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पहाड़ों में है मां वैष्णो का धाम, जानिए कब, कैसे करें यात्रा

गृहलक्ष्मी टीम

11th April 2016

पहाड़ों में है मां वैष्णो का धाम, जानिए कब, कैसे करें यात्रा

 

असमर्थ को समर्थ करने वाली शक्ति को मां के नाम से जाना जाता है। भारतीय दर्शन प्रभु के निराकार रूप को ही शिव एवं शक्ति के साकार रूप में मानता है। शक्ति की पूजा परंपरा हमारे देश में युगों-युगों से चली आ रही है। मानव कल्पना से परे की वह अदृश्य शक्ति, जिसे हम सदैव अपने आस-पास होने का एहसास करते हैं। ऐसी ही शक्ति वैष्णो देवी हैं। सिद्ध पीठ की मान्यता प्राप्त वैष्णो देवी तीर्थ महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।

 

कब जाएं?

वैसे तो यात्रा साल भर खुली रहती है पर नवरात्रों में यहां खूब भीड़ होती है।

कैसे जाएं?

वैष्णो देवी जाने के लिए जम्मू तक रेल व बस दोनों सुविधाएं हैं और कटरा तक बस सेवा उपलब्ध है। अब जम्मू से कटरा तक रेल भी चलने लगी है। निजी वाहनों से भी कटरा तक आया जा सकता है। जम्मू जो कटरा से 52 किमी दूर है, तक देश के हर भाग से रेल आती है। निकटतम हवाई अड्ïडा भी जम्मू है, जहां से सांझी छत तक हैलीकॉप्टर सेवा भी हर रोज चलती है।

कहां ठहरें?

कटरा में धर्मशालाएं व होटल हैं जबकि गुफा के पास व गुफा मार्ग में भी वैष्णो देवी बोर्ड द्वारा बनाई आधुनिक धर्मशालाएं व होटल हैं, जिनमें ठहरने की अच्छी व्यवस्था है।

 

कटरा से शुरू होती है यात्रा 

वैष्णो देवी की यात्रा कटरा नामक कस्बे से शुरू होती है, जो यात्रा का आधार शिविर है। यहां से श्रद्धालु पैदल या खच्चरों पर 15 किमी मार्ग की यात्रा के लिए निकलते हैं। इससे पहले यात्रियों को कटरा में पर्ची कटवानी पड़ती है, क्योंकि उसी नंबर के हिसाब से गुफा में प्रवेश मिलता है। कटरा से करीब ढाई कि.मी. दूर त्रिकूटा पर्वत के चरणों में बाण गंगा बहती है। यहां स्नान के बाद यात्री 'चरण पादुका’ के लिये रवाना होते हैं, जहां पर माता वैष्णो देवी के पांव के निशान आज भी अंकित हैं।

यहां दर्शन करके यात्री 'आदिकुमारी’ नामक स्थान के लिए आगे बढ़ते हैं। यह कटरा और भवन के मध्य का स्थान है, जहां आधी यात्रा पूर्ण हो जाती है। यहां पर 'गर्भ जून’ नामक गुफा है। यात्री इसमें से गुजरना अपना सौभाग्य समझते हैं। यहां से गुफा तक जाने के दो मार्ग हैं। एक परंपरागत तथा दूसरा नवीन एवं आसान मार्ग। फिर भी यात्री परंपरागत मार्ग से जाना पसंद करते हैं, क्योंकि 'हाथी मत्था’ की कठिन चढ़ाई ही यात्रा का सबसे स्मरणीय पल है। हाथी मत्था से सांझी छत का मार्ग तय करके यात्री पावन गुफा तक पहुंचते हैं।

 

 

गुफा के अन्दर पिण्डी दर्शन

इसके पश्चात्ï टोकन पर मिली संख्या से क्रमानुसार यात्री पंक्तिबद्ध होकर बैठ जाते हैं। पवित्र गुफा के अन्दर चमड़ेे की वस्तु एवं बीड़ी-सिगरेट आदि ले जाना वर्जित है। प्रवेश के लिए नई गुफा से ही मार्ग खोला ऌ गया है। पर प्राचीन गुफा के द्वार पर एक बड़ा पत्थर है जिसे भैरों का धड़ कहते हैं। उसी के ऊपर से लेटकर गुफा में प्रवेश करना होता था।

लगभग 18 मीटर लम्बी इस गुफा में प्रवेश करते ही नीचे शीतल जल की धारा पैरों को छूती है। पूरी गुफा में कहीं भी सीधे या सुविधानुसार खड़ा नहीं हुआ जा सकता। वास्तव में गुफा के आकार-प्रकार अथवा उसकी अन्दर की शोभा के ढंग को किसी भी प्रकार व्यक्त नहीं किया जा सकता, जिन्हें दर्शनों का सौभाग्य मिला है वे ही जान पाते हैं।

गुफा के अन्त में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली तीन भव्य-पिण्डियों के रूप में विराजमान हैं। कुछ लोग इन तीनों पिण्डियों में मध्यवाली को माता वैष्णोदेवी भी कहते हैं। यहां 4-5 व्यक्तियों के बैठने योग्य स्थान है। यहीं बैठे पुजारी भेंट आदि लेकर पूजन करवा देते हैं। दर्शन कर नई गुफा के रास्ते वापस आना होता है। दूसरी नई गुफा कुछ वर्ष पहले ही, यात्रियों के सुविधा से बाहर जाने के लिए, 'श्री माता वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड’ द्वारा बनवाई गई। इससे पूर्व 13 अप्रैल सन्ï 1977 को पहली नई गुफा का उद्ïघाटन माननीय डा. कर्ण सिंह जी द्वारा सम्पन्न हुआ था। बाहर आकर अधिकांश लोग कन्या पूजा करते हैं और हलवा पूरी आदि बांटते हैं।

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