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कभी सिर्फ दोस्तों के लिए करती थी कुकिंग, आज ये कहलाती हैं 'द आइसक्रीम लेडी' 

गरिमा अनुराग

17th April 2017

मिसेज रजनी बेक्टर के एक होममेकर से मिसेज बेक्टर्स फूड स्पेशैलिटीज़ की संस्थापिका बनने का सफर कई महिलाओं को घर से निकलकर अपनी पहचान ढूंढने के लिए प्रेरित कर सकता है। पढ़िए-

कभी सिर्फ दोस्तों के लिए करती थी कुकिंग, आज ये कहलाती हैं 'द आइसक्रीम लेडी' 
कुछ ऐसे हुई थी शुरूआत 
 
लाहौर और दिल्ली में बचपन बीतने के बाद रजनी की शादी मात्र 17 साल की उम्र में एक बिज़नेस परिवार में हुई। शुरूआती साल तो घर, परिवार और तीन बेटों को बड़ा करने में झटपट बीत गए। लेकिन बेटों के थोड़े बड़े होने और बोर्डिंग स्कूल जाने के बाद रजनी के पास इतना समय रहता कि उन्होंने खुद को व्यस्त रखने के लिए कुकरी क्लासेस जॉइन कर ली। हरे छोटे बड़े मौके पर और कभी-कभी तो बिना किसी बहाने के ही उन्होंने दोस्तों को अपने हाथ से बने आइसक्रीम, केक व कुकीज़ का स्वाद चखाना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्हें ऑर्डर मिलने शुरू हो गए और अपने घर के पीछे गार्डन में उन्होंने क्रेमिका की शुरूआत। जो काम मन लगाने के लिए शुरू किया गया था वो बढ़ती लोकप्रियता के साथ 5 करोड़ के टर्नओवर में तबदील हो गया।  लेकिन जब नब्बे के दशक में पंजाब में आतंकवाद ने सर उठाया तो रजनी के परिवार का 107 साल पुराना फूड ट्रेड का बिज़नेस ठप होने लगा। अब रजनी के परिवार ने अपना पूरा सामर्थ रजनी की स्थापित कंपनी क्रेमिका में लगाया और ये कंपनी तेजी से आगे बढ़ गई। रजनी के पति के साथ-साथ तीनों बेटों ने मिलकर कंपनी को सफलता की उंचाई दिखाई है, लेकिन आज भी क्रेमिका द्वारा बनाई किसी भी नए प्रोडक्ट की रेसिपी रजनी खुद ही चेक करती हैं।
 
गृहलक्ष्मी किटी पार्टी में मिसेज रजनी बेक्टर बतौर मुख्य अतिथी शामिल हुई और ये मंच उन्हें बेहद पसंद आया।  पढ़िए, बातचीत के कुछ अंश-                                                   
 
1. आप काफी लंबे समय से लुधियाना लेडीज़ क्लब से जुड़ी हैं। इस क्लब से अपने जुड़ाव के बारे में बताएं?
जी, इस क्लब से जुड़े हुए अब मुझे लगभग 60 साल होने वाले हैं। उस समय क्लब में सिर्फ 40 महिलाएं थी और क्लब की फीस सिर्फ 2 रुपए थी। एक छोटे से कमरे में हम सभी साथ में मिलते थे, कभी टेनिस खेलती थी। कभी किसी ने कुछ दिखा दिया तो कभी किसी ने कोई डेमोन्स्ट्रेशन दे दी। जैसे-जैसे क्लब के सदस्य बढ़े, महिलाओं ने पैसे मिलाकर हॉल का साइज बढ़ाते गए। हर महीने कुछ न कुछ जरूर करते थे। बीच में कुछ साल क्लब की स्थिति खराब होने लगी थी, उस समय ये जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी कि मैं क्लब को संभालू और मैंने फिर से क्लब की स्थिति सुधारी थी। इसे मैं अपने बड़ी उपलब्धि मानती हूं। 
 
2. नॉर्थ इंडिया में क्लब कल्चर शुरू करने में अाप काफी सक्रीय रही हैं। ये कल्चर देश के अन्य भागों में कम है। क्या कहना चाहेंगी?
 
