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बोझिल पलकें, भाग-20

रानू

11th May 2019

अगर उम्मीद ने अजय का साथ छोड़ दिया था तो अजय ने भी उम्मीद का साथ छोड़ दिया था और अपनी उसी पुरानी अपराध की दुनिया को अपना लिया था, जिससे वह हमेशा भागना चाहता था। वह मजबूर था, अपने फर्ज के हाथों, क्योंकि वह अपने पिता दीवानचन्द को चन्दानी के खूंखार चीतों का निवाला नहीं बनते देखना चाहता था।

बोझिल पलकें, भाग-20

एक दिन अजय को फिर चन्दानी के सामने उपस्थित होने की आज्ञा मिली। बुझे दिल से इसका पालन करते हुए वह निश्चित स्थान पर पहुंचा। चन्दानी के व्यक्ति से भेंट करने के बाद सदा के समान आज भी आंखों पर चश्मा चढ़ाकर उसने अपनी मंजिल पार की और जब उसे चश्मा उतारने की आज्ञा मिली तो वह चन्दानी के सामने उपस्थित था।

चन्दानी मेज से कूल्हे टिकाए खड़ा था उसके हाथ में उसका कोड़ा था 

उसने अधिक समय न गंवाते हुए कहा, ‘कल सुबह दस बजे शालीमार होटल के सामने तुम्हें हमारा आदमी मिलेगा। साथ में कम्मो भी होगी। हमारा आदमी तुम्हें एक सूटकेस देगा तथा कम्मो के साथ तुम्हें तुरंत गोआ के लिए रवाना हो जाना पड़ेगा उसी कार में। शहर की भीड़ छोड़कर जब तुम एकांत में पहुंचोगे तो तुम्हें हिप्पी का रूप धारण कर लेना पड़ेगा, इसलिए तुम अपने घर से हिप्पियों समान ही कपड़े पहनकर निकलना। विग, दाढ़ी, मूंछ, चश्मा, गले की माला तथा दो रंगीन कोट तुम अभी स्टोर रूम में जाकर चुन लो। कोट तुम अभी अपने साथ ले जाओ। बाकी वस्तुएं कम्मो साथ ले आएगी पणजी ‘गोआ’ में मनडोवी होटल के कमरा नंबर सत्ताइस में तुम्हें जॉर्ज नामक एक आदमी मिलेगा, इस तस्वीर को पहचान लो।’

चन्दानी ने मेज पर से एक तस्वीर उठाकर उसे दिखाई, परंतु दी नहीं। कहीं ऐसा न हो कि अजय पुलिस के हाथों पकड़ा जाए तो उसका बंधा ग्राहक भी हाथ से निकल जाए।

चन्दानी ने बात जारी रखी, मनडोवी में तुम तथा कम्मो मिस्टर एंड मिसेज जोसफ के नाम से ठहरोगे। वहां जॉर्ज को तुम अपना यही परिचय देने के बाद उससे अपना सूटकेस बदलोगे। उस सूटकेस को तुम्हें यहां लाना है। कुछ पूछना है?’

अजय ने गंभीरता के साथ सिर हिला दिया, ‘नहीं।’

चन्दानी ने संतोष की सांस लेते हुए अपना कोड़ा मेज पर रखा और फिर एक सिगार होंठों के मध्य रखकर जलाने लगा।

‘मैं अपने पिता से मिल सकता हूं?’ अजय ने पूछा ।

‘अवश्य’ चन्दानी ने हवा में सिगार का धुआं छोड़ते हुए कहा। फिर इशारा करके उसके साथ अपने दो व्यक्ति लगा दि

अपने पिता से भेंट करते हुए अजय ने आज फिर यही महसूस किया कि वह उससे कुछ कहना चाहते हैं। उसे मना करना चाहते हैं कि वह उनके जीवन की सुरक्षा की चिंता न करते हुए अपने जीवन का पथ बदल ले। हर पिता यही चाहता है, परंतु वह ऐसा कैसे कर सकता था? कैसे अपने पिता को चीतों के पंजों में टुकड़े-टुकड़े होते देख सकता था? उन्हें सांत्वना देने के बाद वह उनसे विदा हो गया।

दूसरे दिन अजय सुबह दस बजे शालीमार होटल के सामने खड़ा था। शरीर पर लाल कोट तथा काली पैंट। होंठों में सिगरेट। सहसा उसके पास एक कार आकर रुकी। कार कम्मो चला रही थी। गोरा दमकता हुआ मुखड़ा, लटें कंधों तक बल खाकर झूलती हुईं, आंखों पर एक बड़ा चश्मा। कार के पीछे चन्दानी का व्यक्ति एक ड्राइवर की वर्दी में बैठा हुआ था। कम्मो ने कार अजय के समीप खड़ी की। अजय अंदर बैठ गया। कार फिर चल पड़ी। थोड़ी दूर पर कम्मो ने कार रोकी। चन्दानी का व्यक्ति अजय की जिम्मेदारी पर सूटकेस छोड़कर कार से उतर गया। कार फिर आगे की ओर बढ़ गई।

अजय ने अपने गैंग की किसी भी लड़की में कभी कोई रुचि नहीं ली थी, जबकि लड़कियां अजय पर जान देने को भी तैयार थीं। वह अपने काम से किसी लड़की का सान्निध्य उस समय तक स्वीकार नहीं करता था, जब तक अत्यंत आवश्यक नहीं होता।

जारी...

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