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डायबिटीज़ के साथ जब शुरू हो प्रेगनेंसी

गृहलक्ष्मी टीम

19th July 2019

डायबिटीज़ के साथ जब शुरू हो प्रेगनेंसी

मधुमेह

‘‘मैं मधुमेह से ग्रस्त हूँ। क्या शिशु पर इसका असर हो सकता है?’’

इन दिनों गर्भवती मधुमेह ग्रस्त महिलाओं के लिए बहुत सी खुशखबरियाँ हैं। मेडिकल व स्वयं की बढ़िया देखभाल से आप भी स्वस्थ शिशु की माँ बन सकती हैं। अध्ययनों से पता चला है कि मधुमेह टाइप-1 हो या टाइप-2, गर्भधारण से पहले सामान्य रक्त ग्लूकोज के स्तर पर आ जाता है व पूरे नौ महीने तक ठीक ही रहता है। चाहे आपको पहले से मधुमेह हो या आप गर्भावस्था के दौरान गैस्टेशनल डायबिटीज से ग्रसित हो गई हो, निम्नलिखित की मदद से सुरक्षित डिलीवरी व स्वस्थ शिशु पा सकेंगी।

उपयुक्त डॉक्टर का चुनाव :- आपके प्रसूति विशेषज्ञ को मधुमेह के विषय में जानकारी होने के साथ साथ आपके मधुमेह का इलाज कर रहे डॉक्टर के साथ भी तारतम्य बैठना होगा। आपको दूसरी माँओं की तुलना में डॉक्टरों के ज्यादा चक्कर लगाने होंगे।

अच्छी आहार योजना :- आपको किसी डॉक्टर व पोषण विज्ञानी की मदद से अपनी खुराक के लिए पूरी योजना बनानी होगी ताकि शिशु व आपके लिए पौष्टिक तत्त्वों का अभाव न हो। इसमें कॉम्पलैक्स कार्बोहाइट्रेट की मात्रा अधिक, प्रोटीन की मात्रा सीमित तथा वसा व कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होगी।रेशेदार भोजन की पर्याप्त मात्रा भी बहुत महत्त्व रखती है।

वैसे कार्बोहाइड्रेट की अनियमितता को इंसुलिन की मदद से पूरा कर सकते हैं। देखना यह है आपका शरीर कुछ निश्चित कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थों के लिए कैसी प्रतिक्रिया देता है। अधिकतर मरीज फलों की बजाय सब्जियों,फलीदार पदार्थों व साबुत अनाजों से ही इसकी भरपूर मात्रा ले लेते हैं। ब्लड शुगर का सामान्य स्तर बनाए रखने के लिए सुबह के समय कार्बोहाइड्रेट की पर्याप्त मात्रा लें। स्नैक्स में भी कॉम्पलैक्स कार्ब व प्रोटीन की भरपूर मात्रा होनी चाहिए। खाना न खाने से ब्लड शुगर का स्तर घट सकता है। दिन में हर कुछ घंटे बाद कुछ न कुछ खाएँ। नियमित रूप से स्वस्थ व पौष्टिक स्नैक्स खाने से आप कई परेशानियों से बची रहेंगी।

वजन बढ़ाना :- गर्भधारण से पहले ही अपना आदर्श वजन पा लें। यदि आपका वजन ज्यादा है तो उसे घटाने की योजना रखें। डॉक्टर के कहे अनुसार धीरे-धीरे वजन बढ़ाएँ। डॉक्टर अल्ट्रासाउंड की मदद से शिशु की बढ़त जांचते रहेंगे।

व्यायाम :- यदि आप टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हैं तो व्यायाम को सीमित मात्रा में रखना होगा। इससे आपको ज्यादा ऊर्जा मिलेगी,ब्लड शुगर का स्तर बना रहेगा व डिलीवरी के बाद अपनी फिगर पाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इसे अपने मेडिकल प्लान के साथ मेल करके ही आगे बढ़ाएं। यदि आपकी गर्भावस्था में कोई जटिलता नहीं है तो आप हल्की चहलकदमी व तैराकी को वर्कआउट में शामिल कर सकती हैं। यदि शिशु की बढ़त से जुड़ी कोई समस्या दिखी तो शायद आपको ज्यादा व्यायाम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

वैसे वर्कआउट से पहले कुछ सावधानियाँ रखना न भूलें । वर्कआउट से पहले कुछ खाएँ। थकान की हद तक व्यायाम न करें। गर्म वातावरण में कसरत न करें। यदि इंसुलिन लेती हैं तो इसे शरीर के उन अंगों में न लें, जहाँ से वर्कआउट करती हैं, जैसे चहलकदमी व टॉगें। व्यायाम से पहले इंसुलिन की मात्रा भी न घटाएँ।

