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बोझिल पलकें- उपन्यास अंश- भाग-1

रानू

10th August 2018

उपन्यास जगत में रानू का नाम भाव और शब्दों के दिग्गज खिलाड़ी के रूप में लिया जाता है। अब आप उनका शानदार उपन्यास बोझिल पलकें सीधे गृहलक्ष्मी की वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं। प्रस्तुत है इसका पहला भाग-

बोझिल पलकें- उपन्यास अंश- भाग-1

रेलगाड़ी ने अपनी गति पकड़ ली, परन्तु गति पकड़ने से पहले एक अपराधी की तलाश में पुलिस के कुछेक व्यक्ति भी इस पर चढ़ चुके थे। अपराधी पहली श्रेणी के आगे वाले डिब्बे में चढ़ा था तथा पुलिस के व्यक्ति पहली श्रेणी के पीछे वाले डिब्बे में। पुलिस को अपराधी से अधिक उस मूर्ति की आवश्यकता थी, जो मन्दिर से चुराई गई थी। भगवान कृष्ण की मूर्ति सोने की थी, चार हजार वर्ष पुरानी। 

पंडितों तथा धर्म के ठेकेदारों ने जुलूस निकालकर जिलाधीश से मांग की थी कि मूर्ति का पता शीघ्र ही लगाया जाए। ऐसा न हो कि मूर्ति विदेश में स्मगल हो जाए। यही कारण था कि शहर से बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर पुलिस खड़ी थी। हर यात्री को संदेह की दृष्टि से देखती थी। जिस पर जरा भी संदेह होता, उसकी तलाशी अवश्य लेती, चाहे वह कोई भी हो। पुलिस को इस व्यक्ति पर भी संदेह था, जो रात में गाड़ी चलने के बाद प्लेटफॉर्म पर प्रकट हुआ और लपककर ट्रेन में चढ़ गया था। दाढ़ी, मूंछ तथा पगड़ी में वह एक सरदार हो सकता था या सरदार के भेष में एक अपराधी। हाथ में एक सूटकेस भी था। 

अजय ने डिब्बे में चढ़ने के बाद चैन की एक सांस ली। फिर आगे बढ़ गया, उस ओर जिधर कंडक्टर नहीं था। ठंड बला की पड़ रही थी, इसलिए सबने अपने फर्स्ट क्लास के केबिन अन्दर से बंद कर रखे थे। फिर भी अन्त में एक केबिन के द्वार की मुठिया उसने सरकाई तो द्वार खुल गया। अन्दर कोई भी नहीं था, परन्तु सामान किसी का अवश्य वहां रखा हुआ था। केवल एक ही बर्थ पर बिस्तर बिछा हुआ था। अजय ने तुरन्त सूटकेस खाली बर्थ के नीचे सरकाया, अपनी पगड़ी तथा दाढ़ी, मूंछ उतारने के बाद एक खिड़की खोली और इन वस्तुओं को बाहर अन्धकार की खाई में फेंक दिया। खिड़की उसने पहले समान ही बन्द कर दी। ठंड के कारण सभी खिड़कियां बंद थीं। फिर अजय ने अपना कोट उतारकर पलटा। कोट दूसरी ओर सफेद चैकदार था। उसने इसे पहना और फिर पॉकेट से एक मैगजीन निकालते हुए बर्थ पर बैठकर इसे पढ़ने लगा।

सहसा केबिन का द्वार सरका। अजय ने धड़कते दिल के साथ देखा, परन्तु तभी उसकी आंखें ठिठक गईं। दिल की धड़कन में कुछ मिठास उत्पन्न हुई। केबिन का यात्री कोई पुरुष नहीं था, एक लड़की थी। उसके एक हाथ में टॉवल था, दूसरे हाथ में साबुनदानी।

लड़की ने उसे देखा। उसके मस्तक पर बल पड़ गए। उसके केबिन में यह नवयुवक कहां से आ टपका! कंडक्टर ने तो कहा था कि इस केबिन में किसी महिला को ही स्थान दिया जाएगा या फिर किसी वृद्ध व्यक्ति को! उसने केबिन का द्वार नहीं बन्द किया और चुपचाप अपनी बर्थ पर आकर बैठ गई। उसने अपने खाने का डिब्बा निकाला और फिर खिड़की के समीप बनी मेज पर रखकर उसे खोलने लगी। तभी केबिन के सामने एक पुलिस इंस्पेक्टर आया। उसने भेदभरी दृष्टि से अन्दर झांका। अजय ने अपना ध्यान खिड़की के समीप रखे खाने के डिब्बे पर इस प्रकार समेट लिया, मानो वह अपनी पत्नी के साथ खाना खाने वाला है। इंस्पेक्टर ने पूछा, ‘इधर आपको सरदार जी तो नहीं दिखाई पड़े?’

‘जी नहीं।’ अजय ने तुरन्त उत्तर दिया।

इंस्पेक्टर ने आश्चर्य प्रकट किया। फिर अपने हाथ से द्वार बन्द करने से पहले बोला, ‘एक अपराधी इसी गाड़ी में है, इसलिए आप इसे अन्दर से लॉक कर लीजिए।’ इंस्पेक्टर ने द्वार बन्द किया और फिर चला गया।

अपराधी! लड़की कांप गई। उसने अजय को देखा। अजय उठकर अन्दर से द्वार लॉक कर रहा था। लड़की को तुरन्त याद आया। इंस्पेक्टर को किसी सरदार जी की तलाश है। उसने संतोष की सांस ली, परन्तु फिर एक और भय उसके मन में उत्पन्न हो गया। क्या इस व्यक्ति के साथ अकेले यात्रा करना सुरक्षित होगा?

 

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