GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

जानिए क्या है इस रहस्यमयी पवित्र गुफा का इतिहास

गृहलक्ष्मी टीम

22nd February 2017

हमारे देश में कई स्थान व भवन ऐसे हैं जो स्थापत्य कला की अनोखी मिसाल हैं। उसी कला को समृद्ध करती ऐसी ही एक गुफा है पाताल भुवनेश्वर गुफा। उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों के बीच बनी ये गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। 33 करोड़ देवी-देवताओं के इस रहस्यमयी स्थल के बारे में यहां हम आपको बताने जा रहे हैं -

जानिए क्या है इस रहस्यमयी पवित्र गुफा का इतिहास
 
पूरे भारत में संभवत: पाताल भुवनेश्वर जैसा अद्भुत स्थल कहीं भी नहीं है। पिथौरागढ़ जिले के सरयू तथा पूर्वी रामगंगा के मध्य स्थित यह स्थल समुद्र तल से 1350 मी. ऊंचाई पर है। स्कन्द पुराण के मानस खंड के 103वें अध्याय में इस स्थल का वर्णन है। 
 
 
वल्कलाख्यो महादेवं प्रकाशयति भूतलो।
ना गमिष्यन्ति मनुजास्तावन पाताल मण्डले।
सत्क्रियो देवेदेवस्य बल्कलाख्य: करिष्यति।
सदां प्रमति मत्र्याना गुहा गम्या भविष्यति॥

 

 

 

 

गुफा के रहस्य से जुड़ी है ये कहानी

इस जगह का दिव्य दर्शन पहली बार सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण को हुआ। ऋतुपर्ण राजा का समय भगीरथ से 7 पीढ़ी पूर्व का माना जाता है। इस दिव्य दर्शन की कथा भी अत्यन्त रोचक है। अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण का एक शौक था चौपड़ खेलना। उनके चौपड़ के साथी थे राजा नल। एक बार राजा नल पुष्करराज तीर्थ पर ऋतुपर्ण के साथ चौपड़ खेल रहे थे। वह अपनी दमयन्ती को चौपड़ के खेल में हार गए। शर्म के मारे उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से कहा कि मुझे ले जाकर घने जंगल में छुपा दो और मेरा मुंह भी रंगकर ले जाना ताकि दमयन्ती मुझे पहचान न सके। ऋतुपर्ण नल को लेकर जब हिमालय के घोर जंगलों में जा रहे थे तो उन्हें एक अलौकिक हिरण नजर आया। हिरण का पीछा करते-करते ऋतुपर्ण पाताल भुवनेश्वर जा पहुंचे। हिरण तो जंगल में नहीं मिला लेकिन रात्रि को थक कर सोते हुए ऋतुपर्ण को सपने में हिरण के दर्शन हुए। सपने में हिरण ने कहा कि हे राजन मेरा पीछा मत करो मैं हिरण नहीं हूं। ऋतुपर्ण ने जब हिरण का वास्तविक परिचय जानना चाहा तो हिरण ने उस स्थल के क्षेत्ररक्षक से प्रार्थना करने का सुझाव दिया। दो माह की तपस्या से क्षेत्रपाल प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष हुए और उन्होंने स्पष्ट किया कि इस स्थान पर एक गुफा है जिसमें तैंतीस करोड़ देवी-देवता भगवान शंकर के साथ स्थापित हैं। क्षेत्रपाल ने ही ऋतुपर्ण की प्रार्थना पर उन्हें गुफा के रक्षक शेषनाग तक पहुंचा दिया। शेषनाग ने अपने फन पर बैठाकर ऋतुपर्ण को छह माह तक गुफा के प्रत्येक भाग के न केवल दर्शन कराए वरन जाते समय उन्हें ढेर सारे मणिरत्न देकर इस निर्देश के साथ विदा किया कि वह इस रहस्य को किसी को न बताए अन्यथा उनकी मृत्यु हो जाएगी।
 
राज्य वापस आकर रानी के बहुत जिद करने पर न चाहते हुए भी राजा ऋतुपर्ण ने रानी को गुफा का रहस्य बता दिया और उनकी तत्काल मृत्यु हो गई। रानी अत्यन्त दुखी हुई किन होनी को कौन टाल सकता है। अन्त्येष्टि के बाद रानी पाताल भुवनेश्वर पहुंची। उसे गुफा में प्रतिमाएं तो मिलीं किंतु उन प्रतिमाओं में दिव्य अनुभूति का अभाव था। इसके बाद हजारों वर्षों तक यह स्थान गोपनीय ही रहा। बाद में पुराणों के आधार पर चन्द एवं कत्यूरी राजाओं ने इस स्थल का पता लगाया और यहां कई अन्य मंदिर भी बनवाए। द्वापर युग में पांडव जहां अज्ञातवास के दौरान भ्रमण करते हुए आए और सन् 1191 में आदि शंकराचार्य ने इस स्थल का विधिवत पूजन-अर्चन कर इसे पुन: आध्यात्मिक स्तर पर महिमा मंडित किया। 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
पर्वत में स्वनिर्मित मूर्तियों का है चित्रण
 
