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घर जमाई

प्रेमचंद

18th July 2019

हरिधन जेठ की दुपहरी में ऊख में पानी देकर आया और बाहर बैठा रहा। घर में से धुआं उठता नज़र आता था। छन-छन की आवाज़ भी आ रही थी। उसके दोनों साले उसके बाद आये और घर में चले गये। दोनों सालों के लड़के भी आये और उसी तरह अंदर दाखिल हो गए, पर हरिधन अंदर न जा सका। इधर एक महीने से उसके साथ यहां जो बरताव हो रहा था और विशेषकर कल उसे जैसी फटकार सुननी पड़ी थी, वह उसके पांव में बेडिय़ां-सी डाले हुए था। कल उसकी सास ही ने तो कहा था- मेरा जी तुमसे भर गया। मैं तुम्हारी जि़ंदगी भर का ठेका लिए बैठी हूं क्या? और सबसे बढ़कर अपनी स्त्री की निष्ठुरता ने उसके हृदय के टुकड़े कर दिए थे।

घर जमाई
 
वह बैठी यह फटकार सुनती रही, पर एक बार भी तो उसके मुंह से न निकला, 'अम्मां, तुम क्यों इनका अपमान कर रही हो?' बैठी गट-गट सुनती रही। शायद मेरी दुर्गति पर खुश हो रही थी। इस घर वह कैसे जाए? क्या फिर वही गालियां खाने, वही फटकार सुनने के लिए? और आज घर में जीवन केदस साल गुज़र जाने पर यह हाल हो रहा है! मैं किसी से कम काम करता हूं? दोनों साले मीठी नींद सोते रहते हैं और मैं बैलों को सानी-पानी देता हूं, छांटी काटता हूं। वहां सब लोग पल-पल चिलम पीते हैं, मैं आंखें बंद किए अपने काम में लगा रहता हूं। 
 
संध्या समय घरवाले गाने-बजाने चले जाते हैं। मैं घड़ी रात तक गायें-भैंसें दुहता हूं। उसका यह पुरस्कार मिल रहा है कि कोई खाने को भी नहीं पूछता। उलटे और गालियां मिलती हैं। उसकी स्त्री घर में से डोल लेकर निकली और बोली- ज़रा इस कुएं से खींच लो, एक बूंद पानी नहीं है। हरिधन ने डोल लिया और कुएं से पानी भर लाया। उसे ज़ोर की भूख लगी हुई थी। समझा, अब खाने को बुलाने आएगी, मगर स्त्री डोल लेकर अंदर गई तो वहीं की हो रही। हरिधन थका-मांदा, क्षुधा से व्याकुल पड़ा सो रहा। सहसा उसकी स्त्री गुमानी ने आकर उसे जगाया। हरिधन ने पड़े-पड़े ही कहा- क्या है? क्या पड़ा भी न रहने देगी या और पानी चाहिए? गुमानी कटु स्वर में बोली- गुर्राते क्यों हो, खाने को बुलाने आई हूं।
 
हरिधन ने देखा, उसके दोनों साले और बड़े साले के दोनों लड़के भोजन किए चले जा रहे थे। उसकी देह में आग लग गई। मेरी अब यह नौबत पहुंच गई कि इन लोगों के साथ बैठकर खा भी नहीं सकता। ये लोग मालिक हैं। मैं इनकी जूठी थाली चाटनेवाला हूं। मैं इनका कुत्ता हूं, जिसे खाने के बाद टुकड़ा रोटी डाल दी जाती है। यही घर है, जहां आज के दस साल पहले उसका कितना आदर-सत्कार होता था। साले गुलाम बने रहते थे। सास मुंह जोहती रहती थी। स्त्री पूजा करती थी। तब उसके पास रुपये थे, जायदाद थी। अब वह दरिद्र है। उसकी सारी जायदाद को इन्हीं लोगों ने कूड़ा कर दिया। अब उसे रोटियों के भी लाले हैं। उसके जी में ज्वाला-सी उठी कि इसी वक्त अंदर जाकर सास को और साली को भिगो-भिगोकर लगाए, पर जब्त करके रह गया। पड़े-पड़े बोला- मुझे भूख नहीं है। आज न खाऊंगा। गुमानी ने कहा- न खाओगे मेरी बला से, हां नहीं तो! खाओगे, तुम्हारे ही पेट में जाएगा, कुछ मेरे पेट में थोड़े ही चला जाएगा। हरिधन का क्रोध आंसू बन गया। वह मेरी स्त्री है, जिसके लिए मैने अपना सर्वस्व मिट्टी में मिला दिया। मुझे उल्लू बनाकर यह सब अब निकाल देना चाहते हैं।
 
