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अजमेर शरीफ दरगाह: कोई नहीं जाता है इस दर से खाली

गृहलक्ष्मी टीम

2nd March 2017

अजमेर में स्थित, यह मुसलमानों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। संसार के प्रत्येक भाग से लोग यहां यात्रा के लिए आते हैं। यहां ख्वाजा मौइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जो मक्का के समान पवित्र मानी जाती है। दरगाह को भक्तजन 'गरीब नवाज' या 'ख्वाजा साहिब' भी कहते हैं।

अजमेर शरीफ दरगाह: कोई नहीं जाता है इस दर से खाली
 
 
चिश्ती साहिब 1192 ईस्वी में सुल्तान साबुद्दीन के साथ भारत आये थे और अजमेर में बस गए। कहा जाता है कि ख्वाजा साहिब में चमत्कारिक शक्तियां थीं, उनके ही आशीर्वाद से मुगल बादशाह अकबर को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। जिसका नाम अकबर ने सलीम रखा था जो बाद में जहांगीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बादशाह अकबर की ख्वाजा के प्रति असीम श्रद्धा थी। पुत्र प्राप्त होने के उपरांत ख्वाजा जी के आशीर्वाद के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए बादशाह अकबर ने दिल्ली से अजमेर तक की पैदल यात्रा की थी।
 
 
आकर्षक दरवाजा है निजाम गेट
 
 
अजमेर नगर ऊंची-ऊंची पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ है। यह दरगाह अजमेर नगर के मध्य में स्थित है। ख्वाजा मौइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में प्रवेश हेतु चारों ओर दरवाजे हैं जिनमें सबसे ज्यादा भव्य तथा आकर्षक दरवाजा मुख्य बाजार की ओर है, जिसे निजाम गेट कहते हैं। यह दरवाजा 1912 ई. में बनना शुरू हुआ जो कि लगभग तीन वर्ष में बनकर तैयार हुआ था। यह भव्य दरवाजा जनाब मीर उस्मान अली खां साबिक नवाब हैदराबाद ने बनवाया था। इसकी ऊंचाई लगभग सत्तर फुट, चौड़ाई मय बरामदों के 24 फुट है। मेहराब की चौड़ाई सोलह फुट है, दरवाजे के ऊपर नक्कार खाना है।
 
 
शाहजहानी के नाम से प्रसिद्ध है दरवाजा नक्कारखाना
 
 
उस्मानी दरवाजे से दरगाह शरीफ में प्रवेश करें तो कुछ दूरी पर एक पुराने प्रकार का दरवाजा आता है, इस दरवाजे के ऊपर शाही जमाने का नक्कारखाना है। इस दरवाजे को शाहजहां ने 1047 हिजरी में बनवाया था। इसी कारण यह दरवाजा नक्कारखाना शाहजहानी के नाम से प्रसिद्ध है। इस दरवाजे की मेहराबों पर स्पष्ट शब्दों में कलिमा तैयबा होने के कारण कलिमा दरवाजा भी कहते हैं। 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
कब्रिस्तान में हैं चार यार की मजार
 
 
जामा मस्जिद शाह जहानी के दक्षिण दीवार के साथ ही एक छोटा सा दरवाजा है जो पश्चिम की ओर खुलता है। इस दरवाजे के बाहर एक बड़ा सा कब्रिस्तान है। इस कब्रिस्तान में बड़े-बड़े आलिमों, फाजिलों, सूफियों, फकीरों और औलिया अल्लाहों के मजार हैं। कहा जाता है कि इसी कब्रिस्तान में चार मजार उन बुजुर्गों के भी हैं, जो हुजूर गरीब नवाज के साथ तशरीफ लाए थे, इसी कारण इसे चार यार भी कहते हैं। गरीब नवाज की दरगाह पर होता है 'उर्स' का आयोजन अजमेर में गरीब नवाज की दरगाह पर प्रत्येक वर्ष भव्य 'उर्स' का आयोजन होता है, जिसमें लाखों यात्री देश-विदेश से आकर शामिल होते हैं।
 
 
यादगार है अकबरी मस्जिद
 
 
कलिमा दरवाजे से आगे चलने पर दायीं ओर शफाखाना और अकबरी मस्जिद की सीढ़ियां हैं तथा सामने बुलंद दरवाजा है। अकबरी मस्जिद अकबर के जमाने की यादगार है। शाहजहां सलीमा के जन्म पर अकबर बादशाह आस्ताना-ए-आलिया की जियारत करने अजमेर आए तो उन्होंने इस मस्जिद के निर्माण का आदेश दिया था।
 
