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क्यों डराते हैं इनफर्टीलिटी से जुड़े ये मिथक

रश्मि द्विवेदी

1st August 2018

क्यों डराते हैं इनफर्टीलिटी से जुड़े ये मिथक
देर से शादी और अधिक उम्र में प्रेग्नेंसी व अन्य कई वजहों से आज बांझपन {इनफर्टीलिटी} एक आम समस्या बन चुकी है। ना जानें कितनी महिलायें इस समस्या से छुटकारा पाने के लिये डॉक्टर के क्लिीनिक के चक्कर काटती रहती हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि आज के दौर में इस समस्या से निपटने के लिये कई निदान व उपचार मौजूद हैं लेकिन आज भी बांझपन को लेकर लोगों में कई तरह की गलत धारणाएं बनी हुई हैं जो कि कपल्स को दुविधाओं में डाल देती हैं। डॉयरेक्टर ऑफ एससीआई हेल्थकेयर व आईवीएफ एक्सपर्ट डॉक्टर शिवानी सचदेव गौर का कहना है कि इन मिथकों के पीछे पुरानी कहानिया और गलत फैली हुई सूचनाएं हैं। आईये एक नजर डालते हैं उन कुछ मिथकों के बारे में-
 
मिथक 1 - फर्टीलिटी ट्रीटमेंट से गुजरने वाली महिलाएं जुड़वां या तीन बच्चों को जन्म दे सकती हैं। 
तथ्य- हालांकि बांझपन उपचार के मामले में जुड़वां बच्चों की संभावना सामान्य से अधिक होती है लेकिन अधिकतर महिलाओं ने एक बच्चे को जन्म दिया है। आईवीएफ व आईसीएसआई की मदद से औसतन 22.6  गर्भधारण के मामले में जुड़वां और 1.5  मामलों में इससे ज्यादा {तीन या चार बच्चों} के मामले सामने आए हैं। इसका उम्र से भी संबंध माना जा सकता है। आईवीए की मदद लेने वाली 35 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के लगभग एक.तिहाई मामलों में जुड़वां बच्चों का मामला सामने आया है जबकि 42 वर्ष से अधिक की महिलाओं में यह 10  से भी कम है। 
मिथक 2- तनाव आईवीएफ की सफलता दर को कम करता है।
तथ्य- रोजमर्रा का तनाव आईवीएफ के परिणाम को पर कोई बुरा असर नहीं डालता है। अगर कोई महिला अत्यधिक तनावग्रस्त है तो इसका असर दैनिक कार्यों व पारिवारिक जीवन पर पड़ता है जिसका दुष्प्रभाव प्रजनन क्षमता पर पड़ सकता है। तनाव अपने आप में एक समस्या है न कि बांझपन का कारण।
 
मिथक 3 -  मेरा मासिक चक्र सामान्य है। इसलिए मेरी प्रजनन क्षमता सही है।
तथ्य- अधिकतर मामलों में नियमित चक्र का मतलब आपके अण्डाणु नियमित तरीके से बाहर आ रहे हैं लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उसकी गुणवत्ता भी ठीक है। इसके लिए {एफएचएस, एलएच, एस्ट्रेडियल, एएमएच जैसे} हॉर्मोन एनेलाइसिस की मदद लेनी चाहिए, जिससे ओवेरियन के बारे में बेहतर जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
 
मिथक 4 - महिला की खान-पान की आदत और वजन का उनकी प्रजनन क्षमता और उसके उपचार परिणामों पर कोई असर नहीं होता।
तथ्य- खराब पोषण का प्रजनन क्षमता पर प्रभाव पड़ सकता है। 30 से अधिक बॉडी मास इंडेक्स {बीएमआई} या गंभीर रूप से कम वजन वाली महिलाओं में हॉर्मोन के असंतुलन होने की वजह से गर्भधारण में समस्याएं आ सकती हैं।
 
मिथक 5 - आईवीएफ महिला के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। 
तथ्य- यह नुकसानदायक नहीं है। अच्छे डॉक्टर की निगरानी में यह बिल्कुल सुरक्षित है। सिर्फ 1.2 मरीजों में ओवेरियन हाइपरस्टीमुलेशन {डिम्बग्रंथी में अत्यधिक उत्तेजना} की वजह से समस्या हो सकती है। कुछ खास रोकथाम उपायों की मदद से इसकी संभावना कम की जा सकती है। 
 
मिथक 6 - भ्रूण हस्तांतरण के बाद पूर्ण आराम जरूरी है।
तथ्य- ऐसी कोई सलाह नहीं दी जाती बल्कि सलाह दी जाती है कि महिलाएं अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस लौट सकती हैं।
 
मिथक 7- पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता।  
तथ्य- कुछ पुरुषों में जिनमें किसी कारणवश शुक्राणुओं की संख्या कम या ना के बराबर होती है तो ऐसी स्थिति का उपचार संभव होता है। इस स्थिति में पुरुष के प्रजनन अंग से सीधे शुक्राणु एकत्र कर आईवीएफ में इस्तेमाल किया जा सकता है। 
 
मिथक 8- आईवीएफ की मदद से डिजाइनर बेबी हासिल किया जा सकता है।
तथ्य- कद-काठी, आँखों का रंग, बालों का रंग आदि जैसे सौंदर्य लक्षण का चयन संभव नहीं है। लेकिन प्रीइम्लान्टेशन जेनेटिक डायग्नोसिस {पीजीडी} एक प्रक्रिया है जिससे भ्रूण में वंशानुगत गड़बड़ियों की पहचान में मदद मिलती है और इसकी वजह से बच्चे को खास वंशानुगत बीमारियों से बचाया जा सकता है।   
 
बांझपन से जूझ रहे जोड़ों को उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए और उन्हें किसी आईवीएफ विशेषज्ञ से सलाह जरुर लेनी चाहिए क्योंकि प्रत्येक जोड़े को पितृत्व व मातृत्व हासिल होने का अधिकार है।
 
 
 

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