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मकर संक्रांति 2018: जानिए पूजा विधि,स्नान-दान का शुभ मुहूर्त

गृहलक्ष्मी टीम

11th January 2018

खुशी और समृद्धि का व्यौहार मकर संक्रांति, सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है। इस साल मकर संक्राति 14 जनवरी को मनाया जायेगा। इस दिन सूर्य उरायण हो जाता है। मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व उत्तरायण के अविधि काल को देवताओं का दिन कहते हैं।

मकर संक्रांति 2018: जानिए पूजा विधि,स्नान-दान का शुभ मुहूर्त

मकर संक्रांति को देवताओं का प्रभातकाल कहते हैं। गीता में लिखा है कि जो व्यक्ति उत्तरायण में शरीर का त्याग करता है, वह श्री कृष्ण के परम धाम में निवास करता है। पुराणों में इस दिन गंगा नदी में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। इस तिथि पर स्नान व दान करना बड़ा पुण्यदायी माना गया है। इससे जीवन और आत्मा के कारक सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। इस दिन सुबह पवित्र नदी से स्नान कर तिल और गुड़ खाने की परम्परा है। मकर संक्रांति पर तिल का विशेष महत्व है। प्रचलित है कि तिल का दान करने से घर में समृद्धि आती है।

शुभ मुहूर्त

14 जनवरी को सुबह से ही पर्व काल प्रांरभ हो जाएगा। लेकिन पुण्य काल दोपहर 1 बजकर 44 मिनट पर सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश के साथ शुरू होगा। वहीं इस दिन सूर्य अस्त सांय 5 बजकर 40 मिनट पर होगा। इसके चलते श्रद्धालुओं को स्नान-दान के लिए पुण्यकाल 3 घंटे 55 मिनट की अवधि के लिए ही रहेगा। 
 
यह त्यौहार हर प्रदेश में अलग-अलग परम्परा से मनाया जाता है
उत्तर प्रदेश में खिचड़ी बना कर सूर्यदेव को भोग लगाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में फसलें पक जाने के उपलक्ष में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। आसाम में बिहु और दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में मनाते है। महाराष्ट्र में नवविवाहित स्त्रियाँ अपनी प्रथम संक्रांति पर तेल, कपास और नमक का दान सौभाग्यवती स्त्रियों को करती है।
 
मकर संक्रांति पर सूर्य की जल चढ़ाते हुऐ इस मंत्र का 11 बार उच्चारण करना चाहिये।
 
सूर्याय नमः आदित्याय नमः सप्ताचिर्ष नमः
 
अन्य मंत्र- ऊँ घृणि सूर्याय नमः 11 बार इन मंत्रों का उच्चारण कर अपनी मनोकामना माँगे तो सूर्य देव आपकी मनोकामना जरूर पूरी करेंगे।
 
अर्घ के जल में क्या मिलाये - गुड़ और चावल, मकर संक्रांति पर क्या दान करे - कंबल, गुड़, तिल खिचड़ी का दान जीवन में भाग्य लाता है।
 
 
पौराणिक कथाएं
कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। यह भी कहा जाता है कि गंगा को  पर लाने वाले  भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस  तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार  के बाद इस दिन गंगा गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर सागर में मेला लगता है। महाभारत काल  महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत  दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है। यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ।
 
मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा
रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है जिससे संकेत मिलता है कि संभवत: भगवान श्रीराम ने अपने भाइयों और हनुमानजी के संग पतंग उड़ाई थी। पतंग इस बात का संकेत देती है कि पिता-पुत्र के संबंध यदि असहज हो रहे हैं तो आगे बढ़कर उसे सहजता की ओर ले जाना चाहिए- इस संदर्भ में 'बालकांड़' में एक छोटा सा उल्लेख मिलता है. 'राम इक दिन चंग उड़ाई। इंद्रलोक में पहुंची जाई॥'भगवान सूर्य के उत्तरायण होने से देवताओं की शक्ति विशेष रूप से जागृत हुई है। श्रीराम भाइयों और मित्र मंडली के साथ पतंग उड़ाने लगे। वह पतंग उड़ते हुए देवलोक तक जा पहुंची। उस पतंग पर इंद्र के पुत्र जयंत की पत्नी की दृष्टि गई। उन्हें उस पतंग ने बड़ा आकर्षित किया। वह उसे कौतूहल से देखने लगीं। इसी बीच उन्हें ध्यान आया कि आखिर किसकी पतंग इतनी शक्तिशाली है जो देव लोक तक आ पहुंची है। इसके लिए चौपाई आती है'जासु चंग अस सुन्दरताई। सो पुरुष जग में अधिकाई॥' बालक श्रीराम ने बाल हनुमान को कहा कि 'आप तो उड़ने की शक्ति रखते हैं। आप जरा इसका पता लगाएं कि आखिर मेरी पतंग कहां रह गई।' तब पवनपुत्र हनुमान पतंग को खोजते आकाश में उड़ते हुए इंद्रलोक पहुंच गए, वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक स्त्री उस पतंग को अपने हाथ में पकड़े हुए है। उन्होंने उस पतंग की उससे मांग की। उस स्त्री ने पूछा- 'यह पतंग किसकी है?' हनुमानजी ने श्रीरामचंद्रजी का नाम बताया। इस पर उसने उनके दर्शन करने की अभिलाषा प्रकट की और कहा आप मेरा संदेश पहुंचाएं कि यदि दर्शन देंगे तो पतंग को मैं मुक्त कर सकती हूं। हनुमानजी यह सुनकर लौट आए और सारा वृत्तांत श्रीराम को कह सुनाया। श्रीराम ने यह सुनकर हनुमान को वापस वापस भेजा कि वे उन्हें चित्रकूट में अवश्य ही दर्शन देंगे। हनुमानजी ने यह उत्तर जयंत की पत्नी को कह सुनाया, जिसे सुनकर जयंत की पत्नी ने पतंग छोड़ दी। कथन है कि-'तिन तब सुनत तुरंत ही, दीन्हीं छोड़ पतंग। खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग।' यह प्रसंग इस बात का संकेत देता है कि मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

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