मुझे लगता है क्लब कल्चर होना चाहिए क्योंकि देखने वालों को भले ही ये महिलाओं की मौज मस्ती जैसी लगे लेकिन ये एक ऐसा प्लैटफॉर्म है जहां महिलाएं खाना, डेकोरेशन, समाज, रहन सहन के बारे में बहुत कुछ सीखती हैं। उनकी जानकारी बढ़ती है और वो दस औरतों से मिलती-जुलती हैं और एक दूसरे से भी बहुत सीखती हैं। उनको टैलेन्ट घर की चार दिवारी से बाहर निकलता है। 
 
3. फैमिली और वर्क के बीच में संतुलन के लिए क्या करती हैं आप?
 
मैं बच्चों के साथ हमेशा रहती थी और 18 घंटे काम करती थी क्योंकि अपना काम मैं तभी करती थी जब बच्चे सो जाएं या फिर घर में नहीं होतो थे तभी मैं काम करती थी। छोटे बच्चों को कभी भी मिग्लेट न करें।
 
4. अपने लिए समय कैसे निकालती थी?
अपने लिए समय तो मैं मुश्किल से ही मिकाल पाती थी, लेकिन मैं थकती नहीं थी। मेरे पति भी बोलते थे कि तू थकती नहीं है? लेकिन मुझे लगता है कि ये मेरे हस्बेंड का सपोर्ट ही था कि मुझे कभी थकान महसूस नहीं होती थी। घरवालों का खाना भी मैं खुद ही बनाया करती थी। मुझे काम करना अच्छा लगता है।                                                                                         
 
5. आप खुद एक होममेकर से बिज़नेस वुमन बनी हैं...एंटरप्रेन्योरशिप की तरफ रुझान रुझान रखने वाली महिलाओं को क्या सलाह देंगी?
जिस काम को करना चाहती हैं, पहले उसे पूरी तरह से स्टडी करें। क्या मार्जिन्स देखें, इसमें क्या काम करेगा क्या मुनाफा है और क्या नुकसान क्या है। किसी और का बिज़नेस चल रहा है सिर्फ इसलिए आप भी बिज़नेस ना करें। जो भी काम शुरू करें अपना 100 प्रतिशत देने की कोशिश करे। 
 
6. घर में फाइनैंस की चाभी किसके पास होनी चाहिए?
घर में फाइनैंस की चाभी मेरे पास रहती है। हमारे यहां शुरू से घर के खर्च की चाभी महिलाओं के पास ही रही है। मेरा मानना है कि खर्च करना चाहिए, लेकिन बचत करना भी बेहद जरूरी है। अगर आपको बिज़नेस बढ़ाना है या फैमिली की किसी जरूरत के लिए बचत हमेशा करना ही चाहिए। 
 
7. बदलते समय के साथ पतियों ने भी किचन में एंट्री ली है। आपकी क्या राय है?
देखिए मेरा मानना है कि आदमी भले ही किचन में शौक से खाना बना ले, लेकिन किचन को समेटना या यूं कहें सहेजना औरत का ही काम है। कोई भी आदमी औरत के जैसा इस काम को नहीं कर सकता। 
 
9. देश में तेजी से बढ़े फास्ट फूड कल्चर पर आपकी राय क्या है?
मेरी कंपनी खुद ही एक बड़े ब्रांड के लिए बन्स व तरह तरह के सॉस सप्लाई करती हूं और मैं जानती हूं कि ये लोग क्वालिटी का कितना ध्यान रखते हैं। हर 15 दिन में हमारा प्रोडक्ट चेक किया जाता है। हां, सड़क पर मिल रहे फास्ट फूड जिसपर धूल मिट्टियां पड़ी होती हैं, सेहत के लिए जरूर हानिकारक है। 
 
 
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