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ये हैं डॉ. माला, जिन्होंने बुनाई के जरिए बदल दी लोगों की जिंदगी

गृहलक्ष्मी टीम

6th February 2018

ये हैं डॉ. माला, जिन्होंने बुनाई के जरिए बदल दी लोगों की जिंदगी
 

भारतीय सेना में काम करने से लेकर रेगिस्तानों में काम करना, अच्छी खासी नौकरी को छोड़ कर  पहाड़ों में घर बसाने तक का काम डॉ. माला श्रीकांत ने किया है। जब उनका सामना एक दर्दनाक हादसे से हुआ तो उन्होंने तय किया की वे दूसरे लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने की पूरी कोशिश करेंगी। मेडिकल की समझ के साथ-साथ, रेगिस्तान में रहना, दो बेटियों परवरिश करना और बुनाई की कला के सफर को उन्होंने बखूबी निभाया है। उन्होंने अपने होमटाउन रानीखेत में बुनाई का एक छोटा-सा कारोबार शुरू किया जो देखते ही देखते लोगों के लिए रोजगार का साधन बन गया। 

डॉ माला ने यह साबित किया है कि सबको अपनी कला के प्रति प्यार होना चाहिए। अपने जीवन में इतने उतार-चढ़ाव, चुनौतियों और लड़ाइयों के बाद डॉ माला का अपने जीवन में एक ही मंत्र है कि जिंदगी में सब प्राकृतिक तरह से होने दें और अपने दिल में दया की भावना हमेशा बनाए रखें। 
 
शहर से पहाड़ों में जाकर बसने का लिया फैसला
 
डॉ. माला बतातीं हैं कि मेरे साथ कुछ ऐसी अविश्वसनीय घटनाएं हुई जिनके कारण मेरी जिन्दगी का एक-एक मोती इतने सुंदर धागों में पिर पाया है। मेरा सामना एक ऐसी दुुर्घटना से हुआ जिसमें मेरी यादाशत के साथ-साथ मेरी शारीरिक सुंदरता भी खो गयी। तभी मैंने तय किया कि मैं अपने दिल की बात सुनूंगी और अपनी नई जिन्दगी को पूरे जुनून के साथ जीऊंगी। जब उनकी दोनों बेटियां अपने कामकाजी जिंदगी में व्यस्त हो गयी तब डॉ माला ने अपना शहर अपनी नौकरी, अपने दोस्तों और परिवार को छोड़ने का फैसला किया और रानीखेत के शांत वातावरण में अपना बाकी का जीवन बिताने का फैसला लिया।
 
 
 
मैंने पहाड़ों को इसलिए चुना ....
 
  • एक ऐसा वातावरण जहां में 24/7 बुनाई का काम कर सकूं। एक ऐसी ठंडी जगह जहां ऊन मेरे हाथ में अच्छी लगे और नए-नए पैटर्न मेरे दिमाग में आते रहे। यह सब पहाड़ी इलाके में ही मुमकिन था। 
  • एक ऐसी जगह जो शांत हो, जहां अलग-अलग इवेंट्स की जगह शान्ति ज्यादा हो, पार्टियों की जगह खुशनुमा और मित्रतापूर्ण वातावरण हो और यह भी केवल पहाड़ों में ही मुमकिन था।
  • मेरी बेटियां जब अपने कामों में व्यस्त हो गयी तो मुझे एक सहारे की जरूरत थी लेकिन मैं किसी के लिए बोझ भी नहीं बनना चाहती थी। मैं अपना नया घर एक ऐसी जगह पर बनाना चाहती थी जहां मेरी बेटियां कभी भी मुझसे मिलने आ सकें।
  • यहां रहन-सहन का तरीका इस प्रकार है कि लोगों को खुद के लिए बहुत समय मिलता है और आस-पड़ोस के लोग दूसरों के जीवन में दखलंदाजी नहीं करते। ऐसा नहीं है कि मुझे लोगों से मिलना पसंद नहीं है लेकिन मेरा मानना है कि पार्टियों में ही जाना खुशी का प्रतीक नहीं है। 
 
बुनाई से दिया लोगों को रोजगार
 
अपनी बेटियों के पूरे समर्थन और सहारे के साथ डॉ माला ने रानीखेत जैसे शहर में अपना जीवन शुरू किया और बुनाई की शुरुआत की। रानीखेत आने से बहुत समय पहले उन्होंने अपने आपको उमंग नाम के एक इनिशिएटिव में शामिल किया, जो पहाड़ों में 1000 से भी अधिक बुनाईवालों की चीजें बेचने में मदद करता है। यही नहीं इन लोगों द्वारा बनाए गए उत्पाद फैबइंडिया और हमजोली जैसे ब्राडेड आउटलेट पर मिल जाता है। दिल्ली हाट और अन्य हैंडीक्राफ्ट बाजारों में और रानीखेत की दुकानों में भी आप इनका समान खरीद सकते हैं। 
 
मैं जब भी पहाड़ों पर जाती हूं तो वहां इन बुनाईवालों से मिलती हूं, इनके साथ समय बिताती हूं और इनको अलग-अलग तकनीकें भी सिखाती हूं।उन्हें रंगों का इस्तेमाल करना और साथ ही नए नए पैटर्न्स भी बनाना सिखाती हूं। 3 साल पहले जब मैं रानीखेत रहने आई तब मैंने उमंग के साथ स्थायी रूप से काम करना चाहती थी। डॉ माला कहती हैं कि 1000 से भी अधिक बुनाईकारों के एक संगठन से बेहतर और क्या हो सकता है। 
 
 
 
