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शक्तिदायक है गायत्री मंत्र का जाप, अनोखी है महिमा

गृहलक्ष्मी टीम

15th June 2016

शक्तिदायक है गायत्री मंत्र का जाप, अनोखी है महिमा

 

 

गायत्री मंत्र भारतीय संस्कृति का मेरुदंड और महापुरुषों का गुरु मंत्र है। प्राचीन ऋषि गुरु-दीक्षा में गायत्री मंत्र की ही दीक्षा देते थे, परन्तु कालान्तर में कथित पंडितों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। धर्म ग्रंथों में स्व-रचित श्लोकों को सम्मिलित कर जनमानस को भटकाया और गायत्री मंत्र स्त्रियों और शूद्रों को पढ़ने के लिए निषिद्ध कर दिया। जबकि किसी भी धर्म शास्त्र में किसी जाति विशेष को किसी भी मंत्र को पढऩे के लिए कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। मात्र वे धर्म शास्त्र ही प्रतिबंध की बात कहते हैं जो ऐसे स्वार्थी लोगों के द्वारा दूषित किए गए हैं जो समाज में स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी को प्रतिष्ठित नहीं देखना चाहते थे। अर्थात् वे नहीं चाहते थे कि उनके अलावा कोई और सम्मान प्राप्त करे।

धर्म ग्रंथों की रचना गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों के आधार पर हुई 24, 240, 2400 अथवा 24000 श्लोकों या मंत्रों में धर्म शास्त्र लिखा जाता था प्रत्येक मंत्र या श्लोक गायत्री के भावार्थ अथवा भाव से भीगा होता था। परन्तु धर्म ग्रंथों को सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि अधिकांश मंत्र मिलाए गए हैं। उनकी शैली एवं क्रम अलग है, उनमें कोई तारतम्य नहीं है ऐसी स्थिति तुलसी कृत रामायण में भी देखने को मिलती है और कहीं-कहीं एक ही ग्रंथ में आपस में विषय मतभेद नजर आता है।

गायत्री मंत्र की महिमा

सावित्रीत्र्च जपेन्निंत्यं पवित्राणी च भाक्तितत:।

अर्थात्- अपने को पापों से मुक्त करने के लिए यथा शक्ति सावित्री (गायत्री) मंत्र का जाप करना चाहिए। आपस्तवं स्मृति 5/5 में भी कहा गया है-

अहोरात्रन्तु गायत्र्या जपं कृत्वा विशुध्यति।

अर्थात्- दिन-रात गायत्री का जाप करके मनुष्य पापों से शुद्ध हो जाता है। गायत्री उपासना से पापों की निवृत्ति, सद्बुद्धि तथा सद्-विचार व श्रेष्ठता का विकास होता है। व्यक्ति का व्यक्तित्व परिष्कृत तथा प्रखर हो जाता है। उसे भौतिक तथा आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त होती हैं, अग्नि पुराण में कहा गया है-

ऐहिकामुण्मिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत्।

अर्थात्- गायत्री मंत्र का जाप करने वाले को सांसारिक और पारभौतिक समस्त सुख प्राप्त हो जाते हैं, देवता भी मनुष्य को सद्बुद्धि देकर, उसकी सहायता करते हैं। शास्त्रों में लिखा है-

न देवा दंडमादाय रक्षान्ति पशु पालवत्।
यं हि रक्षितुमिच्छन्ति वुद्धया संयोजयन्ति तम्॥

अर्थात्- देवता लाठी लेकर गोपाल की तरह किसी के पीछे-पीछे चलकर उसकी रक्षा नहीं करते, अपितु वे जिसकी रक्षा करने की इच्छा करते हैं उसे सद्बुद्धि व विवेक प्रदान कर देते हैं। वास्तव में बुद्धि ही ऐसा शस्त्र है जिससे स्वयं की तथा दूसरों की रक्षा की जा सकती है। बुद्धि हीन प्राणी ही जीवन के कष्टों की मार अधिक खाते हैं, बुद्धिमान वो ही नहीं हैं जो पढ़े-लिखे हैं। बुद्धिमान वो हैं जो विद्यावान हैं, जिनके हर कार्य में ईमानदारी, समझदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी होती है, जो बहुत सोच-समझकर कोई भी कार्य करते हैं।

जीवन में शान्ति, आनन्द, सुख, सौभाग्य, पाने के लिए बुद्धि का होना अति आवश्यक है और बुद्धि को श्रेष्ठ, महान, उत्तम बनाने वाला मंत्र गायत्री मंत्र ही है। गायत्री मंत्र की महिमा का वर्णन स्मृतियों में भी मिलता है।

सप्त कोटि महामंत्रा गायत्री नायका: स्मृता:।
आदिदेव मुपासन्ते गायत्री वेदमातरम्॥ 

अर्थात्- संपूर्ण देवगण जिस गायत्री मंत्र की उपासना करते हैं, वह गायत्री मंत्र सात करोड़ महामंत्रों में श्रेष्ठ है।

 

(साभार - शशिकांत सदैव, साधना पथ)

 

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