पाताल भुवनेश्वर गुफा आज भी अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही है। गुफा के द्वार से नीचे की ओर उबड़-खाबड़ सीढियां हैं। सैकड़ों वर्षों पूर्व इन सीढ़ियों को किसी अप्रशिक्षित ग्रामीण अथवा मजदूरों ने बनाया होगा। कहीं पतली, कहीं लंबी, मार्ग भी कहीं-कहीं तो इतना संकरा कि दो स्वस्थ आदमी एक साथ न निकल सकें। इन सीढ़ियों की कुल संख्या 82 है। अग्रभाग में एक हवनकुंड है। कहते हैं कि राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित के उद्धार हेतु उलंग ऋषि के निर्देशानुसार इसी हवन कुंड में सर्प यज्ञ किया था। कुण्ड के ऊपर तक्षक नाग की मूर्ति स्पष्ट नजर आती है। अन्दर आगे बढ़ने पर तो पर्वत में उभरी स्वनिर्मित (प्राकृतिक) मूर्तियों का इतना विशाल भंडार है कि उन्हें देखते-देखते महीनों बीत जाएं। अष्टदल कमल ऊपर छत में नजर आ रहा है। नीचे गणेश जी का धड़ है, जिस पर अष्टदल कमल से जल गिर रहा है। निकट ही महान धाम केदारनाथ, बद्रीनाथ एवं अमरनाथ लिंगों के रूप में विराजमन हैं। इन लिंगों के निकट ही काल भैरव की जीभ नजर आती है। काल भैरव का मुख छोटी संकरी गुफा के समान है।
 
कहा जाता है कि यदि कोई मानव मुख से प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाए तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। कुछ आगे बढ़ने पर शिव का आसन एवं चंडी वाहन शेर का मुख सामने है। यहीं 4 द्वार बने हैं (गुफा द्वार है जो लगभग 10 फीट ऊंचाई पर है) इन्हें पाप द्वार, रणद्वार, धर्मद्वार एवं मोक्ष के रूप में परिभाषित किया गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार पाप द्वार त्रेता युग में रावण की मृत्यु के साथ बन्द हो गया, रणद्वार द्वापर में महाभारत के पश्चात बन्द हो गया, धर्मद्वार अभी खुला है। कहते हैं कि यह कलियुग की समाप्ति पर बन्द होगा। मोक्ष द्वार सतयुग की समाप्ति पर बन्द होगा। मान्यता है कि मोक्ष द्वार से यदि धर्मप्राण मनुष्य प्रवेश कर ले तो उसे मुक्ति मिल जाती है।
 
कलियुग के अंत का संकेत देती हैं यहां मूर्तियां
 
पौराणिक संदर्भ के दृश्यों को प्रकृति ने इस कुशलता से और इतने रूपों में रचा है कि यह 500-600 मीटर लंबी गुफा इन प्राकृतिक दृश्यों का अद्भुत संग्रहालय ही बन गई है। ऊपर दीवार में भगवान शंकर की जटाएं, उनसे निकलती गंगा धारा और नीचे तैंतीस करोड़ देवी-देवता अत्यन्त सूक्ष्म लिंगों के रूप में आराधना की मुद्रा में मध्य में नर्मदेश्वर और निकट ही नन्दी एवं विश्वकर्मा कुंड सभी कुछ सहज, नयनों को बांध लेने वाला है। आगे दाहिनी ओर शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्राकृतिक लिंग त्रिमूर्ति ब्रह्म, विष्णु, महेश हैं। इन पर ऊपर से तीन गंगाओं की जलधारा बारी-बारी से गिर रही है। यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। सामने ऊंचाई पर एक गुफा है। अनगढ़ पत्थरों द्वारा ऊपर चढ़ने पर एक ओर शिवपार्वती एवं पांच पांडव (लिंग रूप में) चौपड़ खेल रहे हैं। मान्यता है कि इस गुफा से काशी तक मार्ग जाता है। वापसी पर फिर एक छोटी गुफा सम्मुख है जहां विशाल प्रस्तर खंड पर 4 लिंग स्थापित हैं। ये चार लिंग 4 युगों सतयुग त्रेता, द्वापर एवं कलियुग का स्वरूप हैं। कलियुग लिंग अपेक्षाकृत बड़ा है। कहते हैं कि यह लिंग समय के साथ ऊपर बढ़ रहा है और जब यह बढ़ते-बढ़ते छत को स्पर्श कर लेगा तब कलियुग का अन्त हो जाएगा। आगे फिर मुख्य मार्ग मिल जाता है। आगे ऐरावत हाथी एवं शिव कमंडल है। शिव कमंडल से श्रद्धालु मनोवांछित फल की इच्छा कर सकते हैं।
 
शिवरात्रि पर लगता है मेला
 
मान्यता है कि इस गुफा के दर्शन मात्र से चार धामों का पुण्य मिल जाता है। शिवरात्रि को तो इस स्थल पर विशाल मेला लगता ही है अन्य धार्मिक अवसरों पर भी यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।
 
 
(साभार - साधनापथ)
 
 
 

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

पोल

अगर पेपर लीक हो जाए तो क्या फिर से एग्ज़ाम होना चाहिए?

गृहलक्ष्मी गपशप

इनडोर प्लांटिंग : सुंदरता भी, फायदे भी

इनडोर प्लांटिंग...

अपने घर में पौधे लगाना जहां घर के सौंदर्य में चार...

स्मार्ट करियर गोल्स बनाने की सलाह देती हैं गृहलक्ष्मी ऑफ द डे दीपशिखा वर्मा

स्मार्ट करियर गोल्स...

गृहलक्ष्मी ऑफ द डे

संपादक की पसंद

फिक्स्ड डिपॉजिट करने के पहले जान लें ये जरूरी बातें

फिक्स्ड डिपॉजिट...

वर्तमान में कम निवेश में अधिक रिटर्न के लिए वर्तमान...

तेजाब खोखला नहीं कर पाया मेरे हौसलों को

तेजाब खोखला नहीं...

लड़कियों के चेहरे पर तेजाब डालने वालों के लिए ये कविता...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription