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कभी खाने के थे लाले, आज फूलों से महक उठा है जीवन

काजल लाल

6th July 2019

कभी खाने के थे लाले, आज फूलों से महक उठा है जीवन
कभी चीथड़ों में लिपटा बदन और कई-कई जून भूखे पेट रहकर जिंदगी गुजारने वाली आशा देवी ने जब ठान लिया कि इस ज़िंदगी से तौबा कर अच्छी ज़िंदगी गुजारेंगे तो उनके जीवन में फूलों ने दस्तक दी। फूलों की खेती से अपने जीवन को नई दिशा देने वाली आशा देवी ने न सिर्फ अपने, बल्कि दर्जन भर और महिलाओं के जीवन में ऐसी खुशबू बिखेरी है कि उजड़ने के कगार पर पहुंची उनके जीवन की बगिया भी गुलजार हो उठी।
 
मेहनत और शिक्षा पर किया भरोसा
बिहार की राजधानी पटना से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित है बिहटा प्रखंड है। यूं तो इस प्रखंड का अमहरा गांव आर्थिक और शैक्षणिक रूप से समृद्ध है, पर इसी गांव के एक कोने में कच्चे मकानों की दहलीज के भीतर कुछ महिलाओं की ज़िंदगी गरीबी की घुटन से कुम्हला रही थी। ऐसे में जीवन को बदलने की चाहत में प्रखंड की आशा देवी और सुनीता देवी घर की दहलीज लांघ कुदाल पकड़ खेतों में कूद पड़ी। अपने छोटे से हिस्से की जमीन की छोटी सी बगिया में फूलों की खेती शुरू कर दी।
 
दूसरों के लिए बनीं प्रेरणा
फूलों की खेती से दोनों महिलाओं का जीवन बदल गया और इसे देखते ही देखते दूसरे घरों से भी लगभग दर्जन-भर महिलाएं निकल पड़ीं। पहले तो सबने साक्षरता की सूची से खुद को जोड़ा। इसके बाद शुरू हुई, गरीबी से लड़ाई। जब हाथ से हाथ मिले और ताकत बने, तब बैंक भी साथ आए। सबने मिलकर 'ज्योति जीविका' समूह बना डाला और बैंक से कर्ज लेकर सामूहिक रूप से फूलों की खेती में उतरीं, तब फूलों की खुशबू दूर-दूर तक बिखरने लगी और लक्ष्मी की कृपा भी बरसने लगी। आज न सिर्फ आशा देवी और सुनीता देवी, बल्कि अन्य सभी की ज़िंदगी में भी खुशहाली छा गई है। इनके फूलों की बाजार में काफी डिमांड है, इसलिए अच्छे दाम मिल जाते हैं। इनकी गरीबी भी छूमंतर हो गई और इन महिलाओं ने अपने ऊपर लदे कर्जों से भी मुक्ति पा ली है।
 
 
 
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