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हिन्दी उपन्यास पुतली (पार्ट-2)

राजवंश

26th October 2017

राजवंश का मशहूर और लोकप्रिय उपन्यास 'पुतली' अब ऑनलाइन पढ़ें, सिर्फ गृहलक्ष्मी डॉट कॉम पर....

हिन्दी उपन्यास पुतली (पार्ट-2)
 
भाग - दो
 
 
हीरो चुपचाप एक कुंज में गुलाब के एक पौधे के पास खड़ा हुआ खाली-खाली नजरों से गुलाब के खूबसूरत फूल को देख रहा था। अचानक उसके कानों में हीरोइन की आवाज टकराई जो पुकार रही है, ‘सुषमा, ऐ सुषमा... कहां हो तुम?’
  हीरो जल्दी से एक बाड़ की आड़ में छुप जाता है। हीरोइन कूंज में दाखिल होती है और इधर-उधर देखती है, फिर बड़-बड़ाती है- ‘कहां मर गईं तुम?’
  फिर उसकी नजर खुशरंग गुलाब के फूल पर पड़ती है और वह उसे झुककर तोड़ने लगती है। उसकी उंगली में कांटा चुभी जाता है। और वह बिलबिलाकर हाथी पीछे खींच लेती है। उंगली के पोर पर खून की सुर्ख बूंद नजर आती है। हीरो बदहवास होकर पीछे बाड़ से निकलता है और अपने कुर्ते के दामन से एक धज्जी फाड़कर ही रोइन की उंगली पर बांधने लगता है। हीरोइन झटके से अपना हाथ छुड़ा लेती है। हीरो गिड़गिड़ाकर कहता है- ‘इतना जुल्म न करो अपने आप पर, तुम्हारी उंगली से खून बह रहा है।’
  ‘उंगली मेरी है तुम्हारी नहीं।’
  ‘मगर जख्म मेरी रूह पर लगा है- शीला, तुम्हारे अस्तित्व का एक-एक भाग मेरी रूह का संगठन है।’
  ‘मैं कहती हूं तुम्हें यहां आने की हिम्मत कैसे हुई।’ हीरोइन भड़ककर कहती है।
  ‘इसलिए कि मैंने यहां अपनी रूह को- अपने प्यार को बुलाया था।’
  ‘क्या मतलब?’ हीरोइन तीखी नजरों से हीरो को देखती है।
  ‘तुम्हें यहां सुषमा ने नहीं बुलाया, मैंने बुलाया था।’
  ‘ओह...... तुम्हारी हिम्मत यहां तक बढ़ गई।’
  ‘प्यार की हिम्मत का अन्दाजा खुद भी नहीं लगा सकता शीला, तुम पत्थर हो- तुम्हारे पत्थर के दिल में प्यार नाम की कोई धड़कन नहीं। लेकिन मुझे यकीन है कि एक रोज इस पत्थर के दिल में धड़कन पैदा होगी और जरूर पैदा होगी।’
 
  ‘तुम्हारा यह स्वप्न कभी पूरा नहीं होगी।’ हीरोइन कहती है, ‘तुम तमाम उम्र यूं ही तड़पते रहोगे और मैं तुमसे नफरत करती रहूंगी।’
  ‘तड़पाना तुम्हारे अख्तियार में है, नकरन करना भी तुम्हारे अख्तियार में है। मगर तमाम उम्र नहीं। जिस रोज मेरा प्यार आशा की ढलान पर सम्भल न सका वह दिन तुम्हारी नफरत का आखिरी दिन होगा, बिलकुल आखिरी दिन! उस रोज मेरी लाश मिलेगी। मैं अपनी जान दे दूंगा।’
  ‘यह वाक्य तुम हजारों बार अपने दोस्तों से दुहरा चुके हो।’
  ‘मैं इसके ऊपर अमल करके दिखा सकता हूं, शीला!’
  ‘तुम......?’ हीरोइन घृणापूर्वक कहती है- ‘अगर दिखा सकते तो आज मेरे सामने जिन्दा न खड़े होते।’
  ‘तुम मेरे प्यार का इम्तिहान ले रही हो शीला!’ हीरो की आवाज भर्रा जाती है।
  ‘नहीं...... मैं तुमसे नफरत करती हूं। मैं तुमसे छुटकारा चाहती हूं, हमेशा के लिए।’
  ‘यह तुम्हारा आखिरी फैसला है।’ हीरो की आवाज आवाज कंप-कंपा जाती है।
  ‘हां-हां- यह मेरा आखिरी फैसला है।’
 
  ‘यह तुम्हारा आखिरी फैसला है तो अपनी आंखों से इस फैसले का अन्जाम भी देख लो। आशा...... तुम समझती हो तुम्हारी घृणात्मक निगाहें मेरे लिए कोई अहमियत नहीं रखतीं। यह तुम्हारी भूल है आशा! मैं हर रोज तुम्हारी आंखों की नफरत से अपना सीना छलनी होते महसूस करता हूं। आज मैं अपने इस सीने में अपनी नामुरादी और नाकामी का खंजन उतारे लेता हूं। आशा- तुम मेरी हो केवल मेरी। मैं तुम्हें यहां न पा सका तो भगवान के घर पा लूंगा आशा... तुम मेरी हो...... तुम केवल मेरी।’
 
