनाओं से मुक्त होकर, इच्छाओं से परे होकर एकाग्र मन से बैठते हो तो इसे ही ध्यान की अवस्था कहते हैं। निष्क्रिय अवस्था में तटस्थ भाव से बैठना ही ध्यान है। विश्राम की यह अवस्था, गहरी निद्रा से भी अधिक विश्रांति प्रदान करती है। निद्रा में भी तुम इच्छाओं से मुक्त नहीं हो पाते जबकि ध्यान में तुम सारी इच्छाओं से परे होते हो। मन को यह गहरी शांति देता है। ध्यान द्वारा तुम अपने मन और शरीर दोनों का नवीनीकरण कर पाते हो।

ध्यान का अर्थ है क्रोध से मुक्ति, पिछली सारी घटनाओं के प्रभाव से मुक्ति एवं भविष्य की सारी योजनाओं से मुक्ति। तुम कुछ भी योजना बनाओ, अंत में तुम्हें मृत्यु का वरण करना ही है। चाहे तुम सज्जन हो या दुर्जन, पापी हो या संत, धनवान हो या निर्धन, बुद्धिमान हो या मूर्ख, अंत में सभी की मृत्यु निश्चित है।

हमारी प्रवृत्ति है कि हम सुखद मनोभावों को छोड़कर दुखद भावनाओं से चिपक जाते हैं। निन्यान्वे प्रतिशत दुनिया यही करती है। परंतु ध्यान द्वारा जब चेतना मुक्त और संवर्धित होती है तब नकारात्मक मनोभावों को पकड़े रखने की प्रवृत्ति सहज ही मिट जाती है। हम वर्तमान क्षण में जीना शुरू कर देते हैं और इस काबिल हो जाते हैं कि अपने अतीत से मुक्त हो सकें।

लोग कितने ही अच्छे क्यों न हों किसी भी रिश्ते में गलतफहमियां पैदा हो ही जाती हैं। यहां तक कि एक छोटी सी गलतफहमी हमारी भावनाओं को विकृत करके नकारात्मक रुख ले सकती है। परंतु यदि हम अपने आप को मुक्त कर सकें और चेतना की प्रत्येक क्षण के वैभव में मस्त हो जाने की क्षमता पर केन्द्रित हो सकें तो इससे हमारा बचाव हो सकता है। यह सत्य उजागर होता है कि प्रत्येक क्षण हमारे विकास में सहायक है। चेतना की उच्चतर अवस्था को प्राप्त करने के लिये किसी जटिल उपाय की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति को सिर्फ मुक्त हो जाने की कला सीखने की जरूरत है और यही ध्यान है।

ध्यान है अतीत और अतीत की घटनाओं के प्रति क्रोध से मुक्त हो जाना तथा भविष्य के लिए योजनाओं को छोड़ देना। जब तुम योजनाएं बुनते हो तो वह तुम्हें स्वयं की गहराई में डूबने से रोकता है। वर्तमान क्षण को स्वीकार करना और प्रत्येक क्षण को पूरी गहराई से जीना ध्यान है। बस यह समझ और कुछ दिनों तक लगातार ध्यान के अभ्यास से तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता में बदलाव आ सकता है।

ध्यान आनंद, पूर्ण संतुष्टि और वृहत्तर अंतरज्ञान की ओर ले जाता है। दैनंदिन जीवन में ध्यान के एकीकरण से चेतना के पांचवें स्तर, जिसे ब्रह्मांडीय चेतना कहा जाता है, का उदय होता है। ब्रह्मांडीय चेतना का अर्थ है संपूर्ण ब्रह्मांड को अपना ही अंग समझना। जब हम पूरी दुनिया को अपना समझते हैं तो हमारे और संसार के बीच प्रेम शक्तिशाली रूप से प्रवाहित होता है। यह प्रेम हमें हमारे जीवन के विरोधाभासों और उपद्रवों को सहन करने में समर्थ बनाता है। क्रोध और मायूसी क्षणिक भावनाएं बन जाते हैं जो उत्पन्न होकर पल में छू मन्तर हो जाते हैं।

ज्ञान, समझ और अभ्यास का संगम जीवन को पूर्णता देता है। जब चेतना के उच्चतर स्तर तक तुम्हारा विकास होता है तो तुम पाते हो कि अलग अलग परिस्थितियों और उपद्रवों से अब तुम डगमगाते नहीं। तुम खूबसूरत तथापि शक्तिशाली बन जाते हो- एक सौम्य, कोमल सुन्दर फूल, जो जीवन के विभिन्न मूल्यों को बेशर्त अपनाने की क्षमता रखता है।

ध्यान एक बीज के समान है। जितने अधिक जतन से बीज को उगाया जायेगा उतना ही वह फलेगा तथा फूलेगा। ठीक उसी तरह जितना हम ध्यान में उतरने का अभ्यास करेंगे उतना ही यह हमारे शरीर और स्नायु तंत्र का संवर्धन करेगा। हमारे शारीरिक क्रिया धर्म परिवर्तन से गुजरते हैं और शरीर के प्रत्येक कोश में प्राण का संचार होता है और जैसे जैसे शरीर में प्राण का स्तर उपर उठता है हम खुशी से लबालब भर जाते हैं।

ध्यान करते समय तीन नियमों को याद रखना है- मैं कुछ भी नहीं हूं (अकिचंन), मुझे किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं है (अचाह), और मैं कुछ भी नहीं करने जा रहा हूं (अप्रयत्न)। यदि तुम्हारे पास ये तीनों गुण हैं तो तुम ध्यान में उतर सकोगे। अतीत और अतीत की घटनाओं के प्रति क्रोध तथा भविष्य के लिए योजनाओं से मुक्त हो जाना ध्यान है। योजनाएं तुम्हें स्वयं की गहराई मे डूबने से रोकती हैं। वर्तमान क्षण को स्वीकार करना और प्रत्येक क्षण को पूरी गहराई से जीना ध्यान है

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