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जानिए क्या है तुलसी विवाह का महत्व और पूजन विधि

गृहलक्ष्मी टीम

30th October 2017

जानिए क्या है तुलसी विवाह का महत्व और पूजन विधि

 

भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व 'तुलसी विवाह' यानी हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन तुलसी पूजा और तुलसी विवाह करने का बड़ा ही महत्त्व है।

ऐसे होता है तुलसी का विवाह 

इस विवाह में मंडप, वर पूजा, कन्यादान, हवन और फिर प्रीतिभोज, सब कुछ पारम्परिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है। शालिग्राम वर और तुलसी कन्या की भूमिका में होती है। यह सारा आयोजन यजमान सपत्नीक मिलकर करते हैं। इस दिन तुलसी के पौधे को यानी लड़की को लाल चुनरी-ओढ़नी ओढ़ाई जाती है। तुलसी विवाह में सोलह शृंगार के सभी सामान चढ़ावे के लिए रखे जाते हैं। शालिग्राम को दोनों हाथों में लेकर यजमान लड़के के रूप में यानी भगवान विष्णु के रूप में और यजमान की पत्नी तुलसी के पौधे को दोनों हाथों में लेकर अग्नि के फेरे लेते हैं। विवाह के पश्चात प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है। कार्तिक मास में स्नान करने वाले स्त्रियाँ भी कार्तिक शुक्ल एकादशी को शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाती है। समस्त विधि विधान पूर्वक गाजे बाजे के साथ एक सुन्दर मण्डप के नीचे यह कार्य सम्पन्न होता है विवाह के स्त्रियाँ गीत तथा भजन गाती है -

मगन भई तुलसी राम गुन गाइके मगन भई तुलसी।
सब कोऊ चली डोली पालकी रथ जुडवाये के।।
साधु चले पाँय पैया, चीटी सो बचाई के।
मगन भई तुलसी राम गुन गाइके।।

 

तुलसी विवाह विधि -


देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस मांगलिक प्रसंग के शुभ अवसर पर भक्तगण घर की साफ -सफाई करते हैं और रंगोली सजाते हैं। इस विवाह में लोग तुलसी जी के पौधे का गमला, गेरू आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग प्रतीक चूनरी ओढ़ाते हैं। गमले को साड़ी ओढ़ाकर तुलसी को चूड़ी चढ़ाकर उनका शृंगार करते हैं।
गणपत्यादि पंचदेवों तथा श्री शालिग्राम का विधिवत पूजन करके श्री तुलसी जी की षोडशोपचार पूजा “तुलस्यै नम:” अथवा “हरिप्रियार्ये नम:” नाम मंत्र से करते हैं। तत्पश्चात एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखते हैं तथा तुलसी चौरा यानि तुलसी के पौधे के पास गन्ने का भव्य मंडप बनाकर उसमें साक्षात् नारायण स्वरूप शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं और फिर विधि-विधानपूर्वक उनके विवाह को संपन्न कराते हैं।भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं और आरती करें इसके बाद ही विवाहोत्व पूर्ण होता है। इस विवाह को महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में अखण्ड सौभाग्यकारी माना गया है। पुराणों में भी इसे मंगलकारी बताया गया है।

तुलसी विवाह कथा -


श्रीमद्भगवत पुराण के अनुसार एक बार सृष्टि के कल्याण के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के सतीत्व को भंग कर दिया। इस पर सती वृंदा ने उन्हें श्राप दे दिया और भगवान विष्णु पत्थर बन गए, जिस कारणवश प्रभु को शालिग्राम भी कहा जाता है और भक्तगण इस रूप में भी उनकी पूजा करते हैं। इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरूप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था और उसी समय से तुलसी विवाह का यह अनूठा रस्म प्रत्येक साल मनाया जाता है।


तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्त्व है। आस्थावान भक्तों के अनुसार इस दिन श्रद्धा-भक्ति और विधिपूर्वक व्रत करने से व्रती के इस जन्म के साथ-साथ पूर्वजन्म के भी सारे पाप मिट जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

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