 
क्वालिटी से नहीं किया समझौता
 
काम तो अच्छा चल रहा था लेकिन बेहतर क्वालिटी न होने की वजह से प्रोडक्ट में शिकायतें आनी लगी। क्वालिटी की एक मांग होती है कि कोई भी काम बिना परफेक्शन के नहीं होना चाहिए। इसके लिए फोकस,समर्पण और प्राथमिकता की आवश्यकता होती है। डॉ माला याद करती हैं कि क्वालिटी कंट्रोल में कुछ कठिन सीखों के बाद और महिलाओं को सहारा व प्रशिक्षित करने के बाद मैंने उमंग को छोड़ा और अपनी आजादी की पहली सर्दी अकेले में बिताई। 
 
बेहतरीन बुनाईकारों से की दोस्ती
 
उस समय वर्ष 2013 में मेरी एक दोस्त मेरी जिंदगी में आई जो खुद पेशे से क्राफ्ट की व्यापारी हैं, जिनकी टीम ने कॉटन व वुलेन की शॉल और स्टोल बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया। पिछले वर्ष से अब तक हम सभी सहेलियों ने बारीक लैस के पैटर्न बुनने सीखें, गलतियों को नजरअंदाज करना सीखा, अच्छे से बुनाई करने की कला और विज्ञान का ज्ञान प्राप्त किया और सबसे बेहतरीन बुनाईकारों से दोस्ती की। 
 
 
 
 
पहाड़ की महिलाओं से मैंने भी बहुत सीखा
 
जब डॉ माला से पूछा गया कि पहाड़ों में बुनाई करने वाली महिलाओं को सहारा देना उन्हें कैसा लगा तो उन्होंने कहा कि सही सवाल यह होगा कि उन लोगों ने मुझे क्या सिखाया। यह सोचना कि पहाड़ों में जाकर वहां महिलाओं की मदद करने से बेहतर यह सोचना है कि वे मुझे बहुत कुछ नया सीखा रही हैं। इस सोच ने मुझे वास्तविकता के करीब रखा है और सफलता से मुझमें घमंड नहीं आने दिया। 
 
कई लोगों के जीवन को किया प्रभावित
 
डॉ माला के इन लोगों के जीवन में मौजूदगी ने इनके जीवन को बहुत तरीकों से प्रभावित किया है। अन्य लाभों के मुकाबले पैसों का लाभ कम होता है। इस ग्रुप ने अपनी कला और उत्पादों को लेकर गर्व महसूस करना सीखा है और ना कि इस कला को एक हॉबी की तरह माना है और अब वे अपने काम पर पूरा ध्यान देती हैं। इस पूरी प्रतिक्रिया में इन्होंने अपने जीवन को एक नई दिशा देना भी सीखा है। 
 
बुनाई के साथ-साथ इन बातों पर भी रहता है फोकस
 
माला बतातीं है कि जब भी ये महिलाएं बुनाई करती हैं तो वे सभी उत्पाद बेचने के लिए बनाती हैं। जब भी हम स्टूडियो में मिलते हैं तो हम अपने परिवार, स्वास्थ, समाज के निषेधों, इत्यादि सभी चीजों की बातें करते हैं। जब लोग मुझे अपने सिंगल स्टेटस के साथ खुश होता हुआ, अपनी अविवाहित बेटियों पर गर्व महसूस करते हुए और शादियों में, काम पर व अन्य सब जगहों पर एक जैसे कपड़े पहनते हुए देखते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि बिना सोचे-समझे समाज की बातों को मानने का कितना बड़ा नुकसान होता है। डॉ माला का यह भी कहना है कि स्वास्थ का ख्याल रखना, गर्भवस्था पर काबू करना, अपने काम को सबसे अधिक महत्व देना, सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाकर एक-दूसरे की मदद करने जैसे प्रोग्राम काम के बीच में भी चलते रहते हैं।
 
 
 
उद्देश्य
 
क्वालिटी को ध्यान में रखते हुए मेरा अब लक्ष्य यह है कि किसी तरह इन मेहनती बुनाईकारों के उत्पाद बड़े बड़े बाजारों में पहुंचा सकूं। मैं कुछ ऐसे ग्राहकों का एक ग्रुप बनाना चाहती हूं जो दिल से हमारे इन अनोखे उत्पादों को खरीदना पसंद करते हों। अपनी पहुंच बढ़ाना हमारे इस प्रोजेक्ट का दूसरा बड़ा लक्ष्य है। साथ ही मैं बुनाई के माध्यम से कुछ ना कुछ नया बनाने पर ध्यान देती रहूंगी। जल्द ही जुराबों और कैप की जगह हम अब स्कार्व्ज, लैस, शॉल और लम्बे मफलर्स भी बनाने शुरू करेंगे। माला का ख्वाब यह है कि किसी तरह वे लोगों के बीच बुनाई के कपड़ों को लोगों के बीच प्रचलित कर सकें। 
 
आर्म्ड फोर्सेज से लेकर रेगिस्तान तक, शहर से लेकर पहाड़ों तक, डॉ. माला का सफर कुछ ऐसा रहा है, जिसके कारण उन्होंने हमेशा समाज को कुछ देने के बारे में ही सोचा है। 
 
अक्सर लोग यह कहते हैं कि सफलता एक सफर है ना कि अंतिम स्थान। फल की चिंता करने से बेहतर होता है कि हम समाज के लिए कर्म करते रहें। डॉ माला श्रीकांत एक ऐसा उदहारण है, जिससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें सफलता तभी प्राप्त हो सकती है  जब हम अच्छे काम करते रहेंगे। 
 
 

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