वह अब कहां जाए! क्या करे! उसकी सास आकर बोली- चलकर खा क्यों नहीं लेते जी, रूठते किस पर हो। यहां तुम्हारे नखरे सहने का किसी में बूता नहीं है। जो देते हो, वह मत देना और क्या करोगे! तुमसे बेटी ब्याही है, कुछ तुम्हारी जि़ंदगी का ठेका नहीं लिया है। हरिधन ने मर्माहत होकर कहा- हां अम्मां, मेरी भूल थी कि मैं यही समझ रहा था। अब मेरे पास क्या है कि तुम मेरी जि़ंदगी का ठेका लोगी? जब मेरे पास धन भी था, तब सब कुछ आता था। अब दरिद्र हूं, तुम क्यों बात पूछोगी? बूढ़ी सास भी मुंह फुलाकर भीतर चली गई। बच्चों के लिए बाप एक फालतू-सी चीज़-एक विलास की वस्तु है, जैसे घोड़े के लिए चने या बाबुओं के लिए मोहनभोग। रोटी-दाल, मोहनभोग उम्र-भर न मिले तो किसका नुकसान है, मगर एक दिन रोटी-दाल के दर्शन न हों तो फिर देखिए, क्या हाल होता है! पिता के दर्शन कभी-कभी शाम-सबेरे हो जाते हैं, वह बच्चे को उछालता है, दुलारता है, कभी गोद में लेकर या उंगली पकड़कर सैर कराने ले जाता है और बस यही उसके कर्तव्य की इति है। वह परदेश चला जाए, बच्चे को परवा नहीं होती, लेकिन मां तो बच्चे का सर्वस्व है। 
 
बालक एक मिनट के लिए भी उसका वियोग नहीं सह सकता। पिता कोई हो, उसे परवा नहीं, केवल एक उछालने-कुदानेवाला आदमी होना चाहिए, लेकिन माता तो अपनी ही होनी चाहिए, सोलहों-आने अपनी। वही रूप, वही रंग, वही ह्रश्वयार, वही सब कुछ। वह अगर नहीं है तो बालक के जीवन का स्रोत मानो सूख जाता है। फिर वह शिव का नंदी है, जिस पर फूल या जल चढ़ाना लाजि़मी नहीं, अख़्ितयारी है। हरिधन की माता का आज दस साल हुए, देहांत हो गया था। उस व$क्त उसका विवाह हो चुका था। वह सोलह साल का कुमार था, पर मां के मरते ही उसे मालूम हुआ, मैं कितना निस्सहाय हूं। जैसे उस घर पर उसका कोई अधिकार ही न रहा हो। बहनों के विवाह हो चुके थे। भाई कोई दूसरा न था। बेचारा अकेले घर में जाते भी डरता था। मां के लिए रोता था, पर मां की परछाई से डरता था। जिस कोठरी में उसने देह-त्याग किया था, उधर वह आंखें तक न उठाता। घर में एक बुआ थीं, वह हरिधन को बहुत दुलार करतीं। हरिधन को अब दूध ज़्यादा मिलता, काम भी कम करना पड़ता।
 
