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बोझिल पलकें, भाग-19

रानू

10th May 2019

अंशु तो अपने जीवन की एक तयशुदा धारा में बह रही थी, लेकिन रंधीर की नीच हरकत उसकी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल गई। विशाल के लिए उसका सफर तय था, पर अब अजय के सामने वह क्यों ठिठकने को मजबूर हो गई थी?

बोझिल पलकें, भाग-19

उस रात अंशु को देर तक नींद नहीं आ सकी। पलंग पर लेटे-लेटे हर पल वह यही सोचती रही कि यदि वह नवयुवक आज नहीं आता, तब क्या होता! अब भी उसका नन्हा-सा दिल उस घटना का परिणाम निकालते हुए कांप जाता था। वह क्यों धोखा खाकर रंधीर के जाल में फंस गई...

विशाल आज ही सुबह मनमाड चला गया है, जहां उसके कुछ रिश्तेदार हैं। उसके बाद उधर ही से वह इलाहाबाद चला जाएगा, परंतु आज जब ढाई बजे उसे विशाल का फोन मिला कि वह मनमाड न जाकर बंबई में ही रुककर एक होटल में ठहर गया है तो अंशु विश्वास नहीं कर सकी थी। अंशु को कारण पूछना ही पड़ा था।

‘तुमसे कुछ आवश्यक बातें करना चाहता हूं।’ स्वर कुछ सहमा-सहमा था।

‘क्या?’

‘यहां आ जाओ, तभी बता सकूंगा।’

अंशु ने एक पल सोचा- विशाल उसे प्यार करता है। दिल की गहराई से चाहता है, परंतु अपने दिल की स्थिति उस पर प्रकट करने से शर्माता है। शायद आज दिल कड़ा करके वह एकांत में उससे सब-कुछ कह देने का साहस एकत्र कर चुका है। बिछड़ने से पहले ऐसे साहस का उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। वह चंचलता से बोली, ‘जब फोन पर नहीं कह सकते हो तो मेरे सामने कैसे कहोगे? तुम्हें तो लड़की होना चाहिए था।’

‘आ जाओ तो तुम्हारा उपकार मानूंगा।’ स्वर गंभीर था, विनम्र निवेदन से परिपूर्ण।

अंशु ने सोचा, एक न एक दिन उसे विशाल की जीवन-संगिनी तो बनना ही है। आज विशाल के प्रति उसका दिल नहीं धड़कता, परंतु विवाह के बाद तो वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकेगी। भारतीय स्त्री का स्वभाव ही ऐसा है। फिर इस समय वह अपने होने वाले पति का दिल क्यों तोड़ने का पाप ले क्यों उसका दिल दुखाए, इसीलिए अंशु उसका पता लेकर होटल पहुंच गई थी- कमरा नंबर एक सौ दो। द्वार के पट बंद थे, परंतु अंदर से लॉक नहीं था। वह अंदर प्रविष्ट हुई। अंदर दो सूटकेस रखे थे- कुछ कपड़े टंगे थे। अंशु का दिल अचानक ही एक अज्ञात भय से कांप गया था। वह विशाल के सूटकेस पहचानती थी। उसने तुरंत द्वार से बाहर निकल जाना चाहा, परंतु द्वार बाहर से बंद हो चुका था।

अंशु का दिल बैठने लगा। सहसा एक आहट पाकर उसने देखा- टॉयलेट के द्वार पर रंधीर खड़ा है- हाथ में जाम लिये, आंखों में नशे की लाली के साथ वासना की गंदी भूख से होंठ भीगे हुए। अंशु की आंखों के सामने अंधकार छा गया था। हे भगवान! कैसा भयानक दृश्य था वह! शैतान उस पर कुत्ते समान झपटकर उसकी आत्मा के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहता था। यदि वह देवता आड़े समय में उसकी इज्जत की सुरक्षा नहीं करता, तब क्या होता? निश्चय ही वह आत्महत्या कर लेती। इतना बड़ा कलंक लगने के बाद उसकी अंतरात्मा किस प्रकार स्वीकार करती कि वह जीवित रहे, जीवित रहकर समाज को धोखा देती रहे।

कौन था वह देवता उसका, जिसने उसकी इज्जत बचाई? उसके इस देवत्व पर वह उसे धन्यवाद भी तो नहीं दे सकी। उसकी स्थिति ही ऐसी हो गई थी। अब वह उसे कभी मिलेगा भी या नहीं? वास्तव में वह बहुत सज्जन व्यक्ति था। उस दिन ट्रेन में भी उसके एकांत से लाभ उठाना तो दूर की बात, उसने उससे अधिक बात भी नहीं की थी। वह नवयुवक कितना स्वस्थ था, और चुस्त भी, और...सुंदर भी। हां, सुंदर तो वह वास्तव में बहुत था। अंशु के दिल ने एक हल्की-सी मिठास का आभास किया। उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान उभरी, कलियां मानो चटक जाना चाहती थीं। उसने करवट बदली और अपनी बोझिल पलकों को बंद करते हुए आंखों में समाई उस नवयुवक की छवि कैद कर ली, जिसने उसकी इज्जत बचाकर इस समय उसके दिल के तारों को छेड़ दिया था।

क्या प्यार इसी को कहते हैं? क्या यही प्यार का आरंभ है? हां, प्यार इसी को कहते हैं। यही तो प्यार का आरंभ है। इस बात का विश्वास उसे तब हुआ, जब कुछेक दिन और बीत गए और उस नवयुवक की छवि उसके दिल के परदे पर धुंधली पड़ने की बजा और गहरी होती चली गई।

जब दिन-रात वह उस देवता के विचारों में तल्लीन रहने लगी तो उसे ज्ञात हो गया कि वह उसे कभी नहीं भुला सकती। शायद मरने के बाद भी नहीं। काश! वह उसे एक ही बार मिल जाए, केवल एक बार तो कम से कम वह उसे धन्यवाद अवश्य ही दे देगी। शायद अपने दिल का भेद भी प्रकट करने में सफल हो जाएगी अपने देवता की कमी वह रात के अकेलेपन में कुछ अधिक ही महसूस करती तो न चाहते हुए भी उसकी पलकें भीग जातीं। क्यों नहीं उसने उस दिन ट्रेन में उससे बातें कीं? क्यों नहीं रंधीर की पार्टी में उससे भेंट की? कम से कम उसे उसका नाम तो ज्ञात हो जाता। जाने कौन था वह? जाने कहां रहता है?

जारी...

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