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Organ Donation: क्यों हैं महिलाएं आगे 

हर्ष अरोड़ा

5th June 2018

कहते हैं दुनिया में हमेशा जिन्दा रहने का सबसे बेहतरीन और वैज्ञानिक तरीक है अंगदान। अंगदान करके मृत्यु के बाद भी किसी के काम आने का सुकून और पुण्य मिलता है।

Organ Donation: क्यों हैं महिलाएं आगे 

22 मई 2018 को बांग्‍लादेश से निर्वासित मशहूर लेखिका तस्‍लीमा नसरीन ने जब दिल्ली के एम्स में रिचर्स के लिए अपना शरीर डोनेट किया तो एक बार फिर से उस बहस को हवा मिल गयी कि भारत में सबसे ज्यादा शरीर या अंगदान सिर्फ महिलाएं ही क्यों करती हैं?

एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ एनॉटमी की डॉनर स्लिप में आप जब तस्लीमा का नाम पढ़ते हैं तो आपको एम्स के ही उस सर्वे पर भी गौर करना चाहिए जो बताता है कि अलग-अलग मामलों में किडनी डोनरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 92.5 प्रतिशत है और पुरुषों की महज 7.5 प्रतिशत. इनमें ज्यादातर महिलाएं पतियों के लिए अंगदान करती हैं। इसके अलावा अन्य मेडिकल संस्थाओं के शोधार्थियों द्वारा जमा किये आंकड़े बताते हैं कि अंगदान करने वाले परिजनों में 85% तक महिलाएं हैं, जबकि अंग पाने वालो में सिर्फ 10% महिलाएं हैं। यानी महिलाओं से ओर्गंस डोनेट तो करवा लिए जाते हैं लेकिन उनकी जरूरत पर उन्हें कोई दाता नहीं मिलता।

 

कमजोर औरत के बुलंद हौसले

मेडिकल जर्नल की एक रिसर्च की मानें तो हर वर्ष लाखों इंसानों को अपनी जान समय रहते डोनर न मिलने के चलते गंवानी पड़ती है। इसके पीछे एक कारण पुरुषों की उदासीनता या कहें स्वार्थ भाव है। जबकि आमतौर पर कमजोर, अबला और पराश्रित कही जाने वाले महिला अंगदान के मामले में इनसे ज्यादा उदार और मजबूत दिखती है। मजे की बात यह है कि करीब प्रतिशत महिलाएं अपने पति या किसी करीबी की जान बचाने अंगदान करने का साहस जुटाती हैं। और जिन पतियों के लिए महिलाएं अंगदान करती हैं वे अपनी बारी आने पर पलटकर भाग जाते हैं। डोनर मामले में पुरुष-महिला का यह अनुपात 80:20 का है।

 

भावनात्मक मजबूरी या आर्थिक दबाव

हैदराबाद में हुआ एक अध्ययन बताता है कि जो महिलाए आर्थिक तौर पर मजबूत हैं वे आसानी से अंगदान नहीं करती। इस से साफ़ होता है की ज्यादातर मामलों में महिलाओं से उनकी असल मर्जी के खिलाफ अंगदान करवाया जाता है। कभी भावनात्मक स्तर पर तो कभी  मां-बाप या बच्चे का हवाला देकर। क्योंकि वे आर्थिक स्तर पर किसी और पर आश्रित रहती हैं। इस पूरे मामले में कड़वा सच यही है। गुजरात में तो किडनी मैरिज का चलन है। जहाँ लड़के वालों ऐसी महिला खोजते हैं जो उन्हें किडनी देने के लिए मेडिकली फिट हो और काम निकलने के बाद वे उन्हें तलाक दे देते हैं। डॉक्टर भी इस बात की तस्दीक करते हैं।

 

अभिनेत्रियाँ भी हैं आगे

आज फिल्म जगत में महिलाएं ही पुरुष अभिनेताओं की तुलना में ज्यादा सक्रिय नजर आती हैं। नीले आँखों वाले खूबसूरत एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय बच्चन ने कई साल पहले जब आंखें दान की तो इस चलन को बढ़ावा मिला। उसके बाद से अब तक आमिर खान के पत्नी किरण राव, जया बच्चन, रानी मुखर्जी, दबंग गर्ल सोनाक्षी सिन्हा, कृति सेनन, देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा, फाराह खान, नंदिता दास आदि आँखें या बौडी ओर्गंस या फुल बॉडी डोनेट कर चुकी हैं।

 

कैसे बना अंग प्रत्यारोपण कानून

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि पहले अंगदान को लेकर कोई खास जागरूकता या कानून नहीं था। 80 के दशक में चिकित्सा जगत की उन्नति के चलते भारत में अंग प्रत्यारोपण की मांग बढ़ी लेकिन साइड इफेक्ट यह हुआ कि ओर्गंस का ब्लैक मार्केट भी पैदा हो गया। लिहाजा 1994 में भारत में पहली बार मानव अंग प्रत्यारोपण और अंगदान को नियमित करने के लिए कानून बना। बाद में साल 2011 में इस कानून में कई सुधार भी हुआ। अंग प्रत्यारोपण अधिनियम भी सबसे पहले फर्स्ट डिग्री रिलेटिव को प्राथमिकता देता है। बहरहाल मौजूदा कानून के हिसाब से अगर कोई महिला या पुरुष अपने ऑर्गन या बॉडी डोनेट करता है तो इसकी परमिशन के मामले में दो कटेगरी बनाई गई है। अगर कोई रिश्तेदार है तो उसके अंगदान की मंजूरी अस्पताल की कंपिटेंट अथॉरिटी देगी। कंपिटेंट ऑथोरिटी इस मामले में खुद अस्पताल है।

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