आराम:- तीसरी तिमाही में पर्याप्त विश्राम बहुत महत्वपूर्ण है। ज्यादा थकान से बचें व दोपहर को थोड़ा पाँव ऊँचा करके लेटें या झपकी लें यदि नौकरी में ज्यादा बोझ हो तो आपको पहले ही छुट्टी लेने की सलाह दी जा सकती है।

दवाएँ :- यदि आहार व व्यायाम से बात न बने तो आपको इंसुलिन लेनी होगी। यदि इंसुलिन के इंजेक्शन पर डाला जा सकता है। इंसुलिन की खुराक समय-समय पर बदलनी पड़ सकती है। आपका व शिशु का वजन बढ़ने के साथ-साथ खुराक नए सिरे से तैयार की जाएगी। अध्ययनों से पता चला है कि‘ग्लाइबुराइड’ दवा लेने से भी कम गंभीर मामलों में इंसुलिन की खपत घटाई जा सकती है। इंसुलिन लेते समय बाकी दवाओं पर भी ध्यान दें क्योंकि वे भी इंसुलिन के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं। अपने डॉक्टर की राय से केवल सुरक्षित दवा ही लें।

ब्लॅड शुगर :- आपको दिन में चार से दस बार ब्लॅड शुगर के स्तर की जांच करनी पड़ सकती है। यदि आपको टाईप-1 मधुमेह है तो ग्लाइकोसिलेटिड हीमोग्लोबिन के लिए भी आपके रक्त की जांच की जा सकती है।इसका ऊंचा स्तर होने का मतलब है कि शुगर का स्तर पूरी तरह नियंत्रित नहीं है। ब्लॅड ग्लूकोज का सामान्य स्तर बनाए रखने के लिए आपको नियमित समय से खाना-पीना होगा,आहार व व्यायाम पर ध्यान देना होगा व जरूरत पड़ने पर दवा भी लेनी होगी। यदि आप गर्भावस्था से पहले भी इंसुलिन ले रही थीं तो आप हाइपोग्लाइसीमिया की शिकार हो सकती हैं इसलिए पहली तिमाही में जांच पर पूरा ध्यान दें। घर से निकलते समय खाने-पीने का सामान अवश्य रखें।

मूत्र की जांच :- आपके शरीर में कीटोन बन सकते हैं इसलिए इस दौरान मूत्र की जांच भी होनी चाहिए।

सावधानीपूर्वक जांच :- टेस्टों के बारे में सोचकर परेशान न हों। आपको गर्भावस्था से कई सप्ताह पहले ही अस्पताल में भी भर्ती होना पड़ सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि कुछ गलत है, बस डॉक्टर आपकी पूरी सुरक्षा चाहते हैं। टेस्टों की जांच से आपकी व शिशु की ताजा जानकारी मिलती रहेगी ताकि डॉक्टर जरूरत पड़ने पर कोई और कदम उठा सकें। आपको आंखों की भी नियमित रूप से जांच करानी होगी। कई बार गर्भावस्था मेंरेटीना व किडनी की समस्याएँ काफी बढ़ जाती हैं। यदि गर्भाशय में शिशु का आकार बढ़ जाए तो योनिमार्ग से डिलीवरी के अलावा दूसरे विकल्प के बारे में सोचा जाता है। 10वें व 22वें सप्ताह में अल्ट्रासाउंड की मदद से भ्रूण की बारीकी से जांच की जाती है ताकि सब-कुछ पता चलता रहे।

21वें सप्ताह के बाद आपको दिन में तीन बार शिशु की हलचल जांचने को कहा जा सकता है। मधुमेह से ग्रस्त महिलाओं कोप्रीक्लैंपसिया का डर भी रहता है इसलिए डॉक्टर इस बारे में भी पूरी तरह से निश्चिंत होना चाहेंगे।

इलेक्टिव अर्ली डिलीवरी :- गैस्टेशनल मधुमेह या कम गंभीर लक्षणों वाली गर्भवती महिलाएं सही समय से प्रसव करती हैं किंतु जब प्लेसेंटा जल्दी क्षीण होने लगता है या माँ की रक्त शर्करा का स्तर सामान्य नहीं रहता तो शिशु समय से एक-दो सप्ताह पहले पैदा हो सकता है। डॉक्टर ही जांच के बाद बता सकते हैं कि सी-सैक्शन करना होगा या डिलीवरी सामान्य होने की प्रतीक्षा की जा सकती है। यदि शिशु को जन्म के तुरंत बाद आईसी.यू. में रखा जाए तो घबराएँ नहीं। ऐसे सभी शिशुओं को इसी तरह रखा जाता है। वहां उनके फेफड़ों व मधुमेह से जुड़े लक्षणों की जांच होती है। आपको शिशु को स्तनपान कराना हो तो उसका भी प्रबंध हो जाता है।

 

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