  स्टेज पर खड़ी हुई हीरोइन सहसा राजन को देखती रह गई। हीरोइन का नाम शीला था। और राजन, आशा-आशा कहकर उसे मुखातिब कर रहा था। स्टेज के दायें-बायें कोनों से रहमान और घोष राजन को होश में लाने के लिए चुपके-चुपके पुकार रहे थे। मगर राजन-पागल-सा हो गया था। वह जोर-जोर से कह रहा था- ‘तुम मेरी हो आशा...... तुम सिर्फ मेरी हो!’
  अचानक उसने कुर्ते के नीचे से एक खंजर निकाला। खंजर हवा में लहराया...... दूसरे ही क्षण हीरोइन की एक लम्बी चीख हवा में लहरा गई। राजन ने अपने सीने में ठीक दिल के स्थान पर खंजर घोंप लिया था। और वह स्टेज पर हाथ-पांव रगड़ता हुआ तड़प रहा था।
  हॉल तालियों के शोर से गूंज रहा था। फिर रहमान जोर से चिल्लाया-
  ‘पर्दा... पर्दा गिराओ।’
  स्टेज पर पर्दा गिरा दिया गया। रहमान और घोष दौड़ते हुए राजन के करीब पहुंचे, लेकिन राजन...! उसकी सांस बहुत आहिस्ता-आहिस्ता चल रही थी। रहमान बौखला कर बोला, ‘अरे......अरे? इसने तो सचमुच में अपने-आपको खत्म कर लिया।’
  ‘नहीं......!’ घोष हड़बड़ाकर खड़ा हो गया।
  हीरोइन ने राजन के सीने से ताजा-ताजा खून उबलते देखा था। वह लड़खड़ाई और धड़ाम से गिरक बेहोश हो गई। राजन ठंडा हो चुका था।
  
  क्रोध के मारे आशा का बुरा हाल हो रहा था। आंखों से चिंगारियां-सी निकल रही थीं। रजनी भी उसके बराबर ही बैठी थी। स्टेज पर पर्दा गिर चुका था और हॉल धीरे-धीरे खाली होता जा रहा था। लेकिन आशा और रजनी अब भी अपनी-अपनी सीटों पर मौजूद थीं। आशा के वफादार लोग मुस्करा-मुस्कराकर उसे देखते हुए जा रहे थे। अचानक रजनी ने आशा के कंधे पर हाथ रखकर कहा- ‘अब क्या सोच रही हो?’
  ‘आं!’ आशा चौंक पड़ी।
  ‘नहीं।’ आशा होंठ भींचकर बोली- ‘आज मैं उस कमीने से अपनी तौहीन का बदला लिए बगैर नहीं जाऊंगी।’
  रजनी के अधरों पर एक फीकी-सी मुस्कराहट रेंग गई। अचानक उसी वक्त किसी तरफ से आवाज आई- ‘राजन मर गया!’
  ‘राजन ने सचमुच अपने को चाकू मार लिया।’
  ‘नहीं-।’ रजनी बौखलाकर खड़ी हो गई।
  और आशा- एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर एक साया-सा आया और फिर गुजर गया।
  और फिर सारे कॉलेज में हंगामा मच गया। लोग राजन की लाश देखने के लिए हॉल में टूटे पड़ रहे थे। और उनकी जबान पर राजन के मरने से कुछ देर पूर्व के वाक्य थे। एक लड़का कह रहा था- ‘वह केवल आशा की वजह से मरा है।’
  ‘बेशक, आशा की बेरहमी ने उसे खुदकशी पर मजबूर कर दिया था।’
  ‘आशा जैसी संगदिल लड़की हमने आज तक नहीं देखी।’
  लोग आशा की तरफ देख-देखकर घृणा प्रकट कर रहे थे।
  लेकिन आशा के चेहरे पर कोई खौफ या भय न था। उसके चेहरे पर वही रवानियत थी। वही सुकून था और वही उनके बीच से आहिस्ता-आहिस्ता निकलती हुई कम्पाउन्ड में आई और अपनी खूबसूरत इम्पाला की तरफ किसी विजयी की तरह बढ़ने लगी। वह खुद-ब-खुद ऐसा महसूस कर रही थी जैसे उसके सिर से एक भारी बोझ हट गया हो। राजन का प्यार वाकई उसके लिए एक मुसीबत बन गया था। सारे कॉलेज में राजन के प्यार के चर्चे थे और ये चर्चे जितने बढ़ते थे, आशा को राजन से उतनी ही नफरत महसूस होती थी। आखिर उसका और राजन का मेल ही क्या था।
  थोड़ी देर बाद उसकी इम्पाला कॉलेज के फाटक से निकल कर सड़क पर दौड़ने लगी।
  एक मोड़ पर मुड़ते हुए आशा का पांव ब्रेक पर पड़ा।

 

आगे की कहानी कल पढ़ें, इसी जगह, इसी समय....

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