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मिलिए उर्मिला श्रीवास्तव से.. जो गांव की बेटियों को दे रहीं हैं शिक्षा की उड़ान

अर्चना चतुर्वेदी

28th December 2017

मिलिए उर्मिला श्रीवास्तव से.. जो गांव की बेटियों को दे रहीं हैं शिक्षा की उड़ान

 

हरदोई जिले से 18 किलोमीटर दूर स्थित सर्वोदय आश्रम में उर्मिला श्रीवास्तव प्रोजेक्ट 'उड़ान' के जरिए उन लड़िकयों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं जो 10 से 14 के बीच हैं और घर की जिम्मेदारियों के बीच रहकर पढ़ नही सकीं। इसकी शुरुवात 1999 में उन्होने की थी। पति रमेश भाई ने आचार्य विनोबा भावे से प्रभावित होकर निर्मला देशपांडे के साथ मिल कर इस आश्रम की नींव रखी थी। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद ये सपना अब उर्मिला साकार कर रही हैं। 
 
जिस उम्र में लड़कियां सजने-संवरने का शौक रखती हैं उस उम्र में इन्हें खादी का साथ मिला। जब लोग गांव से शहर जाकर बस रहे थे तब उन्होंने गांव की बंजर जमीन में बसने का फैसला किया। आज गांव में रहकर वो हजारों बच्चियों के भविष्य की उम्मीद बन गई हैं। पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश -
 
 
अनपढ़ बेटियों को पढ़ाने की मुहिम है 'उड़ान'
 
सर्वोदय आश्रम एक संस्था है जिसके जरिए बहुत से कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में उड़ान एक कार्यक्रम है जो मैंने 1999 -2000 में शुरू किया।जिसमें उन लड़कियों को चुना जाता है जो कभी स्कूल नहीं गईं। या फिर किसी और कारण से बीच में ही पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हो गईं। इन बच्चों को क्लास 1 से 5 तक की शिक्षा सिर्फ 1 साल में ही देकर क्लास 6 में प्रमोट कर दिया जाता है। खास बात ये है कि इनके स्लेबस को भी अगल तरीके से तैयार किया गया। और बच्चों को मजेदार व अनोखे ढ़ग से पढ़ाया जाता है। यह कार्यक्रम पूरी तरह से मुफ्त है इसके लिए किसी भी तरह की कोई फीस नहीं ली जाती है।
 
आजीवन खादी वस्त्र पहनने का लिया संकल्प
 
मेरी शादी 19 साल में ही हो गई थे। मेरे पति श्री रमेश भाई सर्वोदय आंदोलन में थे। एक शिविर में एक हफ्ते रही तो वहां विनोबा की मानसपुत्री निर्मला देशपांडेय जी जिन्होंने 40 हजार किलोमीटर पदयात्रा की थी। इसी दौरान विनोबा जी के वक्तव्यों से मैं बहुत प्रभावित हुई। हम सब सुबह गाँवों में जाकर श्रम दान करते। लोगों से चर्चा करते।दिन में बौद्धिक चर्चा होती कि गाँवों की ये जो स्थिति है क्यों है और इसमें हम कैसे परिवर्तन ला सकते हैं। मैंने वहीं संकल्प लिया कि हमेशा सामाजिक काम करना है,आजीवन खादी भंडार का कपड़ा पहनना है और आभूषण का परित्याग करना है। इस तरह मैं सर्वोदय कार्यकर्ता बन गई।
 
 
  
तो इसलिए था गांव का विकास होना जरूरी
 
चूंकि हम सब ने ग्रामीण विकास के लिए काम करने का ही संकल्प लिया था अतः 1981 में सर्वोदय आश्रम रजिस्टर्ड हुआ और मैं एक वर्ष बाद अपने 3 और 4 साल के 2 बच्चों के साथ स्थाई रूप से वहां रहने के लिए आ गई। लोग सोचते कि बच्चों को शहर में पढ़ाने की उम्र में हम ऐसी जगह में आ गए जहां कोई स्कूल ही नही है। हम सब ने वहां गांव के बच्चों के लिए स्कूल खोला और वहीं अपने बच्चों को पढ़ाना आरंभ किया। गाँव की शिक्षा की परिस्थिति की भयावहता का पता तब चला जब ढूंढने से भी कोई शिक्षित लड़की पूरे इलाके में नही मिली जिसे हम शिक्षक बना दें। बस तभी से हम सबका जीवन बालिका शिक्षा के लिए समर्पित हो गया।
 
सक्सेस मंत्रा
 
मैंने अपने लिए जो नियम तय किए मैं उन पर अब भी पूरा विश्वास करती हूं। मैं फुल टाइम सोशल वर्कर हूँ तो आश्रम में रहती हूं। मैं गहराई में उतरकर काम करने में यकीन करती हूं।जो बीत गया उसके अनुभव से अपने को कीमती करती जाती हूँ पर कल से कोई लाभ लेने की नहीं सोचती पर आज के लिए भरपूर प्रयास करती हूं। मेरे पास एक अनुभव सम्पन्न, कुशल,समर्पित टीम है जो मेरा आधार है। मैं एक्ट लोकली ,थिंक ग्लोबली में विश्वास करती हूं।
 
 

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