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अमरनाथ यात्रा: प्राकृतिक नजारों से सजा है बाबा बर्फानी का दरबार

गृहलक्ष्मी टीम

25th April 2016

बाबा बर्फानी की यात्रा धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही लोगों को यहां मानसिक तौर भी बहुत शांति मिलती है। इसका कारण है यहां के रोचक और मनमोहक नजारे। यह धाम श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पूज्यनीय है। ऐसी मान्‍यता है कि यहां वही भक्त पहुंच पाता है, जिसे बाबा अमरनाथ अपने दरबार में बुलाते हैं। अमरनाथ यात्रा, को अमरत्व की यात्रा भी कहा जाता है।

अमरनाथ यात्रा: प्राकृतिक नजारों से सजा है बाबा बर्फानी का दरबार

 

अमरनाथ गुफा, हमारे राष्ट्र की संस्कृति, एकता एवं अखंडता का प्रतीक है। यहीं पर भगवान शंकर ने माता पार्वती को अमरकथा सुनाई थी। युगों पूर्व की अमरनाथ कथा सुनाने की गाथा की किवदंतियों से जुड़ी यह यात्रा इतनी अधिक रोमांचक है कि यहांआने वाला हर प्राणी प्रकृति के इस करिश्मे को देख कर दंग रह जाता है।

यात्रा का प्रथम पड़ाव पहलगांव

कहते हैं कि जब भगवान शिव माता पार्वती कोअमरकथा सुनाने के लिए चले तो सबसे पहले उन्होंने यहां अपनी सवारी नंदी बैल को छोड़ा था। पहलगांव को पहले बैलगांव कहा जाता था, जो बाद में धीरे-धीरे पहलगांव कहलाने लगा।

चन्दनवाड़ी

समुद्रतल से 95 सौ फीट की ऊंचाई और पहाड़ी नदियों के संगम की घाटी को चन्दनवाड़ी कहते हैं। पहलगांव से 16 किमी. दूर स्थित इस तल से यात्रा पर जाने वाले शिव भक्तों के लिए पैदल मार्ग प्रारंभ होता है। चन्दनवाड़ी के बारे में कहा जाता है कि अमरनाथ गुफा को जाते समय भोलेनाथ ने अपने मस्तक का चंदन उतार कर छोड़ा था। पर्वतों से आती जलधारा यहां आकर छोटी नदी का रूप धारण कर लेती है, जिसे पार कर आगे बढ़ना होता है।

पिस्सू घाटी

अमरनाथ यात्रा के इस पड़ाव पर पहुंचते ही यात्रियों की चाल पिस्सू जैसी हो जाती है, इसीलिए इसे पिस्सू घाटी के नाम से पुकारा जाता है। कहते हैं कि एक बार देव और राक्षस भोलेनाथ के दर्शनार्थ आए तथा पहले आगे बढ़ने की ईर्षा में युद्ध में उलझ गए। तब देवताओं ने युद्ध से हटकर भोलेनाथ से आग्रह किया और उनकी कृपा से देवताओं ने राक्षसों को मार-मार कर उनका चूर्ण बना दिया और वहां उनकी अस्थियों का ढेर लग गया।

 

 

शेषनाग झील

पहलगांव से 30 कि.मी. दूर शेषनाग नामक पड़ाव पर पहुंचते ही एक सुखद एहसास की अनुभूति होती है। यह स्थान जिसे शेषनाग सरोवर भी कहते हैं, झेलम नदी का उद्ïगम स्थल है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश नाम के तीन पर्वतों के मध्य बनीं झील के बारे में कहा जाता है कि यहां भोलेनाथ ने अमरनाथ गुफा को जाते समय गले में पहने शेषनाग को गले से उतार कर छोड़ दिया था। एक कथा के अनुसार शेषनाग ने एक बलशाली राक्षस को, जो देवताओं की मुसीबत बन गया था, अपना ग्रास बना लिया था। तभी से इस पर्वत का नाम शेषनाग पर्वत हो गया।

