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पुरुषों के हितों की भी रक्षा करता है कानून

अनुजा कपूर

16th July 2019

हमेशा से ये माना जाता रहा है कि कानून महिला हितों की रक्षा में अक्सर पुरुषों के हितों की अनदेखी कर देता है, लेकिन ये पूरा सच नहीं है। ये ठीक है कि भारत में महिलाओं के शोषण का इतिहास इतना पुराना है कि उन्हें इससे बचाने के लिए विशेष संरक्षण की ज़रूरत है। यहां तक कि ये स्थिति आज भी बहुत ज़्यादा नहीं बदली है। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार आज भी समाचारों की सुॢखयों में रहते हैं। इन्हीं के चलते कानून में महिला हितों की रक्षा के लिए लचीला रुख अपनाया गया है, लेकिन इसका मतलब ये हर्गिज़ नहीं है कि पुरुषों के हितों की अनदेखी की गई है।

पुरुषों के हितों की भी रक्षा करता है कानून

कानून हर उस व्यक्ति के साथ है, जिसे इसके संरक्षण की ज़रूरत होती है, लेकिन अगर कोई अपने किसी स्वार्थ के चलते इसका दुरुपयोग करता है तो इसके लिए भी कानून में कड़ा प्रावधान है।

सबसे पहले भारतीय पुरुषों के कानूनी अधिकारों को लेकर आंदोलन वर्ष 1988 में, दिल्ली में शुरू हुआ। इसका मकसद महिलाओं द्वारा मानसिक दुव्र्यवहार और पत्नियों द्वारा अपने पतियों व उनके परिवार पर दहेज़ मांगने का आरोप लगाकर कानून की धारा 498 ए का दुरुपयोग को रोकना था। आंदोलन की शुरुआत 'सोसायटी फॉर प्रीवेंशन ऑफ क्रुआलिटी टु हसबैंड्स नामक संगठन के तौर पर हुई। साथ ही इस ओर भी ध्यान खींचा गया कि पत्नियों द्वारा अपने पतियों पर किए जाने वाला मानसिक अत्याचार भी कुछ कम बड़ी त्रासदी नहीं है। इसके चलते अनेक पुरुष न केवल गहरे मानसिक तनाव व अवसाद तक के शिकार तक हो जाते हैं, बल्कि उनमें जीने की इच्छा तक खत्म होने लगती है, जो उन्हें आत्महत्या करने या फिर बदले की भावना के चलते कोई बड़ा अपराध अंजाम देने तक को उकसाती है। मामले की गंभीरता को समझते हुए इसमें न केवल सुप्रीम कोर्ट तक ने संज्ञान लिया, बल्कि ज़रूरत के आधार पर कई बदलाव भी किए गए, जैसेकि- 

  • अब न्यायालय द्वारा इस बात को भी बार-बार रेखांकित किया जाता है कि कानून की नज़र में पीडि़त केवल पीडि़त होता है और अपराधी केवल अपराधी, चाहे वह महिला हो या पुरुष। इस विषय को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने और समस्याओं के संयुक्त समाधानों की दिशा में अभी काफी जागरुकता की ज़रूरत है। पुरुषों के लिए हेल्पलाइन, कानूनी जानकारी व सजगता, कानूनी सुरक्षा मानकों जैसे उपायों से पुरुष पीडि़तों की मदद की जा सकती है, लेकिन इस मामले में दो बातें ज़रूर याद रखने की ज़रूरत है कि कानून सभी के लिए बराबर है और सभी के लिए कानून का पालन अनिवार्य है।
  • पुरुषों की सच्चाई के आधार पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में ये तक व्यवस्था की है कि पति को अपने माता-पिता को छोडऩे के लिए मजबूर करने की स्थिति में, जो कि पूरी तरह से उनकी आय पर ही आश्रित हों, पत्नी की ओर से उनकी बीमारी के लिए खर्च मुहैया कराया जाए। 
  • यदि पत्नी इस मामले में झूठ बोलती है कि पति ने उसे शारीरिक, मानसिक या आर्थिक रूप से प्रताडि़त किया है तो उसके दावे झूठे पाए जाने की स्थिति में उल्टा उसी के खिलाफ मामला दर्ज करवाया जा सकता है। 
  • इसके अतिरिक्त न्यायालय ने पत्नियों के खिलाफ पुरुषों को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए निर्धारित कानूनों के तहत भी गिरफ्तारी की अनिवार्यता पर ज़ोर दिया है। पति के माता-पिता को भी बगैर किसी कारण के गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए।
  • वर्ष 2014 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज़ संबंधी अपराधों की शिकायतों की ज़मीनी सच्चाइयां समझते हुए अपना पक्ष रखा और इस तरह के मामलों में दर्ज करवाई गई शिकायत के आधार पर पुलिस द्वारा तुरंत ही खुद ही गिरफ्तारी के प्रावधान को समाप्त कर दिया और भारत की सभी राज्य सरकारों को अपने पुलिस अधिकारियों को आईपीसी की धारा 498 ए से जुड़े मामलों में स्वत: गिरफ्तारी नहीं करने के निर्देश देने का आदेश दिया।
  • पुरुष सदस्य अपमान या मानसिक प्रताडऩा होने पर अपनी पत्नी के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए वे आईपीसी की धारा 500 के तहत अपनी शिकायत दर्ज कराकर सहायता मांग सकते हैं और इसी की धारा 9 के तहत मुआवज़े की मांग तक कर सकते हैं। 
  • जब बात तलाक की हो तो सिर्फ़ महिला ही नहीं, पुरुष भी तलाक मांग सकते हैं और अपनी आर्थिक व शारीरिक स्थिति के आधार पर पत्नी से भरण-पोषण के लिए भी रकम देने को कह सकते हैं।
  • पुरुषों पर होने वाले मानसिक अत्याचारों का प्रभाव बाहरी रूप से कम ही दिखता है। साथ ही ये भी सामाजिक  धारणा बनी हुई है कि पुरुषों का यौन शोषण हो ही नहीं सकता। ऐसा केवल महिलाओं के साथ ही होता है। यहां हाल के वर्षों में इस तरह के मामलों में पुरुषों को पर्याप्त राहत देने की व्यवस्था की गई है।

 

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