बुआ बार-बार पूछतीं- बेटा! कुछ खाओगे? बाप भी अब से उसे ज़्यादा ह्रश्वयार करते। उसके लिए अलग एक गाय मंगवा दी। कभी-कभी उसे कुछ पैसे देते कि जैसे चाहे $खर्च करे, पर इन मरहमों से वह घाव न पूरा होता था, जिसने उसकी आत्मा को आहत कर दिया था। वह दुलार और ह्रश्वयार उसे बार-बार मां की याद दिलाता। मां की घुड़कियों में जो मज़ा था, वह क्या इस दुलार में था? मां से मांगकर, लड़कर, ठुनककर, रूठकर लेने में जो आनंद था, वह क्या इस भिक्षादान में था? पहले वह स्वस्थ था, मांग-मांगकर खाता था, अब वह बीमार था, अच्छे-से-अच्छे पदार्थ उसे दिए जाते थे, पर भूख न थी।
 
साल भर तक वह इस दशा में रहा। फिर दुनिया बदल गई। एक नई स्त्री, जिसे लोग उसकी माता कहते थे, उसके घर में आई और देखते-देखते एक काली घटा की तरह उसके संकुचित भूमंडल पर छा गई, सारी हरियाली, सारे प्रकाश पर अंधकार का परदा पड़ गया। हरिधन ने इस नकली मां से बात तक न की, कभी उसके पास गया तक नहीं। एक दिन घर से निकला और ससुराल चला आया। बाप ने बार-बार बुलाया, पर उनके जीते जी वह फिर उस घर में नहीं गया। जिस दिन उसेपिता के देहांत की सूचना मिली, उसे एक प्रकार का ईष्र्यामय हर्ष हुआ। उसकी आंखों में आंसू की एक बूंद भी न आई। इस नए संसार में आकर हरिधन को एक बार फिर मातृ-स्नेह का आनंद मिला। उसकी सास ने ऋषि-वरदान की भांति उसके शून्य जीवन को विभूतियों से परिपूर्ण कर दिया। मरुभूमि में हरियाली उत्पन्न हो गई। सालियों की चुहल की सारी आकांक्षाएं पूरी हो गईं। सास कहतीं- बेटा, तुम इस घर को अपना ही समझो, तुम्हीं मेरी आंखों के तारे हो। वह उससे अपने लड़कों की, बहुओं की शिकायत करती। वह दिल में समझता था, सासजी मुझे अपने बेटों से भी ज़्यादा चाहती हैं।
 
बाप के मरते ही वह घर गया और अपने हिस्से की ज़ायदाद को कूड़ा करके रुपयों की थैली लिए फिर आ गया। अब उसका दूना आदर-सत्कार होने लगा। उसने अपनी सारी संपत्ति सास के चरणों पर अर्पण करके अपने जीवन को सार्थक कर दिया। अब तक उसे कभी-कभी घर की याद आ जाती थी, अब भूलकर भी उसकी याद न आती, मानो वह उसके जीवन का कोई भीषण कांड था, जिसे भूल जाना ही उसके लिए अच्छा था। वह सबसे पहले उठता, सबसे ज़्यादा काम करता। उसका मनोयोग, उसका परिश्रम देखकर गांव केलोग दांतों उंगली दबाते थे। उसके ससुर का भाग्य बखानते, जिसे ऐसा दामाद मिल गया! लेकिन ज्यों-ज्यों दिन गुज़रते गए, उसका मान-सम्मान घटता गया। पहले देवता था, फिर घर का आदमी, अंत में घर का दास हो गया। रोटियों में भी बाधा पड़ गई। अपमान होने लगा। अगर घर के लोग भूखों मरते और साथ ही उसे भी मरना पड़ता तो उसे ज़रा भी शि$कायत न होती, लेकिन जब वह देखता और लोग मूंछों पर ताव दे रहे हैं, केवल मैं ही दूध की मक्खी बना दिया गया हूं तो उसके अंतस्तल से एक लंबी, ठंडी आह निकल जाती। अभी उसकी उम्र कुल पच्चीस ही साल की तो थी। इतनी उम्र इस घर में कैसे गुज़रेगी? और तो और उसकी स्त्री ने भी आंखें फेर लीं! यह उस विपत्ति का सबसे क्रूर दृश्य था।
 
