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बोझिल पलकें, भाग-30

रानू

12th June 2019

आज अजय ने इस अपराध की दुनिया से बाहर निकलने के लिए आर या पार की जिस लड़ाई का दांव खेला था, उसमें सिर्फ़ उसी की जान का जोखिम नहीं था, बल्कि उसके पिता भी खतरे से बाहर नहीं था, पर वे खतरे से बाहर थे ही कब। फिर भी क्या अंजाम होने जा रहा था आज इस सब का?

बोझिल पलकें, भाग-30

दीवार पर टंगी चाभी उठाकर उसने अपने पिता की कोठरी का ताला खोला।

उसके पिता बहुत आश्चर्य के साथ उसे देख रहे थे। अजय ने उन्हें बाहर निकाला। चन्दानी की रिवॉल्वर उन्हें थमाई।

फिर चन्दानी की ओर बढ़ते हुए सामने की ओर जाती सीढ़ियों पर इशारा करते हुए बोला, ‘वहां एक बटन है। उसे दबा दीजिएगा तो यहीं एक दरवाजा खुल जाएगा। आगे जाकर एक बटन और मिलेगा। उसे दबाने के बाद बाहर जाने का रास्ता मिल जाएगा। बाहर जाते ही तुरंत एक हवाई फायर कर दीजिए। पुलिस यहां आने की प्रतीक्षा कर रही है। उन्हें सिग्नल मिल जाएगा।

दीवानचन्द तुरंत सीढ़ियों की ओर बढ़ गए।

चन्दानी ने अजय की बात सुनी तो उसकी आत्मा कांप गई। उसके व्यक्तियों को भी अपनी जान बचाने की चिंता लग गई।

दो व्यक्तियों ने एक-दूसरे को संकेत करके अपना रिवॉल्वर बाहर निकालना चाहा कि चन्दानी के समीप खड़े व्यक्ति को समाप्त कर दें, परंतु अजय की आंखें बिल्ली के समान तेज थीं। उसके हाथ की रिवॉल्वर एक बार फिर चली, एक के बाद एक, बिजली समान।

दोनों व्यक्तियों की रिवॉल्वर थामे हथेलियां फट गईं। रिवॉल्वर छूटकर दूर जा गिरा। पुलिस कर्मचारी की गोली चन्दानी पर चलते-चलते रह गई।

अजय के दोनों साथी ही नहीं, सभी अजय की चुस्ती तथा निशाने पर चकित थे। अजय ने एक बार फिर चेतावनी दी, ‘इस बार मैंने गोली केवल हथेली पर चलाई है। अगली बार छाती में उतरेगी।’

सहसा तहखाने के बाहर एक हवाई फायर हुआ। पुलिस को आने का संकेत मिल गया, परंतु तभी वहां लॉन में खड़े व्यक्ति ठिठक गए। ऐसा तो इस बंगले में कभी हो ही नहीं सकता था

दीवानचन्द को स्वतंत्र तथा हवाई फायर करते देखकर बाहर मौजूद चन्दानी के आदमियों को उन पर संदेह हुआ। उन्होंने मिलकर दीवानचन्द को पकड़ लेना चाहा तो दीवानचन्द ने अपने बचाव में एक व्यक्ति पर फायर कर दिया। 

तभी एक व्यक्ति ने पीछे से छुरी फेंकी, जो सीधे दीवानचन्द की पीठ में जा लगी वे वहीं गिर पड़े पीठ के बल, कुछ इस प्रकार कि पीठ में लगी छुरी अंदर तक धंस गई। दीवानचन्द की आंखों के सामने अंधकार छाने लगा।

हत्यारा तहखाने की घटना से अनभिज्ञ था। दीवानचन्द की रिवॉल्वर उठाकर वह तुरंत तहखाने में गया, परंतु तभी अभी या कभी नहीं की कहावत पर चन्दानी ने अपनी जान की बाजी लगा दी। वह जीते जी स्वयं को कभी भी पुलिस के हवाले करने को तैयार नहीं था।

एक झटके से नीचे बैठते हुए उसने पलटकर बंदूक की नली पकड़ ली और पुलिस कर्मचारी के मुंह पर एक मुक्का रसीद किया। अन्य व्यक्तियों को अवसर मिल गया। सभी अजय तथा उसके साथियों पर टूट पड़े। गोलियां चलीं।

चन्दानी के अनेक व्यक्ति घायल हो गए, परंतु अब बंदूक की बजा हाथापाई होने लगी। एक भगदड़-सी मच गई। स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी जान की सुरक्षा में खुले दरवाजे की ओर भेड़-बकरियों के समान भागने लगे।