 
महमूद खिलजी की यादगार 'बुलंद दरवाजा'
 
 
बुलंद दरवाजा सुलतान महमूद खिलजी की यादगार है। इसकी ऊंचाई 85 फुट है। अंदर का फर्श संगमरमर का है । चूंकि यह दरगाह शरीफ के सभी दरवाजों में सबसे ऊंचा है इसलिए इसे बुलंद दरवाजा कहा जाता है। 25 जुमादल आखिर को इसी दरवाजे के ऊपर उर्स शरीफ का झण्डा लगाया जाता है।
 
 
सेहन का चिराग
 
 
बुलंद दरवाजे के आगे बढऩे पर सामने एक गुम्बद की तरह सुंदर सी छतरी है। इसमें एक बहुत पुराने प्रकार का पीतल का चिराग रखा है। इसको सेहन का चिराग कहते हैं।
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
बड़ी देग में पक सकता है सवा सौ मन चावल
 
 
सेहन चिराग में बुलंद दरवाजे के दायी ओर एक बहुत बड़ी देग है, कहते हैं अकबर बादशाह ने यह प्रतिज्ञा की थी कि चित्तौडगढ़ की विजय के बाद सीधे अजमेर शरीफ में आकर एक बड़ी देग दान करेंगें। अंतत: अकबर ने विजयोपरांत बड़ी देग दरगाह शरीफ में चढ़ायी। इस देग का व्यास साढ़े बारह गज है और इसमें एक बार में सवा सौ मन चावल पक सकता है।
 
 
 
खानकाह इमारत में है यतीमखाना
 
 
महफिल खाने से पश्चिम की ओर सटी हुई इमारत खानकाह है। आजकल इस इमारत में यतीमखाना है। सेहन चिराग के पूर्व में एक फाटक है, जिसके अंदर एक बड़ा सा दालान है, दालान के अंदर दो बड़े-बड़े कढ़ाव है, जिनमें सुबह शाम नमकीन दलिया पकाकर गरीबों को बांटा जाता है। इसे लंगरखाना कहते हैं। यह लंगरखाना अकबर बादशाह ने गरीबों के लिए ही बनवाया था।
 
 
 
संगमरमर का है मजार अक्दस का तावीर
 
 
रौजा-ए-मुनव्वरा और गुम्बद शरीफ का काम सुल्तान महमूद खिलजी के जमाने में प्रारम्भ हुआ, मगर कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि रोजा-ए-मुनव्वरा और गुम्बद शरीफ ख्वाजा हुसैन नागौरी र.अ. ने बनवायी है।  गुम्बद के अंदर का हिस्सा पत्थर का है, जिसको चूने से जोड़ा गया है। गुम्बद के बाहर का हिस्सा सफेद है, जिस पर चूने का प्लास्टर चढ़ा हुआ है। गुम्बद के अंदर के हिस्से में सुनहरी व रंगीन नक्श व निगार बने हुए हैं। सफेद गुम्बद पर सोने का बहुत बड़ा ताज लगा है इसमें नवाब कलब अली खां (रामपुर) के भाई हैदर अली खां मरहूम ने दान किया था। मजार अक्दस का तावीर संगमरमर का है। मजारें अक्दस हमेशा मखमल के कब्र-पोशों से ढ़का रहता है। उसके ऊपर ताजा गुलाब के फूलों की चादरें चढ़ी रहती हैं छप्पर-खट के बीच में सुनहरा कटेहरा लगा है जो शहनशाह जहांगीर ने बनवाकर चढ़ाया था।
 
 
 
फखरुद्दीन गुरदेजी व उनकी बीबी की मजार
 
 
हजरत ख्वाजा फखरुद्दीन गुरदेजी की और उनकी बीबी की मजार तोशाखाने में है, जो बेगमी दालान से मिला हुआ है, इसका दरवाजा रौजा-ए-मुनव्वरा के अंदर के हिस्से में खुलता है। ये ख्वाजा गरीब नवाज के करीबी रिश्तेदार, पीर भाई और मुरीद थे। इनकी संतान खुद्दाम सैयद जादगान कहलाती है। जिनको कि अन्दरुने गुम्बद खिदमत का हक प्राप्त है। गुम्बद शरीफ, मजार अक्दस और उसका सभी समान खुद्दाम हजरात के कब्जे में रहता है। यही फूल और सन्दल चढ़ाते हैं और जायरीन को सलाम कराते हैं, गिलाफों और चादरों का चढ़ाना भी इन्हीं के जिम्मे हैं।
 
 
 
(साभार - साधनापथ)
 
 
 
 
 
 

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