हरिधन तो उधर भूखा-ह्रश्वयासा चिंता-दाह में जल रहा था, इधर घर में सासजी और दोनों सालों में बातें हो रही थीं। गुमानी भी हां-में-हां मिलाती जाती थी। बड़े साले ने कहा- हम लोगों की बराबरी करते हैं। यह नहीं समझते कि किसी ने उनकी जि़ंदगी-भर का बीड़ा थोड़े ही लिया है। दस साल हो गए। इतने दिनों में क्या दो-तीन हज़ार न हड़प गए होंगे? छोटे साले बोले- मजूर हो तो आदमी घुड़केभी, डांटे भी, अब इनसे कोई क्या कहे। न जाने इनसे कभी पिंड छूटेगा भी या नहीं। अपने दिल में समझते होंगे, मैंने दो हज़ार रुपये नहीं दिए हैं? यह नहीं समझते कि उनके दो हज़ार कब के उड़ चुके। सवा सेर तो एक जून को चाहिए। सास ने गंभीर भाव से कहा- बड़ी भारी खुराक है!
 
गुमानी माता के सिर से जूं निकाल रही थी। सुलगते हुए हृदय से बोली- निकम्मे आदमी को खाने के सिवा और काम ही क्या रहता है! बड़े- खाने की कोई बात नहीं है। जिसको जितनी भूख हो, उतना खाए, लेकिन कुछ पैदा करना चाहिए। यह नहीं समझते कि पहुनई में किसी के दिन कटे हैं! छोटे- मैं तो एक दिन कह दूंगा, अब आप अपनी राह लीजिए, आपका करजा नहीं खाया है। गुमानी घरवालों की ऐसी-ऐसी बातें सुनकर अपने पति से द्वेष करने लगी थी। अगर वह बाहर से चार पैसा लाता तो इस घर में उसका कितना मान-सम्मान होता, वह भी रानी बनकर रहती। न जाने क्यों कहीं बाहर जाकर कमाते उनकी नानी मरती है। 
 
गुमानी की मनोवृत्तियां अभी तक बिल्कुल बालपन की-सी थीं। उसका अपना कोई घर न था। उसी घर का हित-अहित उसके लिए भी प्रधान था। वह भी उन्हीं शब्दों में विचार करती, इस समस्या को उन्हीं आंखों से देखती, जैसे उसके घरवाले देखते थे। सच तो है, दो हज़ार रुपये में क्या किसी को मोल ले लेंगे? दस साल में दो हज़ार रुपये ही क्या हैं? दो सौ ही तो साल-भर के हुए। क्या दो आदमी सालभर में दो सौ भी न खाएंगे? फिर कपड़े-लत्ते, दूध-घी सभी कुछ तो है। दस साल हो गए, एक पीतल का छल्ला नहीं बना। घर से निकलते तो जैसे इनके प्राण निकलते हैं। जानते हैं, जैसे पहले पूजा होती थी, वैसे ही जन्म-भर होती रहेगी। यह नहीं सोचते कि पहले और बात थी, अब और बात है। बहू ही पहले ससुराल जाती है तो उसका कितना महातम होता है, उसके डोली से उतरते ही बाजे बजते हैं, गांव-मुहल्ले की औरतें उसका मुंह देखने आती हैं और रुपये देती हैं। 
 
महीनों उसे घर-भर से अच्छा खाने को मिलता है, अच्छा पहनने को। कोई काम नहीं लिया जाता, लेकिन छह महीने बाद कोई उसकी बात भी नहीं पूछता, वह घर-भर की लौंडी हो जाती है। उसके घर में मेरी तो वही गति होती। फिर काहे का रोना। जो यह कहो कि मैं तो काम करता हंू तो तुम्हारी भूल है, मजूर की और बात है। उसे आदमी डांटता भी है, मारता भी है, जब चाहता है रखता है, जब जी चाहता है निकाल देता है। कसकर काम लेता है। यह नहीं कि जब जी में आया, कुछ काम किया, जब जी में आया, पड़कर सो रहे।
 