नकी चीख तथा शोर सुनकर चीते भी जोर-जोर से गरजने लगे। जंजीर में बंधे उछल-उछलकर वे स्वतंत्र हो जाने को तड़पने लगे।

चन्दानी की आंखों में रक्त उतर आया था। अजय ने उसके जीवन भर के प्रयत्न को व्यर्थ कर दिया था। वह अजय को चीते के सामने गिराते हुए उनका शिकार बनते देखकर अपने दिल की आग बुझा लेना चाहता था।

अपने साथियों के साथ वह अजय पर टूट पड़ा, परंतु अजय पीछे हटने वाला नहीं था। उसके साथी भी बलवान तथा चुस्त थे। उन्होंने डटकर मुकाबला किया।

अजय के नौजवान तथा गरम रक्त के आगे चन्दानी शीघ्र ही हांफ गया फिर भी वह पूरे बल से अपने साथियों का सहारा लेकर अजय को चीतों के समीप ले आया। चीते अपना शिकार प्राप्त करने के लिए बहुत अधीरता से उछलते-तड़पते गरज रहे थे। अजय कई बार उनके पंजों में आने से बचा, परंतु अंत में उसने उछलकर चन्दानी के पेट पर ऐसी लात मारी कि चन्दानी खुद ही लड़खड़ाकर चीतों की पकड़ में आ गया।

उसका परिणाम वही हुआ, जो वह दूसरों के साथ करता था। चीतों ने उसका शरीर झपटकर पकड़ते ही पंजों से दबाकर दांतों द्वारा चबाना आरंभ कर दिया।

चन्दानी बुरी तरह चीखा। उसकी चीखें सुनकर उसके साथियों के हाथ-पैर ढीले पड़ गए। सबने अपनी जान बचाना बुद्धिमानी समझी, परंतु तब तक पुलिस आ चुकी थी। यद्यपि अभी शाम पूर्णतया नहीं डूबी थी, फिर भी पुलिस ने सावधानी बरतते हुए सर्च लाइट का पूरा प्रबंध कर रखा था।

तहखाने के अंदर सर्च लाइट की आवश्यकता नहीं थी, परंतु बंगले के लॉन में सर्च लाइट बहुत उपयोगी सिद्ध हुई।

पुलिस ने बंगले की चारदीवारी के बाहर एक भी अपराधी को निकलने का अवसर नहीं दिया। सब के सब अपराधी पकड़े गए। जॉनसन भी पकड़ा गया। पुलिस ने उसे भी बंदी बना लिया।

इतनी बड़ी योजना केवल अजय के ही कारण सफल हुई थी, इसलिए डी.आई.जी. अजय के पास आए। अजय अपने होंठ तथा मस्तक से निकलते रक्त को रूमाल द्वारा पोंछ रहा था। डी.आई.जी. ने उसे बधाई दी।

अजय उनके साथ बाहर निकला। पुलिस की हिरासत में सारे अपराधी वैन में बैठते जा रहे थे। जो घायल थे उन्हें पुलिस वाले एक अलग वैन में बिठा रहे थे।

अजय के पिता घायल होकर एक जगह पड़े हुए थे। उन्हें पुलिस वाले उठाने ही वाले थे कि तहखाने से निकलकर बाहर आते अजय की दृष्टि उन पर पड़ गई। अजय लपककर उनके समीप चला आया।

दीवानचन्द ने पुलिस वालों को उठाने से रोककर अजय को अपने समीप बैठने का इशारा किया। अजय उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना चाहता था। उन्होंने उसे भी रोक दिया।

अजय को उनकी स्थिति देखते हुए वहीं बैठ जाना पड़ा। अजय समझ गया, उसके पिता का अंतिम समय आ चुका है, पीठ में छुरी अंदर तक धंसी हुई थी। फर्श पर रक्त फैला हुआ था।

अजय उनके पास झुककर बैठ गया। दीवानचन्द ने बहुत प्यार से उसका हाथ पकड़ा। इस अंतिम समय उन्होंने अपने दिल का भेद उगल देना चाहा। अजय भी समझ गया। उसके पिता उससे कुछ कहना चाहते हैं। शायद दिल का भेद बोझ बना हुआ था।

दीवानचन्द ने कुछ कहने को अपने होंठ खोले, परंतु उनके होंठ कांपने लगे। आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने अपनी टूटती सांस ऊपर खींची, परंतु शब्द नहीं निकल सके। सहसा उनकी आंखें पथरा गईं। होंठ जम गए। अजय के हाथ को पकड़े हुए उनका हाथ कुछ सख्त हुआ, फिर एकदम ढीला हो गया। उनकी आत्मा उनके शरीर को छोड़ चुकी थी। बेजान होकर वे फर्श पर ढेर हो गए।

जारी...

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