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बोझिल पलकें- भाग 6

रानू

4th September 2018

एक सफ़र के साझेदार रहे और फिर जुदा होकर अपनी-अपनी राह चल पड़े अजय और अंशु को किस्मत ने फिर एक बार आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया था। क्या होगा इस मुलाकात का अंजाम, जानिए आगे पढ़कर।

बोझिल पलकें- भाग 6

अजय अपने पिताजी के साथ चन्दानी के बंगले पर पहुंचा। चारदीवारी से बाहर अनेक कारें एक पंक्ति में लगी हुई थीं। सड़क के किनारे उसी कतार में अपनी गाड़ी भी लगाकर अजय दीवानचन्द के साथ अन्दर पहुंचा।

चन्दानी रंधीर के साथ खड़ा मेहमानों का स्वागत कर रहा था। दीवानचन्द रंधीर को पहले से जानते थे, परन्तु अजय की भेंट रंधीर से पहली बार हुई तो पहली ही दृष्टि में रंधीर उसे पसन्द नहीं आया। भेड़ के समान सिर पर घुंघराले बाल, चुंदी आंखें, चौड़े होंठ। फिर भी उसने अपने आपको रंगीन वस्त्रों द्वारा एक राजकुमार बनाने का प्रयत्न किया था। वह फिल्मी अभिनेताओं के समान बात कर रहा था। अजय उससे मिलने के बाद एक किनारे जाकर खड़ा हो गया। दीवानचन्द को बातें करने के लिए कुछेक परिचित लोग मिल गए।

सहसा अजय की दृष्टि ठिठक गई। आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। लॉन में एक किनारे अंशु खड़ी हुई थी। रेशमी छल्लेदार लटों में उसकी सुन्दरता देखते ही बनती थी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में पहले से भी अधिक चमक थी। पलकें कुछ अधिक ही बोझिल थीं। उस दिन के समान यात्रा की थकावट नहीं, वरन मुखड़े पर फूलों-सी ताजगी थी- होंठों पर कलियों समान मुस्कान।

उसने इस समय मैक्सी चोगा समान ऐसा घेरदार, परन्तु अत्यन्त सुन्दर वस्त्र, जो गर्दन तथा कलाई से लेकर पैर के टखनों को भी ढांके रहता है, पहन रखी थी। उसके साथ एक प्रौढ़ व्यक्ति तथा एक स्त्री थी। दोनों का रंग अंग्रेजों के समान सफेद था। शायद ये अंशु के माता-पिता थे। साथ में एक नवयुवक भी था। रंग सांवला था, इसलिए अजय को विश्वास होने लगा कि वह अंशु का भाई नहीं हो सकता। ऐसा विश्वास करते हुए अजय के दिल में एक टीस-सी उठी। डाह का कांटा चुभ गया था। कौन हो सकता है वह नवयुवक? कौन?

चन्दानी ने अपने लड़के से सभी की भेंट कराई, परन्तु रंधीर के मुखड़े से स्पष्ट प्रकट था कि उसे जितनी प्रसन्नता अंशु से मिलकर हुई है वैसी और किसी से भी मिलकर  नहीं हुई। रंधीर, अंशु तथा उस नवयुवक को लेकर उस ओर चला गया, जहां ‘बुफे’ ढंग पर अपनी सहायता स्वयं करके खाने-पीने का प्रबन्ध था, परन्तु रंधीर ने अंशु की सहायता जबर्दस्ती की- अंशु के मना करने के पश्चात् भी एक प्लेट में मिठाइयां रखकर उसने उसकी ओर बढ़ा दीं और अंशु इंकार नहीं कर सकी।

अजय सब कुछ देख रहा था। न चाहते हुए भी उसके दिल पर छाले पड़ने लगे। ऊंचे समाज में सदा सांस लेने वाली अंशु रंधीर के साथ बहुत निश्चिंत होकर हंसते हुए बातें कर रही थी, परन्तु वह नवयुवक गम्भीर था, जो अंशु के साथ आया था।

सहसा अंशु की दृष्टि अजय पर पड़ी। अजय से आंखें चार हुईं तो वह चौंक गई। उसका हाथ हवा में लहराते-लहराते रह गया, लहरा जाता, यदि वह स्वयं को संभाल नहीं लेती। इस व्यक्ति से उसका क्या सम्बन्ध? वह तो केवल उसका एक सहयात्री रह चुका है- और कुछ भी तो नहीं। उससे उसकी भेंट भी तो नहीं हुई। वह रंधीर से ही पुन: बातें करने लगी।

अजय लॉन के एक किनारे बिल्कुल एकांत में जाकर खड़ा हो गया। वहां खड़ा होकर वह क्यारियों के फूल देखने लगा। अंशु ने उसे एकान्त में खड़ा देखा तो जाने क्यों सोचने पर विवश हो गई- शायद इस भरे समाज में, शायद इस संसार में ही उसका कोई नहीं है। उस दिन स्टेशन पर भी तो कोई उसे लेने नहीं आया था।

अजय के अत्यन्त सुन्दर तथा आकर्ष व्यक्तित्व ने अंशु के अन्दर सहानुभूति का एक बहुत छोटा-सा स्थान बना लिया तो वह कुछ गम्भीर हो गई। रंधीर उससे बातें कर रहा था, परन्तु उसका मन न चाहते हुए भी अजय की ओर लगा हुआ था। उसकी दृष्टि भी कभी न कभी उधर उठ ही जाती थी। सहसा उसने देखा, अजय वहां नहीं है। उसने वहीं खड़े-खड़े इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई, परन्तु अजय कहीं नहीं था। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसके दिल ने इस बात का आभास किया कि इतने बड़े जश्न में एक कमी उत्पन्न हो गई है।

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