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बोझिल पलकें- भाग 4

रानू

30th August 2018

रेल का सफ़र तो अजय पूरा कर चुका था, लेकिन उसका मन कहीं अंशु के पीछे ही चला गया। उसे अपने जीवन में जिस आशा की किरण की आस है, क्या अंशु वह किरण बन पाएगी?

बोझिल पलकें- भाग 4

गाड़ी रुक गई। अंशु ने अपना पर्स उठाया और प्लेटफॉर्म पर उतर गई। उसके पीछे अजय भी था- अपना सूटकेस उसने हाथ में लटका लिया था। प्लेटफॉर्म पर वह एक किनारे खड़ा हो गया। उसने देखा, अंशु ने मीना के कूल्हे पर बहुत जोर की चिकोटी काटी, कुछ इस प्रकार कि मीना दर्द से तिलमिला उठी। उत्तर में मीना ने भी उसे चिकोटी काटने का प्रयत्न किया, परन्तु अंशु चहककर अपना दामन बचा गई। अंशु मीना की इस असफलता पर उसे अंगूठा दिखाते हुए बहुत जोर से ठहाका लगाने लगी।

प्लेटफॉर्म पर भरी जनता के सामने यह सब देखकर अजय को ज्ञात हो गया कि अंशु जितनी सुंदर है, उतनी चंचल भी है। मीना के साथ कार ड्राइवर की वर्दी में एक व्यक्ति भी उपस्थित था। वह तुरन्त गाड़ी के डिब्बे में जाकर अंशु का होलडाल बांधने लगा। एक कुली उसका सामान बाहर निकालने लगा।

‘मम्मी क्यों नहीं आईं?’ अंशु ने इधर-उधर देखकर चिंता प्रकट की।

‘तेरी मम्मी ने गाड़ी भेजकर मुझे रिंग कर दिया था कि बंगले में कुछ मेहमान आ गए हैं, इसलिए मैं ही तुझे स्टेशन पर रिसीव कर लूं!’ मीना ने उत्तर दिया।

‘ओह!’ अंशु ने चैन की सांस ली।

कुछ देर बाद जब कुली सामान उठाकर ड्राइवर के साथ निकास द्वार की ओर बढ़ने लगा तो अंशु तथा मीना भी उस ओर चल पड़ीं। अजय ने देखा तो वह भी कुछ दूरी रखता हुआ पीछे-पीछे चल पड़ा। बाहर अनेक टैक्सियों के मध्य एक लम्बी तथा सफेद विदेशी कार खड़ी हुई थी। ड्राइवर ने इसकी डिक्की खोलने के बाद कार के पिछले गेट भी खोल दिए। अंशु तथा मीना चहकती हुई अन्दर बैठ गईं, परन्तु तभी अंशु अजय को अपनी ओर आकृष्ट देखकर चौंक गई। पल भर के लिए उसके चहकते मुखड़े पर गम्भीरता छा गई। मस्तक पर बल पड़ गए। अपनी दृष्टि फेरकर वह मीना से बातें करने लगी। ड्राइवर ने सामान रखने के बाद अंशु से कुछ पैसे लेकर कुली को दिये और फिर कार लेकर एक ओर बढ़ गया। अजय ने कार का नम्बर नोट किया और फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा।

अजय अपने घर पहुंचा- एक छोटा तथा अच्छा मकान। घर के सामने एक पुरानी फिएट खड़ी हुई थी। अन्दर जाकर उसने सूटकेस अपने पिता के हवाले कर दिया। उसके पिता- दीवानचन्द, सिर पर छोटे-छोटे सफेद बाल, मुखड़े पर आयु के विचार से झुर्रियां अधिक थीं। सदा सिगार पीते रहना उनकी आदत बन चुकी थी। रक्त के समान नस-नस में शराब दौड़ रही थी। उसके पिता ने नाम के लिए एक छोटा-सा व्यापार कर रखा था, परन्तु असली कमाई तो चन्दानी का काम करके ही होती थी। अपने बॉस की आज्ञा पर वह आरम्भ में तो स्वयं दूसरे शहर जाते और चन्दानी के व्यक्तियों से चुराया माल लेकर बम्बई चले आते थे। ऐसा करते समय उन्हें भी कभी-कभी अपना भे बदलना पड़ता था। अब यही काम अजय कर रहा था।

 

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