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ढक्कन तो है ही नहीं

शशि श्रीवास्तव

10th July 2017

ढक्कन तो है ही नहीं

बात बहुत पुरानी है। मेरा प्यारा भतीजा पंकज बचपन में बहुत प्यारी-प्यारी बातें किया करता था। एक दिन उसे हर थोड़ी देर में बाथरूम जाना पड़ रहा था। उस समय उसे अपनी पेंट खोलने और बंद करने में दिक्कत होती थी। वो हर बार अपनी आया से सू-सू करवाने के लिए ले जाने को कहता था। आया बार-बार जाने से बोर हो गई थी, इसीलिए जब थोड़ी देर बाद पंकज फिर से उसके पास पहुंचा तो उसने झल्लाकर कहा, 'क्या भैया, आप भी बार-बार सू-सू जाते हैं, थोड़ी देर रोक नहीं सकते क्या? आया की बात सुनते ही पंकज ने बड़ी मासूमियत से कहा, 'क्या करें मौसी, उसमें ढक्कन तो है ही नहीं। उसकी मासूमियत से कही बात सुनकर सब हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए। दुर्भाग्य से आज पंकज हमारे बीच नहीं है पर दिन में कई-कई बार मुझे उसके बचपन की बातें कभी हंसा तो कभी रुला जाती हैं।

 

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