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प्रसव के दौरान शिशु की गतिविधियों पर लगातार रखी जाती है नज़र

गृहलक्ष्मी टीम

17th May 2019

प्रसव के दौरान शिशु की गतिविधियों पर लगातार रखी जाती है नज़र

‘‘क्या प्रसव के दौरान शिशु की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाएगी?इसका क्या फायदा है?’’

जिस शिशु ने बड़े आराम से माँ की कोख में नौ-महीने बिताए हों, उसके लिए जन्म की यात्रा तय करके बाहर आना आसान नहीं होता। कुछ शिशु तो बड़े आराम से यह सफर तय कर लेते हैं लेकिन कुछ शिशुओं की हिम्मत टूट जाती है। कई लक्षणों से पता चलता है कि वे थकान महसूस कर रहे हैं। उनके दिल की धड़कन कम हो जाती है। डॉक्टर लगातार शिशु की हलचल पर नजर रखते हैं ताकि उन्हें शिशु की सही अवस्था पता चल सके। अगर आपके मामले में भी डॉक्टर को सही लगता है तो वे शिशु पर पूरे प्रसव के दौरान फैटल मॉनीटरिंग से नजर रखेंगे।

फैटल मॉनीटरिंग तीन तरह की होती है-

बाहरी जांच :- इसमें पेट पर दो तरह के उपकरण लगाए जाते हैं। एक अल्ट्रासाउंड ट्रांसड्यूसर, (दिल की धड़कन पर नजर रखता है) दूसरा दबाव‒संवेदनशील यंत्र, वह संकुचन की गहनता व अवधि मापता है। ये दोनों मॉनीटर से जुड़े रहते हैं व कागज पर इनकी रिपोर्ट निकलती रहती है। आप इस दौरान बिस्तर या कुर्सी पर हिल-डुल सकती हैं लेकिन आपको ज्यादा आजादी नहीं होती।

लेबर की दूसरी अवस्था में जब संकुचन इतने तेज हो जाते हैं कि शुरूआत या समाप्ति का पता ही नहीं चलता तो उस समय मॉनीटर की मदद ली जाती है। अगर इस दौरान मॉनीटर की मदद न ली जाए तो डॉपलर से शिशु के दिल की धड़कन जांची जाती है।

भीतरी जांच 

जब ज्यादा सटीक नतीजों की जरूरत पड़ती है तो इसका इस्तेमाल किया जाता है।इसमें योनि मार्ग से शिशु की खोपड़ी पर छोटासा इलैक्ट्रोड लगा देते हैं। फिर आपके गर्भाशय में एक कैथीटर डाला जाता है या पेट पर उपकरण लगाकर संकुचन की गहनता व अवधि मापी जाती है। ऐसा तभी किया जाता है जब बहुत जरूरी हो क्योंकि इससे संक्रमण होने का डर रहता है। शिशु के सिर पर हल्की खरोंचे आ सकती हैं, जो कुछ दिन में ठीक हो जाती है।इस समय आपकी गतिविधि काफी कम हो जाएगी।

टैलीमैट्री जांच 

यह जांच कुछ खास अस्पतालों में ही उपलब्ध होती है। इसके दौरान आपकी जांच पर एक ट्रांसमीटर लगाया जाता है ताकि शिशु के दिल की धड़कन पता चलती रहे। इस दौरान आप घूम भी सकती हैं और जांच भी जारी रहती है। ऐसी जांचों के दौरान कई बार झूठे संकेत भी मिल जाते हैं। शिशु घूम गया तो इलैक्ट्रोड हिल जाएगा और मॉनीटर पर सही रिकॉर्ड नहीं आएगा। डॉक्टर इन सब बातों पर ध्यान देने के बाद ही तय करते हैं कि शिशु खतरे में है या नहीं। अगर लगातार शिशु के थकने के संकेत आते रहें तो ऑप्रेशन की तैयारी की जाती है।

 

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