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कम नहीं है आज प्ले स्कूल की अहमियत

दामिनी यादव

1st June 2019

चाहे मजबूरी समझी जाए या ज़रूरत, आज लगभग हर बच्चे को प्ले स्कूल भेजा ही जा रहा है। पेरेंट्स की नौकरीपेशा जि़ंदगी में प्ले स्कूल की अहमियत को अनदेखा नहीं किया जा सकता। पेश है, इसी बारे में कुछ अहम बिंदू-

कम नहीं है आज प्ले स्कूल की अहमियत
किसी भी बच्चे के जीवन के शुरुआती पांच साल उसकी पूरी जि़ंदगी का आधार होते हैं। ये बात हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि सदियों से यह कही जा रही है। इसी के साथ ये भी कहा जाता है कि बच्चे की पहली पाठशाला उसका अपना घर होता है। इसी के साथ इस बात पर भी पूरी दुनिया-भर में काफी बहस चल रही है कि क्या ढाई-तीन साल के बच्चों को प्ले  स्कूल भेजा जाना चाहिए या नहीं।
 
कहीं ऐसा करना जल्दबाज़ी तो नहीं। जो कुछ भी एक प्ले स्कूल बच्चे को सिखाता है, वह सब तो उसे घर पर भी सिखाया जा सकता है। बेशक, ऐसा होना एक बहुत अच्छी ही नहीं, बल्कि आदर्श स्थिति होगी कि बच्चे को तमाम बुनियादी बातों की जानकारी घर पर ही उसके परिवार द्वारा मिले, मगर इस विषय में थोड़ा सा आज के हालात पर नज़र डालते हुए, प्रैक्टिकल होकर सोचने की ज़रूरत है। आज के समय में संयुक्त परिवार तो रहे नहीं कि अगर बच्चे के माता-पिता ही उसके लिए बहुत ज़्यादा समय नहीं निकाल पा रहे हैं तो घर के दूसरे सदस्य मिलकर उस कमी को पूरा कर दें। 'हम दो हमारे दो' के कांसेप्ट ने पूरे समाज का नक्शा ही बदलकर रख दिया है। उस पर बची-खुची कसर दिनोदिन बढ़ती महंगाई ने पूरी कर दी है, जिसकी वजह से पति-पत्नी दोनों के लिए ही काम करना बहुत ज़रूरी हो गया है और नतीजे के रूप में प्ले स्कूल एक शरणस्थली जैसा लगता है।
 
एक और बात है, जो प्ले स्कूल की अहमियत को बढ़ा देता है। आज ज़्यादातर परिवारों में बच्चों की सीमित संख्या एक या दो तक पहुंच गई है। ऐसे में वे परिवार, जिनमें एक ही बच्चा है, उनमें कि वह बच्चा अकेला बचपन जीने को मजबूर है। ऐसे में प्ले स्कूल ही इस अकेलेपन की भरपाई करते पाए जाते हैं, क्योंकि चाहे पेरेंट्स कितनी भी सुविधाएं दे लें या कितनी भी कोशिश कर लें, कुछ बातें बच्चे दूसरों बच्चों के साथ ग्रुपिंग में ही सीख पाते हैं। तो चलिए, डालते हैं इन्हीं पर एक नज़र
 
सीखते हैं बोलना-कहना
 
आमतौर पर ये देखने में आता है कि बच्चे अपने पेरेंट्स के साथ या तो काफी सीमित बात करते हैं या उनमें बहुत ज़्यादा विविधता और विस्तार नहीं होती।खासतौर पर ऐसे परिवार, जहां सिंगल चाइल्ड है, वहां तो अक्सर बच्चे गुमसुम से पाए जाते हैं। वे अपनी बातें कहते-सुनते दुनिया-भर की कल्पनाएं करते हैं, जो उनके मानसिक विकास में अहम रोल अदा करता है। ऐसा कई रिसर्च में सामने आया है। प्ले स्कूल में अपनी उम्र के दूसरे बच्चों के साथ वे न सिर्फ़ काफी मुखर हो जाते हैं, बल्कि उनकी चंचलता भी जगह पाने लगती है, जो हर बचपन का हक है।
 
