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नशे की गिरफ्त में आधी आबादी:अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस

हर्ष अरोड़ा

26th June 2018

आज यानी 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस मनाया जाता है। इस दिन पुरुषों में बढ़ती नशाखोरी के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाते हैं, सेमीनार करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि नशा महिला और पुरुष में कोई फर्क नहीं करता।

नशे की गिरफ्त में आधी आबादी:अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस
आजकल नशा पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को अपना शिकार बना रहा है। सुनने में भले ही अटपटा लगे लेकिन यह सच है कि शराब, सिगरेट जैसे नशे अब सिर्फ पुरुषों के ही शौक नहीं रह गए हैं बल्कि आधी आबादी भी इसकी चपेट में आ चुकी है और इस का नुकसान पारिवारिक विघटन के तौर पर देखने को मिल रहा है। पुरुषों से बराबरी और हाई सोसायटी के भ्रम के चलते अमीर व शिक्षित महिलाओं में ही नहीं, कम आय वर्ग की महिलाओं में भी यह बुराई पैर पसार रही है। यही वजह है कि वाइन और लिकर शॉप्स में युवकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में युवतियां भी शराब और बीयर खरीदती दिखाई देती हैं। आलम यह है कि  पश्चिमी देशों में महिलाओं ने शराब पीने के मामले में पुरुषों की बराबरी कर ली है। एक सर्वे के मुताबिक 18 से 27 वर्ष की उतनी ही महिलाएं शराब पी रही हैं जितने पुरुष।
 
स्टेटस के चक्कर में चढ़ा नशे का शौक
 
आजकल पार्टीज, फंक्शन और फैमिली गेट टूगेदर में पुरुष के साथ महिलाओं को भी शराबनोशी करते देखा जाता है। इस ट्रेंड को पुरुषों ने भले ही बढ़ावा दिया हो लेकिन महिलाएं भी हाई क्लास सोसायटी और मॉडर्न लेडी बनने के चक्कर में एक दो पैग लगा लेती हैं। बाद में यही शौक आदत बन जाता है और स्टेटस सिंबल भी। 
 
आस्ट्रेलिया की ‘यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साऊथ वेल्स’ के ‘नशा एवं अल्कोहल अनुसंधान केन्द्र’ द्वारा विश्वव्यापी शोध के अनुसार शराब पीने के मामले में महिलाएं भी पुरुषों के कदम से कदम मिला कर चल पड़ी हैं। विशेष रूप से गत 2 दशक में युवाओं और महिलाओं में शराब पीने का रुझान बढ़ा है और भारत में लगभग 35 प्रतिशत पुरुष तथा 5 प्रतिशत से अधिक महिलाएं इसकी लपेट में आ चुकी हैं। नतीजतन कभी न पीने वालों की संख्या लड़कियों में 50 प्रतिशत से घट कर 30 प्रतिशत रह गई है।
 
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि परिवार और समाज में  बढ़ रहा वैचारिक खुलापन, फाइनेंशियल लिबर्टी और आत्मनिर्भरता के साथ काम के बढ़ते तनाव महिलाओं को नशे की लत में डाल रहे हैं।
 
 
उजड़ते रिश्ते और परिवार
 
नशे की लत के चलते कई बार महिलायें सीमा लांघ जाती हैं  और कई बार लोग उनके नशे का फायदा उठाकर दुष्कर्म कर बैठते हैं। आये दिन खबरें आती हैं कि पब और क्लब में नशे में डूबी लड़की से छेड़छाड़ या दुष्कर्म हुआ। इसके अलावा शराब पीने से अनेक गंभीर रोग होते हैं। इससे होने वाली मौतों के चलते बड़ी संख्या में परिवारों के परिवार उजड़ रहे हैं, फिर भी महिलाएं शराब पीने से बाज नहीं आ रही हैं। प्रमुख औद्योगिक देशों के ‘आर्थिक सहयोग और विकास संगठन’ (ओ.ई.सी.डी.) के अनुसार विश्व में एड्स, और टी.बी. जैसे रोगों से होने वाली मौतों से भी ज्यादा शराब पीने से हो रही हैं और शराब विश्व में मौतों और विकलांगता का पांचवां सबसे बड़ा कारण बन गई है। जाहिर यह इसमें कुछ प्रतिशत महिलाओं का भी होगा।
 
 
नशे की मार पुरुषों से ज्यादा महिलाओं पर
 
महिलाएं सोचती हैं कि अगर पुरुष शराब पीकर मस्त हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं पी सकतीं। ऐसा नहीं है। हाल के शोध बताते हैं कि नशे के घातक परिणाम पुरुषों के मुकाबले महिलाओं पर ज्यादा दिखते हैं। डॉक्टर रवि बिश्नोई के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं की शारीरिक संरचना भिन्न होने के कारण उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए शराब पीना अधिक घातक है। महिलाओं के शरीर में पुरुषों से कम पानी होता है और उनका लिवर भी पुरुषों की तुलना में छोटा होता है। इस कारण उन पर शराब का दुष्प्रभाव अधिक पड़ता है। इसके अलावा रिसर्च कहती हैं कि  प्रति सप्ताह शराब के 14 या अधिक ‘पैग’ पीने वाली महिलाओं में गर्भ धारण क्षमता 18 प्रतिशत तक घट जाती है। इतना ही नहीं सड़क दुर्घटनाओं में नशे में वाहन चला रही युवतियां शामिल पाई गई हैं। 
 
 
क्या है सॉल्यूशन 
 
सरकार के नशा विरोधी प्रचार अभियान का कोई असर हो ही नहीं रहा। ऐसे में महिलाओं को नशे से दूर रखने का सॉल्यूशन हमें खुद ही निकलना होगा। यह समाधान नशे की लत के पीछे छिपे कारणों में ही मिलेगा। दरअसल महिलाओं को इसकी लत घर से ही लगती है। विवाहित शिक्षित महिलाओं में अत्यधिक तनाव, अकेलेपन के अहसास के कारण नशीली दवाएं और अल्कोहल के सेवन के मामले बढ़ रहे हैं। कोई घर का सदस्य पीता है तो महिलाओं का भी मन करता है। इसके अलावा घरेलू कलह और तनाव आने पर महिलाएं नशा करने लगती हैं। वहीं 30 से 40 वर्ष में नशे की आदी महिलाओं का मेन रीजन घरेलू कलह ही होता है। 
इसके लिए घर में शांति का माहौल पैदा करना होगा ताकि तनाव और कलह नशे का बहाना न बने। दिखावे के कल्चर से भी बाहर निकलना होगा। हाई  सोसाइटी में हाई दिखने के लिए भी  महिलाओं को नशे के लिए पुरुषों को मजबूर करना बंद करना होगा। याद रखें नशा महिलाओं को डिप्रेशन का शिकार बना सकता  है। बांझ बना सकता है। घर बिखरा सकता है और हिंसक माहौल भी पैदा कर सकता है। इसलिए नशे के खिलाफ महिलाओं को खुद कमर कसनी होगी तब जाकर सही मायनों में अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस सार्थक होगा।
 
 
 

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