हरिधन भी पड़ा अंदर-ही-अंदर सुलग रहा था कि दोनों साले बाहर आए और बड़े साहब बोले- भैया, उठो, तीसरा पहर ढल गया, कब तक सोते रहोगे? सारा खेत पड़ा हुआ है।
हरिधन चट उठ बैठा और तीव्र स्वर में बोला- क्या तुम लोगों ने मुझे उल्लू समझ लिया है?
दोनों साले हक्का-बक्का हो गए। जिस आदमी ने कभी जबान नहीं खोली, हमेशा गुलामों की तरह हाथ बांधे हाजि़र रहा, वह आज एकाएक इतना आत्माभिमानी हो गया, यह उनको चौंका देने के लिए काफी था। कुछ जवाब न सूझा।
 
हरिधन ने देखा, इन दोनों के कदम उखड़ गए हैं तो एक धक्का और देने की प्रबल इच्छा को न रोक सका। उसी ढंग से बोला- मेरी भी आंखें हैं, अंधा नहीं हूं, न बहरा ही हूं। छाती फाड़कर काम करूं और उस पर भी कुत्ता समझा जाऊं, ऐसे गधे कहीं और होंगे। अब बड़े साले भी गरम पड़े- तुम्हें किसी ने यहां बांध तो नहीं रखा है। अबकी हरिधन लाजवाब हुआ। कोई बात न सूझी। बड़े ने फिर उसी ढंग से कहा- अगर तुम यह चाहो कि जन्म-भर पाहुंने बने रहो और तुम्हारा वैसा ही आदर-सत्कार होता रहे तो यह हमारे बस की बात नहीं है।
 
हरिधन ने आंखें निकालकर कहा- क्या मैं तुम लोगों से कम काम करता हूं? बड़े- यह कौन कहता है? हरिधन- तो तुम्हारे घर की यही नीति है कि जो सबसे ज़्यादा काम करे वही भूखों मारा जाए? बड़े- तुम खुद खाने नहीं गए। क्या कोई तुम्हारे मुंह में कौर डाल देता? हरिधन ने होंठ चबाकर कहा- मैं खुद नहीं गया! कहते तुम्हें लाज नहीं आती। 'नहीं आई थी बहन तुम्हें बुलाने?' हरिधन की आंखों में खून उतर आया, दांत पीसकर रह गया।
 
 
छोटे साले ने कहा- अम्मा भी आई थीं। तुमने कह दिया, मुझे भूख नहीं है तो क्या करतीं।
सास भीतर से लपकी चली आ रही थीं। यह बात सुनकर बोली- कितना कहकर हार गई, कोई उठे न तो मैं क्या करूं! हरिधन ने विष, खून और आग से भरे हुए स्वर में कहा- मैं तुम्हारे लड़कों का जूठा खाने के लिए हूं! मैं कुत्ता हूं कि तुम लोग खाकर मेरे सामने रूखी रोटी का टुकड़ा फेंक दो? बुढिय़ा ने ऐंठकर कहा- तो क्या तुम लड़कों की बराबरी करोगे? हरिधन परास्त हो गया! बुढिय़ा के एक ही वाक प्रहार ने उसका काम तमाम कर दिया। उसकी तनी हुई भवें ढीली पड़ गई, आंखों की आग बुझ गई, फड़कते हुए नथने शांत हो गए।
 
किसी आहत मनुष्य की भांति वह ज़मीन पर गिर पड़ा। 'क्या तुम मेरे लड़कों की बराबरी करोगे?' यह वाक्य एक लंबे भाले की तरह उसके हृदय में चुभता चला जाता था, न हृदय का अंत था, न उस भाले का! सारे घर ने खाया, पर हरिधन न उठा। सास ने मनाया, सालियों ने मनाया, ससुर ने मनाया, दोनों साले मनाकर हार गए। हरिधन उठा, वहां द्वार पर एक टाट पड़ा था। उसे उठाकर सबसे अलग कुएं पर ले गया और जगत पर बिछाकर पड़ा रहा। रात भीग चुकी थी। अनंत आकाश में उज्ज्वल तारे बालकों की भांति क्रीड़ा कर रहे थे। कोई नाचता था, कोई उछलता था, कोई हंसता था, कोई आंखें मींचकर फिर खोल देता था। 
 
