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एक अनोखा बंधन

शिप्रा विज

21st September 2017

एक अनोखा बंधन

अविनाश को ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली थी। इसलिए हम शादी में सिर्फ दो दिन पहले ही पहुंचे। ऑटो से उतरते ही कई जोड़ी आंखें हमारी ओर उठ गईं । उन आंखों ने हमें, खासकर मुझे देखकर आपस में खुसर-फुसर शुरु कर दी। अविनाश जब सामने से आते हुए वृद्ध दंपत्ति के पैर छुने के लिए झुके तो मैं समझ गई कि वही वंदना के नाना-नानी हैं। मैंने भी झुककर प्रणाम किया तो वे सकपका गए। उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि मैं इस शादी में आऊंगी, पर मैं समझ सकती थी कि वंदन को देखने के लिए उनकी आंखें तरस रही थी। तभी तो वंदन को पल भर भी मेरी गोद में रहने न दिया। मम्मी तो वंदन को गले लगा रोए जा रही थीं।

बस के लंबे सफर के कारण बहुत थकान लग रही थी। धीरज हमारा सामान स्वयं उठाकर अविनाश को ऊपर वाले कमरे में ले गया। अविनाश तो चले गए, पर मैं अकेली रह गई। सब लोग वंदन को खिलाने कम और वंदना से उसकी तुलना करने में ज्यादा व्यस्त थे। मैं एक कोने में चुपचाप खड़ी थी। पापा ने शायद मेरी स्थिति भांप ली। इसलिए मेरे पास आकर बोले, अविनाश और कमरा ऊपर हैं। थक गई होगी। ऊपर जाकर जरा कमर सीधी कर लो। पर वंदन! वो वो भी थका हुआ है और भूखा है। मैं इसे साथ ले जाऊं। सवाल पूछते हुए मैं डर रही थी। कुल जमा दो दिन के लिए तो आया है, हमारा नाती। फिर तो हमेशा तुम्हारे पास ही रहेगा। जरा दो घड़ी जी भर के देख लेने दो, मम्मी ने पीछे से आकर कहा तो मैं चुपचाप सीढ़ियां चढ़ने लगी।

कमरे में गई तो अविनाश कपड़े बदलकर लेटे हुए थे। आंखें बंद थी, इसलिए समझ नहीं आ रहा था। सो गए हैं या सिर्फ आंखें बंद करके थकान मिटा रहे हैं। समझती भी कैसे। शादी के बाद से हमारे बीच एक दीवार सी खिंची हुई है। मैं जितना इसे तोड़ने की कोशिश करती हूं, ये उतनी ही ऊंची हो जाती है। मैंने धीरे से अटैची खोली। कपड़े लेकर बाथरुम में घुस गई। नहाने के बाद काफी फ्रेश लग रही था। थकान मिटाने के उद्देश्य से मैं भी अविनाश की बगल में जाकर लेट गई। मैंने आंखें बंद कर ली।

मुझे आज भी वह दिन अच्छे से याद हैं। जब अविनाश का रिश्ता मेरे लिए आया तो मेरे कुंआरे मन द्वारा संजोये सारे सपने बिखर कर रह गए, पर अपने शराबी पिता की स्थिति और सौतेली मां के दबाव के चलते एक बच्चे के बाप अविनाश से विवाह करने को तैयार हो गई। मेरी सहेलियों को जैसे ही मेरी सगाई का पता चला, बधाई देने चली आई। शर्म के मारे मैंने उन्हें वंदन के बारे में नहीं बताया, लेकिन अपनी सबसे करीबी सहेली नीलम के सामने दिल का दर्द आंसुओं के रास्ते बाहर आ गया।

देख अनु ! मैं जानती हैं, तू इस शादी से खुश नहीं है, लेकिन मैं ये भी दावे के साथ कह सकती हूं कि तू अपने स्वभाव के बूते पर सबका दिल जीत लेगी। उस घर की हर चीज़ में वंदना की आत्मा बसी है, इसलिए उसे मिटाने की कोशिश भूल कर भी नहीं करना, बल्कि अपने स्वभाव की खुशबू से उसकी आत्मा को जिंदा रखने का प्रयास करना। नीलम के कहे शब्दों को याद रखकर और मायके की कड़वी यादों को भुलाकर मैं रात्रि में फूलों के सेज पर बैठी अविनाश का इंतजार कर रही थी, तब बड़ी ननद से वंदन संभाले नहीं संभल रहा था। मैंने वंदन को अपने पास सुला लिया। अनु! मैंने तुमसे विवाह सिर्फ वंदन के कारण किया है। वंदन की मां, अगर वह भी तुम बन सकी तो, जिसकी हैसियत रखती हो। इसके अलावा मुझसे कोई उम्मीद नहीं रखना। इतना कहकर अविनाश पलटकर सो गए। मैं स्तबध रह गई। दिमाग में द्वंद् चलने लगा।

एक तरफ़ नीलम के कहे शब्द मुझे मेरा कर्तव्य याद दिला रहे थे तो दूसरी तरफ मन विद्रोह करने को तैयार था। मेरी क्या गलती थी? अविनाश और वंदन की नजरों में भले ही मैं वंदना के कर्तव्य पूरा करने के लिए लाई गई थी, पर मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मैं नहीं चाहती थी कि जो सौतेलेपन का दंश बचपन से लेकर अब तक झेला है। वो वंदन के हिस्से में आए, लेकिन मेरी इस निश्छल ममता को भी शक के कटघरे में खड़ा कर दिया। पड़ोस वाली राधा चाची अम्मा को बार-बार समझा देती। मुझे ये जरुरत से ज्यादा प्रेम ठीक नहीं लगता। देखना ! एक बार खुद के बच्चे हो जाएंगे तो वदंन को एक तरफ कर देगी। ये तो सब दिखावा है, दिखावा। ये सुनकर मन कसैला हो गया।

अम्मा के मन में डर बैठ गया लेकिन उन्हें क्या पता था। कि अविनाश ने मुझे छुआ भी नहीं है। पर मैंने उन्हें कह दिया कि इस घर का वारिस सिर्फ वंदन ही रहेगा। तब जाकर अम्मा को तसल्ली मिली। मेरे इस वाक्य ने मुझे अम्मा के दिल में जगह दे दी। फिर अम्मा ने मुझे विस्तार से वंदना और अविनाश के प्रेम प्रसंग से लेकर विवाह  की बातें बताई। वंदना अविनाश के सबसे गहरे दोस्त धीरज की बहन थी, इसलिए शादी में कोई खास दिक्कत नहीं आई। वंदना और अविनाश की शादी के बाद भी धीरज और अविनाश में जीजा साले से अधिक दोस्ती का रिश्ता था। वंदना धीरज की इकलौती बहन थी। उन्हीं से मुझे पता चला कि अगले महीने धीरज का विवाह है। और अविनाश उसमें शरीक होने अकेले ही जा रहे हैं। ये सब सुनकर मैं सोचने पर मजबूर हो गई।

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