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टीनएज पेरेंटिंग के मूल-मंत्र

डॉ. समीर पारीख

21st June 2019

अगर आप एक टीनएज बच्चे के अभिभावक हैं तो हम समझ सकते हैं कि यह आपके लिए कितना संवेदनशील समय है। जानिए हमारे एक्सपर्ट से कुछ उपयोगी टिप्स....

टीनएज पेरेंटिंग के मूल-मंत्र
 
ये बहुत ही जाना-पहचाना सच है कि किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तनों पर हमारे चरित्र का निर्माण दोनों ही सतरों पर होता है, मानसिक भी और शारीरिक भी। बड़े पैमाने पर इन बदलावों के चलते किशोरावस्था का यह पड़ाव बच्चों के लिए तो संवेदनशील साबित होता ही है, पेरेंट्स भी इस समय एक बहुत ही संवेदनशील अवस्था से गुज़र रहे होते हैं। आशंकाओं और चिंताओं से भरा ये समय उनके लिए भी बहुत कठिन साबित होता है। ऐसे में यह बड़ी ही सामान्य सी बात है कि सभी अभिभावकों के ज़ेहन में बहुत सारे प्रश्न उठ रहे होते हैं। वे कई आशंकाओं से जूझते रहते हैं।
 

 

बढ़ते बच्चों के साथ जुड़ी इन चिंताओं का सीधा संबंध उनके आपसी संबंधों पर भी पड़ता है। यहां तक कि अधिकांश माता-पिता अपने युवा होते बच्चों को अपनी पूरी जि़ंदगी का सबसे संवेदनशील और कठिन समय मानते हैं। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करना, उनकी चिंताओं और उत्सुकताओं को समझना इस समय पर मिलने वाली सबसे आम सलाह है। इसके उलट असल में इस स्थिति का सामना करने के लिए कोई सटीक नियम या गाइड है ही नहीं। यहां हम सिर्फ कुछ बातों का ध्यान भर ही रख सकते हैं। 

 

 
 
किशोर बच्चों से संवाद बनाए रखिए
 
एक किशोर होते बच्चे के साथ संबंधों में सही संतुलन बनाए रखने के लिए ये बहुत आवश्यक है कि आप बजाय उन पर अपने नियम थोपने या उन पर पूरी तरह से अपना कंट्रोल बनाए रखने के उनके साथ हर विषय पर संवाद बनाए रखिए। इसमें किसी भी स्तर पर दूरी न आने दें। आपकी इस दिशा में की गई कोशिश ही आगे चलकर आप दोनों के संबंधों का आधार बनेगी। ज़ाहिर है, सभी चाहेंगे कि ये संबंध आपसी समझदारी पर बनें।
 
सहयोगी का विश्वास बनाए रखिए
 
हम हर जगह सामान्य रूप से इस बात को देखते ही हैं कि किशोर होते बच्चे अपने माता-पिता से हर बात शेयर नहीं करते, बल्कि ज़्यादातर बातें छिपा ही लेते हैं। यह बहुत ही ज़रूरी है कि आप उनके व्यवहार या हर गलती के प्रति कठोर या तानाशाह होने या अनुशासन के नाम पर बार-बार दंड देने की गलती न करें। उनमें ये विश्वास पैदा होना ज़्यादा जरूरी है कि वे आप पर विश्वास कर सकते हैं और आप उनकी बातें सुनेंगे-समझेंगे। इसी विश्वास के आधार पर यह स्थिति बन पाती है कि वे आपसे परेशान होने या चिढऩे की बजाय इस बात पर भरोसा कर पाएं कि स्थिति चाहे कुछ भी हो, आप उनका साथ निभाएंगे।