रह-रहकर कोई साहसी बालक सपाटा भरकर एक पल में उस विस्तृत क्षेत्र को पार कर लेता था और न जाने कहां छा जाता था। हरिधन को अपना बचपन याद आया, जब वह भी इसी तरह क्रीड़ा करता था। बाल-स्मृतियां उन्हीं चमकीले तारों की भांति प्रज्वलित हो गईं। वह अपना छोटा-सा घर, वह आम का बाग, जहां वह कैरियां चुना करता था, वह मैदान, जहां वह कबड्डी खेला करता था, सब उसेयाद आने लगे फिर अपनी स्नेहमयी माता की सदय मूत उसके सामने खड़ी हो गई। उन आंखों में कितनी करुणा थी, कितनी दया थी। 
 
उसे ऐसा जान पड़ा, मानो माता आंखों में आंसू भरे, उसे छाती से लगा लेने के लिए हाथ फैलाए उसकी ओर चली आ रही है। वह उस मधुर भावना में अपने को भूल गया। ऐसा जान पड़ा, मानो माता ने उसे छाती से लगा लिया है और उसके सिर पर हाथ फेर रही है। वह रोने लगा, फूट-फूटकर रोने लगा। उसी आत्म-सम्मोहित दशा में उसके मुंह से यह शब्द निकले- अम्मां, तुमने मुझे इतना भुला दिया। देखो, तुम्हारे ह्रश्वयारे लाल की क्या दशा हो रही है? उसे पानी को भी नहीं पूछता। क्या जहां तुम हो, वहां मेरे लिए जगह नहीं है! 
 
सहसा गुमानी ने आकर पुकारा- क्या सो गए तुम, ऐसी भी क्या राच्छसी नींद! चलकर खा क्यों नहीं लेते? कब तक कोई तुम्हारे लिए बैठा रहे। हरिधन उस कल्पना जगत से क्रूर प्रत्यक्ष में आ गया। वही कुएं की जगत थी, वही फटा हुआ टाट और गुमानी सामने खड़ी कह रही थी- कब तक कोई तुम्हारे लिए बैठा रहे! हरिधन उठ बैठा और मानो तलवार म्यान से निकालकर बोला- भला हो, तुम्हें मेरी सुध तो आई! मैंने तो कह दिया था, मुझे भूख नहीं। गुमानी- तो कितने दिन तक न खाओगे?
 
'अब इस घर का पानी भी न पीऊंगा। तुझे मेरे साथ चलना है या नहीं?' दृढ़ संकल्प से भरे हुए शब्दों को सुनकर गुमानी सहम उठी। बोली- कहां जा रहे हो? हरिधन ने मानो नशे में कहा- तुझे इससे क्या मतलब? मेरे साथ चलेगी या नहीं? फिर पीछे से न कहना, मुझसे कहा नहीं।
गुमानी आपत्ति के भाव से बोली- तुम बताते क्यों नहीं, कहां जा रहे हो? 'तू मेरे साथ चलेगी या नहीं?' 'जब तक तुम बता न दोगे, मैं न जाऊंगी?'
 
