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बोझिल पलकें, भाग-7

रानू

5th September 2018

एक सफर में हमसफर रहे अजय और अंशु चंदानी के बेटे के आने की खुशी में दी गई पार्टी में अब आमने-सामने तो थे, लेकिन मौके का फायदा रंधीर उठा रहा था। हालांकि एक खलिश का एहसास तो अजय और अंशु दोनों को ही हो रहा था। क्या होगी अब इन दोनों की नियति, जानिए आगे।

बोझिल पलकें, भाग-7

सहसा अंशु का ध्यान अपनी ओर न पाकर रंधीर को बुरा लगा। अंशु के पास खड़ा नवयुवक भी उसकी बातों से उकता रहा था। रंधीर ने सोचा, आज वह इस जश्न का हीरो है, फिर भी अंशु उससे लापरवाही बरत रही है। उसने कैम्पा-कोला की एक चुस्की ली और बोला, ‘अंशु जी, शायद आपका ध्यान कहीं और है।’

‘जी?’ अंशु चौंक पड़ी। फिर संभलकर मुस्कुराती हुई बोली, ‘जी हां, दरअसल मेरा ध्यान उस नवयुवक पर था, जिसके साथ एक दिन मैं बिल्कुल अकेली रेलयात्रा कर चुकी हूं - एक ही डिब्बे में।’

‘बहुत भाग्यवान होगा वह व्यक्ति।’ रंधीर ने मजाक किया। मन में सोचा, काश, ऐसा अवसर उसे मिलता तो यात्रा का सही आनन्द आ जाता। उसने मानो यूं ही पूछ लिया, ‘कौन था वह भाग्यवान?’

‘अभी-अभी तो यहीं था - इस पार्टी में।’ अंशु ने उसकी तलाश में आंखें नचाईं।

‘क्या?’ रंधीर चौंक गया। उसने भी इधर-उधर देखते हुए मानो कुछ क्रोध प्रकट किया। इस प्रकार जैसे अंशु का दिल जीतना चाहता हो। उसने पूछा, ‘कहीं उसने आपसे कोई बदतमीजी तो नहीं की?’

‘जी नहीं-’ अंशु ने कहा, ‘वह तो एक बहुत शरीफ नवुयवक था।’

‘आजकल किसी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए।’ रंधीर ने राय दी। फिर नवयुवक की ओर मुड़कर पूछा, ‘क्यों विशाल?’

‘ऊं?’ विशाल मानो चौंक गया। फिर जैसे बौखलाकर हां में हां मिलाता हुआ बोला, ‘जी हां, जी हां। आप ठीक कहते हैं।’

विशाल एक अच्छे घराने का बहुत ही सीधा तथा शर्मीला लड़का था। वह दिल ही दिल में अंशु को बहुत प्यार करता था। अंशु ही नहीं, यह बात उसके पिता राय साहब तथा उसकी मम्मी भी जानती थीं। दोनों ही अपनी बेटी अंशु के लिए विशाल को पसन्द कर चुके थे। यह बात अंशु को ज्ञात थी और उसे इस बात पर जरा भी आपत्ति नहीं थी। इसके पश्चात् उसका दिल विशाल के प्रति प्यार की धड़कन लिए कभी नहीं धड़क सका। वह आशा किए बैठी थी कि अभी नहीं तो विवाह के बाद अवश्य हर भारतीय स्त्री के समान उसे भी अपने पति से असीमित प्यार हो जाएगा। विशाल राय साहब के एक निकटीय मित्र का लड़का था, जो इलाहाबाद से बम्बई आने के बाद उन्हीं के बंगले के गेस्ट हाउस में ठहरा हुआ था।

उस दिन चन्दानी के बंगले के अन्दर बड़े हॉल में बालरूम डांस का प्रोग्राम भी हुआ। जाम से जाम टकराए- छलके भी और इसमें डूबकर वातावरण और भी रंगीन हो गया। रंधीर विदेशी नृत्य में निपुण था। उसने अनेक लड़कियों को अपनी बांहों में लेकर नृत्य करते हुए उनका मन जीत लिया। सभ्यता के अनुसार अंशु भी उसके साथ नृत्य करने से इंकार नहीं कर सकी। उसने भी रंधीर के नृत्य की प्रशंसा की।

नृत्य बहुत देर तक चलता रहा। ग्यारह बज गए तो कुछ बड़े-बूढ़े अपने बच्चों के अनुग्रह पर उन्हें छोड़कर अपने घर चले गए। राय साहब भी अपने कुुटुम्ब तथा विशाल को लेकर उठ जाना चाहते थे कि तभी अपनी योजनानुसार चन्दानी ने उन्हें रोक लेना चाहा।

राय साहब से चन्दानी की भेंट दो मास पहले किसी के शुभ विवाह की एक पार्टी में हो गई थी। तब अंशु भी वहां उपस्थित थी। राय साहब की प्रतिष्ठा तथा अंशु की सुन्दरता को देखकर चन्दानी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका था। इतना धन तथा सम्पत्ति हाथ आ जाए तो शायद सम्पत्ति की प्यास बुझ सकती है। उसे अपना चोरी का काला धन भी सफेद बनाने से कोई नहीं रोक सकेगा।

ऐसा केवल तभी हो सकता था, जब राय साहब अंशु के लिए उसके बेटे रंधीर को पसन्द कर लें, इसीलिए वह उनसे बीच-बीच में मिलकर मिलनसारी बढ़ाता रहता था। उनकी फैक्टरी के थोड़े से शेयर खरीदने की झूठी इच्छा प्रकट करके जब चन्दानी ने उनका विश्वास प्राप्त कर लिया तो उसने अपने लड़के को लंदन से बुला लिया था। रंधीर अपने पिता के कारनामों से भली-भांति परिचित था, इसीलिए इससे लाभ उठाकर देश-विदेश में रंगरलियां मनाना वह अपना अधिकार समझता था।

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