बनते हैं सामाजिक
 
भले ही कहा जाए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, फिर भी हमने अक्सर ऐसे लोगों को देखा ही है, जो बेहद अंतर्मुखी होते हैं और उन्हें लोगों से मिलना-जुलना, ज़्यादा बातें करना या अपनी भावनाएं शेयर करना पसंद नहीं होता दरअसल इसमें उनके बचपन की आदतों का भी बहुत अहम रोल होता है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आज के समय में बच्चे ही नहीं, बड़े भी अकेलेपन और तनाव की चपेट में आ जाते हैं। प्ले स्कूल इस समस्या का एक अच्छा
समाधान है।
 
अहमियत समझते हैं शेयरिंग की
 
प्ले स्कूल में जब बच्चा दूसरे बच्चों के साथ अपना टिफिन और खिलौने शेयर करना सीखता है, उसी समय से उसमें शेयरिंग की आदत पैदा होने लगती है, जो समय के साथ विकसित होती जाती है। समाज में हमेशा हमें एक-दूसरे की मदद की जरूरत पड़ती है, लेकिन अगर बचपन में ही ये शेयरिंग की आदत न पड़े तो मदद के समय में ही किसी को याद करने की आदत कब स्वार्थ में बदल
जाती है, पता भी नहीं चलता।
 
होता है शारीरिक विकास
 
टीवी, मोबाइल ने बच्चों से पार्क या आउटडोर गेम्स तो छीन ही लिए हैं, उनका बेहतर स्वास्थ्य, मजबूत इम्यून सिस्टम वगैरह भी इसकी भेंट चढ़ गए हैं। आजकल ज्यादातर पेरेंट्स भी बच्चों को बिज़ी  रखने के लिए उन्हें शुरू से ही इन सब की आदत डलवा देते हैं। इसका असर उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर साफ देखा जा सकता है। प्ले स्कूल में वे दूसरे बच्चों के साथ जब खेलते-कूदते हैं तो यह उनके बेहतर शारीरिक-मानसिक विकास में योगदान देता है।
 
अनुशासन की आदत पड़ती है
 
घर पर छोटे बच्चे अक्सर अनुशासनहीन तक हो जाते हैं। उनके सोने-जागने, खाने-पीने, खेलने वगैरह का कोई टाइमटेबल ही नहीं होता। जब उन्हें प्ले स्कूल भेजा जाता है तो वे सबसे पहले इन्हीं बेसिक आदतों को सीखते हैं, जिससे उनकी बॉडी क्लॉक बचपन से ही सेट हो जाती है, जो कि भविष्य में एक अच्छे व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती है।
 
होते हैं आत्मनिर्भर
 
भले ही व्यस्तता के चक्कर में कई पेरेंट्स बच्चे को ज़्यादा समय न दे पाते हों, लेकिन इस गिल्ट को दूर करने के लिए वे अक्सर बच्चे को लाड़-प्यार की ओवरडोज़ दे देते हैं। प्ले स्कूल का अनुशासन बच्चों को काफी हद तक आत्मनिर्भर बनने के लिए भी प्रेरित करता है। वे अपना खाना खुद खाना, अपनी चीज़ें संभालकर सही जगह पर रखना, खुद तैयार होने की कोशिश करना, एक्सरसाइज़ करना, हैल्दी फूड खाना जैसी कई आदतें प्ले स्कूल में खेल-खेल में ही सीख जाते हैं। ऐसे कई पहलू हैं, जिनके पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक आधार बताते हैं कि कई बार मजबूरी में बच्चे को ज्वॉइन करवाए गए प्ले स्कूल के साथ अगर सही तरीके से तालमेल बिठाया जाए तो यह बच्चे के विकास में मददगार भी साबित हो सकता है। 
 
 

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