 
'तो मालूम हो गया, तू नहीं जाना चाहती। मुझे इतना ही पूछना था, नहीं तो अब तक मैं आधी दूर निकल गया होता।' यह कहकर उठा और अपने घर की ओर चला। गुमानी पुकारती रही- 'सुन लो सुन लो।' पर उसने फिरकर भी न देखा। तीस मील की मंजि़ल हरिधन ने पांच घंटों में तय की। जब वह अपने गांव की अमराइयों के सामने पहुंचा तो उसकी मातृ-भावना ऊषा की सुनहरी गोद में खेल रही थी। उन वृक्षों को देखकर उसका विह्वल हृदय नाचने लगा। मंदिर का सुनहरा कलश देखकर वह इस तरह दौड़ा जा रहा था, मानो उसकी माता गोद फैलाए उसे बुला रही हो। जब वह आमों के बाग में पहुंचा, जहां डालियों पर बैठकर वह हाथी की सवारी का आनंद पाता था, जहां के कच्चे बेरों और लिसोड़ों में एक स्वर्गीय स्वाद था तो वह बैठ गया और भूमि पर सिर झुकाकर रोने लगा, मानो अपनी माता को अपनी विपत्ति-कथा सुना रहा हो।
 
वहां की आयु में, वहां के प्रकाश में, मानो उसकी विराट-रूपिणी माता व्याह्रश्वत हो रही थी। वहां की अंगुल-अंगुल भूमि माता के पद-चिह्नों से पवित्र थी? माता के स्नेह में डूबे हुए शब्द अभी तक मानो आकाश में गूंज रहे थे। इस वायु और इस आकाश में न जाने कौन-सी संजीवनी थी, जिसने उसके शोकात्र्त हृदय को फिर बालोत्साह से भर दिया। वह एक पेड़ पर चढ़ गया और अधर से आम तोड़-तोड़कर खाने लगा। सास के वह कठोर शब्द, स्त्री का वह निष्ठुर आघात, वह सारा अपमान उसे भूल गया। उसके पांव फूल गए थे, तलवों में जलन हो रही थी, पर इस आनंद में उसे किसी बात का ध्यान न था।
 
सहसा रखवाले ने पुकारा- वह कौन ऊपर चढ़ा है रे? उतर अभी, नहीं तो ऐसा पत्थर खींचकर मारूंगा कि वहीं ठंडे हो जाओगे। उसने कई गालियां भी दीं। इस फटकार और इन गालियों में इस समय हरिधन को अलौकिक आनंद मिल रहा था। वह डालियों में छिप गया, कई आम काट-काट नीचे गिराए और जोर से ठट्टा मारकर हंसा। ऐसी उल्लास से भरी हुई हंसी उसने बहुत दिन से न हंसी थी।
 
रखवाले को यह हंसी परिचित मालूम हुई, मगर हरिधन यहां कहां? वह ससुराल की रोटियां तोड़ रहा है! कैसा हंसोढ़ा था, कितना चिबिल्ला। न जाने बेचारे का क्या हाल हुआ? पेड़ की डाल से तालाब में कूद पड़ता था। अब गांव में ऐसा कौन है? डांटकर बोला वहां से बैठे-बैठे हंसोगे तो आकर सारी हंसी निकाल दूंगा, नहीं तो सीधे उतर जाओ। 
 
वह गालियां देते जा रहा था कि एक गुठली आकर उसके सिर पर लगी। सिर सहलाता हुआ बोला- यह कौन शैतान है, नहीं मानता। ठहर तो, मैं आकर तेरी खबर लेता हूं। उसने अपनी लकड़ी नीचे रख दी और बंदरों की तरह चट-पट ऊपर चढ़ गया। देखा तो हरिधन बैठा मुस्करा रहा है। चकित होकर बोला- अरे हरिधन, तुम यहां कब आए? इस पेड़ पर कब से बैठे हो?
दोनों बचपन के सखा वहीं गले मिले।
 
'यहां कब आए?' चलो, घर चलो। भले आदमी, क्या वहां आम भी मयस्सर न होते थे?'
हरिधन ने मुस्कुराकर कहा, मंगरू, इन आमों में जो स्वाद है, वह और कहीं के आमों में नहीं है। गांव का क्या रंग-ढंग है? मंगरू- सब चैनचान है भैया! तुमने तो जैसा नाता ही तोड़ लिया। इस तरह कोई अपना गांव-घर छोड़ देता है? जब से तुम्हारे दादा मरे, सारी गिरस्ती चौपट हो गई। दो छोटे-छोटे लड़के हैं। उनके किए क्या होता है? 
 