महागुणस पर्वत

महागुणस पर्वत, शेषनाग पड़ाव से आगे आता है, जिसकी सुंदरता को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। समुद्रतल से 14,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पर्वत को पार करने के लिए सिर्फ हौसला चाहिए। इस विशालकाय पर्वत, जो हरे और भूरे रंग का है तथा इसका आकार भी आश्चर्यजनक है। कहा जाता है कि भोलेनाथ ने यहां पर पुत्र गणेश को बिठा दिया था, जिसे पूर्व में महागणेश पर्वत या गणेश टॉप भी कहा जाता था।

पंचतरणी

यात्रा का तीसरा पड़ाव पंचतरणी है, जो शेषनाग से 12 कि.मी. यात्रा तय करने के बाद आता है। जहां पांच अलग-अलग धाराओं में बहती हुई पांच नदियां बहती हैं, जिन्हें पार करके यात्री आगे बढ़ते हैं। कहते हैं कि यहां पर भोलेनाथ ने गुफा को जाते समय नटराज स्वरूप धारण किया था। जब वह इस स्वरूप में नृत्य करने लगे तो उनकी जटाएं खुल गईं और गंगा पांच धाराओं में धरा पर बहने लगी।

 

 

अमरनाथ की पावन गुफा

संगम से आगे तीन कि.मी. का मार्ग एक बर्फीला मार्ग है, जहां न सिर्फ पर्वत हिमाच्छादित हैं, मगर पैदल चलने का मार्ग भी बर्फ के पुल से होकर जाता है। नीचे अमरावती नदी बहती है तो ऊपर बर्फ जमी हुई है, जिसके ऊपर से चलकर जाना होता है।बर्फानी शिवलिंग के दर्शन बिना किसी द्वार या प्रतिबंधों के, पर्वत के बीच बनी 60 फीट लंबी, तीस फीट चौड़ी और लगभग 15 फीट ऊंची ऊबड़-खाबड़ गुफा के अन्दर भगवान का प्रकृति द्वारा रचित हिमलिंग में प्रकट होना आश्चर्यजनक तो है ही, इससे भी बड़ा आश्चर्य है कि भगवान शिव का स्वरूप हिमलिंग और प्राकृतिक पीठ (हिम चबूतरा) पक्की बर्फ के हैं, जबकि गुफा के बाहर मीलों तक चारों ओर कच्ची बर्फ दिखाई देती है। इसी गुफा में बर्फ द्वारा निर्मित गणेश-पीठ पक्की बर्फ के हैं। इस गुफा में जहां-तहां बूंद-बूंद करके जल टपकता रहता है, जो यहां आने वालों को असीम आनन्द...असीम संतुष्टिï...असीम शांति और अनन्त प्रसन्नता की अनुभूति देता है।

ऐसे हुई थी इस गुफा की खोज

कहते हैं कि इस गुफा की खोज बूटा मालिक नाम के मुसलमान ने की थी, जो बकरियां चराते हुए यहां पहुंच गया था। उसी बूटा मलिक के वंशज आज भी यहां चढ़ने वाले चढ़ावे का हिस्सा प्राप्त करते हैं।



कब जाएं?

श्री अमरनाथ की यात्रा हर साल श्रावण पूर्णिमा से एक मास पहले जम्मू-कश्मीर सरकार की देखरेख में प्रारम्भ होती है (सन् 2007 से 2 माह पहले प्रारंभ होने लगी है) और इस अवसर पर सरकार व स्वयंसेवी संस्थाएं हर प्रकार का प्रबंध करती हैं। सर्दियों में सभी रास्ते बंद हो जाते हैं।

कैसे जाएं?

जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रमुख नगर जम्मू तक रेल से या निजी वाहनों से आया जा सकता है। जम्मू से श्रीनगर तक सिर्फ सड़क मार्ग से ही जाया जाता है। जम्मू तक ट्रेन, देश के हर बड़े नगर से आती है। निकटतम हवाई अड्ïडा श्रीनगर है। श्रीनगर से पंचतरणी-हेलीपैड तक हेलीकॉप्टर सेवा भी मिलती है।

कहां ठहरें?

श्रीनगर या पहलगांव में ठहरने के लिए हर स्तर के होटल हैं, जबकि बालटाल या शेषनाग, पंचतरणी और गुफा के पूरे मार्ग में ठहरने के लिए टेंट मिल जाते हैं।

 

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