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कब आएगा महिलाओं का संडे?

निहारिका जायसवाल

7th March 2019

बेटी, पत्नी, बहू और मां जैसी कई भूमिकाएं निभाने वाली एक महिला सबकी खुशियों का ध्यान रख सकती है, तो क्या पूरा परिवार मिलकर उस एक महिला की सहूलियत या आराम का ध्यान नहीं रख सकता है?

कब आएगा महिलाओं का संडे?

संडे... इस मस्ती वाले दिन का इंतजार बड़े से लेकर बच्चों तक को रहता है। बच्चों को इतंजार रहता है कि स्कूल की छुट्टी होगी और वो मस्ती करेंगे। पति को इंतजार रहता है कि पूरे सप्ताह काम करने के बाद संडे को खूब सोउंगा। अगर बहू वर्किंग है तो सास को इंतजार रहता है कि बहू घर पर रहेगी तो सब काम संभालेगी, मैं आराम करूंगी। पूरे परिवार की उम्मीद होती है कि संडे को तो कुछ स्पेशल खाने को मिलेगा। मां, बहू और पत्नी के साथ एक वर्किंग वूमेन की भी भूमिका निभाने वाली एक महिला के लिए संडे के मायने क्यों हैं अलग। उसके लिए कोई आराम वाला दिन क्यो नहीं? पूरे परिवार को संभालने वाली के बारे में आखिर कौन सोचेगा।

संडे के नाम पर दोहरे काम

इस बारे में विचार व्यक्त करते हुए महिला पत्रिका में कार्य करने वाली अनिता पांडे का कहना है कि एक वर्किंग महिला के ऊपर घर और बाहर दोनों की दोहरी जिम्मेदारियां होती है। संडे के दिन हम आराम की तो सोच ही नहीं सकते हैं। इस दिन ही हमें पूरे सप्ताह के बचे हुए काम निपटाने पड़ते हैं। ऑफिस के काम से छुट्टी तो मिल जाए लेकिन घर के कामों से फुर्सत नहीं मिलती। उस दिन बस यह कोशिश रहती है कि सबके उठने से पहले घर वालों के लिए कुछ अच्छा नाश्ता बना सकूं। फिर दोपहर का लंच और रात के डिनर में भी कुछ खास होना चाहिए। इसके अलावा घर की साफ- सफाई और सास-ससुर, बच्चे व पति के कपड़े धोना और प्रेस करना, पूरे सप्ताह की सब्जी व रसोई का खत्म हुआ सामान लाना आदि काम भी हो जाते हैं। इसीलिए एक महिला का कभी कोई संडे नहीं होता। एक स्त्री अपनी सभी जिम्मेदारियों को को पूरी करने की कोशिश करती है, लेकिन परिवार के सदस्यों को उसकी सेहत के बारे में भी सोचना चाहिए।

 

भावनाओं को समझें 

परिवार के हर सदस्य को खुश रखने की कोशिश में लगी रहने वाली बहू, मां या पत्नी की भी कुछ भावनाएं होती हैं। जिन्हें वो व्यक्त नहीं कर पाती है। इस बारे में समाज सेविका पायल गोयल का कहना है कि औरतें भी चाहती हैं कोई ऐसा दिन हो, जिस दिन अपनी मर्जी से उठ सकें। अगर खाना बनाने का मन नहीं है तो न बनाएं। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाता है, खासतौर पर संयुक्त परिवार में। संयुक्त परिवार में औरतों को यह मौका आसानी से प्राप्त हो सकता है, अगर महिलाएं आपसी तालमेल बनाकर चलें। इसके अलावा परिवार के सदस्यों को भी घर के कुछ कामों में महिलाओं की मदद करनी चाहिए।

अपेक्षाओं के नाम पर 

एक कामकाजी महिला से परिवार वालों को ज्यादा अपेक्षाएं होती है, खासतौर पर सास को। उनकी अपेक्षा होती है कि बहू पूरे सप्ताह तो बाहर ही रहती है, तो संडे वो पूरे दिन का काम वही संभाले। रोज की तुलना में संडे के दिन खाने में कुछ खास बनाए। दिक्कतें तब और भी ज्यादा होती हैं जब परिवार में एक वर्किंग वुमेन हो और बाकी सब हाउस वाइफ हों। ऐसे में काम को लेकर ज्यादा समस्याएं आती हैं। घर में रहने वाली महिलाओं को लगता है कि रोज तो वे घर पर रहकर काम करती हैं लेकिन आज छुट्टी है तो वही सारा काम संभाले। अगर पूरे परिवार में कोई अकेली महिला हो तो उससे और भी ज्यादा अपेक्षाएं होती हैं। जिसे पूरा करने की जद्दोजहद में महिलाएं अपने आप को कहीं खो देती हैं।

एक्सपर्ट की राय

दिल्ली की जनरल फिजिशयन डॉ. अंजलि रावत का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए शरीर को जितना पोषण मिलना आवश्यक है, उतना ही नींद और आराम भी आवश्यक है। महिलाएं अक्सर खुद का ध्यान नहीं रखती हैं। नींद न पूरी होने पर केवल तनाव ही नहीं बढ़ता है, बल्कि महिलाओं में हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। जिसकी वजह से कई बार गर्भधारण में भी दिक्कतें आती हैं।किसी भी परिवार को खुशहाल बनाए रखने में महिला की भूमिका महत्वपूर्ण होती है इसलिए परिवार वालों की भी जिम्मेदारी होती है कि वे उस महिला के स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखें। पुरुषों को भी महिलाओं का सहयोग करना चाहिए। घर के काम में महिलाओं का थोड़ा बहुत हाथ बंटाना चाहिए और अपेक्षाओं के बोझ उस पर नहीं लादे जाने चाहिए। 

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