हरिधन- अब उस गिरस्ती से क्या वास्ता है भाई? मैं तो अपना ले-दे चुका? मजूरी तो मिलेगी न? तुम्हारी गैया ही चरा दिया करूंगा, मुझे खाने को दे देना। मंगरू ने अविश्वास के भाव से कहा- अरे भैया कैसी बातें करते हो, तुम्हारे लिए जान हाजिर है। क्या ससुराल में अब न रहोगे? कोई चिंता नहीं। पहले तो तुम्हारा घर ही है। उसे संभालो। छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनको पालो। तुम नई अम्मां से नाहक डरते थे। बड़ी सीधी है बेचारी। बस, अपनी मां समझो। तुम्हें पाकर तो निहाल हो जाएगी। अच्छा, घरवाली को भी तो लाओगे? 
 
हरिधन- उसका अब मुंह न देखूंगा। मेरे लिए वह मर गई। मंगरू- तो दूसरी सगाई हो जाएगी। अबकी ऐसी मेहरिया ला दूंगा कि उसके पैर धो-धो पियोगे, लेकिन कहीं पहली भी आ गई तो?
हरिधन- वह न आएगी। हरिधन अपने घर पहुंचा तो दोनों भाई, 'भैया आये! भैया आये! कहकर भीतर दौड़े और मां को खबर दी। उस घर में कदम रखते ही हरिधन को ऐसी शांत महिमा का अनुभव हुआ, मानो वह अपनी मां की गोद में बैठा हुआ है।
 
इतने दिनों ठोकरें खाने से उसका हृदय अकोमल हो गया था। जहां पहले अभिमान था, आग्रह था, हेकड़ी थी, वहां अब निराशा थी, पराजय और याचना थी। बीमारी का ज़ोर कम हो चला था, अब उस पर मामूली दवा भी असर कर सकती थी। किले की दीवारें छिद चुकी थीं। अब उस में घुस आना असाध्य न था। वही घर, जिससे वह एक दिन विरक्त हो गया था, अब गोद फैलाए उसे आश्रय देने को तैयार था। हरिधन का निरवलम्ब मन यह आश्रय पाकर मानो तृह्रश्वत हो गया।
 
शाम को विमाता ने कहा- बेटा, तुम घर आ गए, हमारे धन्य भाग। अब इन बच्चों को पालो। मां का नाता न सही, बाप का नाता तो है ही। मुझे एक रोटी दे देना, खाकर एक कोने में पड़ी रहंूगी। तुम्हारी अम्मां से मेरी बहन का नाता है। उस नाते से तुम लड़के होते है। हरिधन ने मातृ-विह्वïल आंखों से विमाता के रूप में अपनी माता के दर्शन किए। घर के एक-एक कोने में मातृ-स्मृतियों की छटा चांदनी की भांति छिटकी हुई थी। विमाता का प्रौढ़ मुखमंडल भी उसी छटा से रंजित था।
 
दूसरे दिन हरिधन फिर कंधे पर हल रखकर खेत को चला। उसके मुख पर उल्लास था और आंखों में गर्व। वह अब किसी का आश्रित नहीं, आश्रयदाता था, किसी के द्वार का भिक्षुक नहीं, घर का रक्षक था। एक दिन उसने सुना, गुमानी ने दूसरा घर कर लिया। मां से बोला- तुमने सुना काकी! गुमानी ने घर कर लिया। काकी ने कहा- घर क्या कर लेगी, ठट्ठा है। बिरादरी में ऐसा अंधेर? पंचायत नहीं, अदालत तो है? हरिधन ने कहा- नहीं काकी, बहुत अच्छा हुआ। ला, महावीरजी को लड्डू चढ़ा आऊं। मैं तो डर रहा था, कहीं मेरे गले न आ पड़े। भगवान ने मेरी सुन ली। मैं वहां से यही ठानकर चला था, अब उसका मुंह न देखूंगा।

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