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पहाड़ो के तूफान झेल बनीं लक्ष्मीबाई

शालू अवस्थी

9th August 2018

आज महिलाएं किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं, वे हर मैदान में पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। उनके लिए कोई भी काम  अगर वे ठान लें, तो जिंदगी की कोई भी जंग जीत सकती हैं।

पहाड़ो के तूफान झेल बनीं लक्ष्मीबाई

लखनऊ के अलीगंज में रहने वाली तूलिका रानी ने भी कुछ ऐसा ही किया और आज वो तमाम महिलाओं के लिए मिसाल बन कर उभरी हैं। अपने साहस और हौसले से वह अब तक 11 बार अलग-अलग पर्वतों की चोटी पर चढ़ चुकी हैं। उनकी उपलब्धियों के लिए राज्य सरकार ने उन्हें साल 2016 में रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार से भी नवाजा था। उनके अब तक के सफर और आगे की योजनाओं के बारे में उन्होंने हमसे की खास बातचीत:

तूलिका कहती हैं कि सफलता के पीछे दो कारण होते हैं, एक तो मेहनत और दूसरा पैरंट्स  और घरवालों का सपोर्ट। मेरे पास ये दोनों ही हैं। वह बताती हैं, ‘मैंने 2009 से माउंटेनियरिंग शुरू की थी। अभी तक मैं 11 अलग-अलग पर्वतों की चोटियां फतेह कर चुकी हूं।

इनमें भारत के साथ-साथ दूसरे देशों के भी पर्वत शामिल हैं।’ उन्होंने बताया कि मुझे हमेशा से प्रकृति से लगाव रहा है, खासतौर से सनराइज और सनसेट देखने का। इसी शौक ने मुझे यहां तक पहुंचा दिया। मांउटेनियरिंग की शुरुआत के बारे में वे कहती हैं, ‘एयरफोर्स में नौकरी के दौरान मेरी पोस्टिंग दार्जिलिंग में थी।

उसी वक्त एयरफोर्स के एक प्रोजेक्ट के लिए कुछ रिसर्चर्स को शॉर्टलिस्ट किया गया। मैं भी उस ग्रुप में शामिल थी। इसके बाद से ही मुझमें पर्वतारोहण का शौक जागा। वे कहती हैं अक्सर ऐसा होता है कि घरवालों से जब ऐसे शौक का जिक्र करो, तो वे मना कर देते हैं लेकिन मेरे घरवालों ने हमेशा मेरा साथ दिया और सपोर्ट किया और .यही कारण है कि मैंने अपना मुकाम हासिल किया.

 

उन्होंने अपने सफर की चुनौतियों का भी जिक्र किया, वे कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि ये सफर हमेशा से आसान था। कई बार मेरे सामने मुश्किलें आईं और मैं जिंदगी की जंग हारने वाली थी। बात 2012 की है जब मैं एवरेस्ट पर गई थी। आधी चढ़ाई के बाद मुझे वापस आना पड़ा। आने के बाद पता चला कि ठंड की वजह से मेरी उंगलियां खराब हो गई हैं और उन्हें काटना पड़ेगा। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और ईश्वर की कृपा से मेरी उंगलियां बच गईं। माउंटेनियरिंग मेरा पैशन है और मैं किसी भी कीमत पर इसे नहीं छोड़ सकती। इसके अलावा भी कई ऐसे मौके आए जब मेरी जिंदगी खतरे में पड़ गई। ऐसा ही एक और किस्सा है माउंट कॉमिट की चढ़ाई का।

वहां अचानक तूफान आ गया था और लगा कि अब जान नहीं बच पाएगी। जान बचाने के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ी कि मौत आसान लगने लगी। लगातार 6 घंटे तूफान में फंसे रहने के बाद मैं वहां से निकल पाई। उन्होंने बताया कि 2012 में मैंने डिसाइड किया कि मैं पहाड़ पर खुद जाऊंगी। इसके लिए मैंने ऑफिस से 60 दिन की छुट्टी ली। मैंने साल भर की छुट्टी एक बार में ही ले ली। इस एडवेंचर में मेरे 21 लाख खर्च हो गए। सबने इसके लिए मुझे काफी ताने मारे पर मैंने अपने पैशन के आगे किसी की नहीं सुनी।



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