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  पेरेंट्स इन ख़ास तरीकों से किशोरावस्था में बच्चों का डिप्रेशन कम कर सकते हैं 

संविदा मिश्रा

9th August 2019

आमतौर पर देखा गया है कि माता-पिता अपने किशोरावस्था की और बढ़ते बच्चे के बारे में बहुत ज्यादा चिंतित काफी चिंतित रहते हैं। बदलती जीवनशैली कहें , अनुचित खान - पान या फिर प्रतिस्पर्धा का माहौल बच्चे जाने अंजाने डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। कई बार ये डिप्रेशन इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि किशोर आत्महत्या जैसा बड़ा कदम तक उठा लेते हैं। ऐसे में पेरेंट्स को चाहिए कि बच्चों को डिप्रेशन की स्थिति से बचाने  के लिए उनका हर काम में पूरा सहयोग दें। 

  पेरेंट्स इन ख़ास तरीकों से किशोरावस्था में बच्चों का डिप्रेशन कम कर सकते हैं 
आज सुबह न्यूज़ में जब देखा कि 16 वर्षीय किशोर ने  8 वीं मंज़िल से कूदकर आत्महत्या कर ली तो दिल दहल उठा। मन में एक दर सा बैठ गया की आखिर क्या कमी रह जाती है पेरेंट्स की परवरिश में कि बच्चे ऐसा गलत कदम उठा लेते हैं। भला कौन से पेरेंट्स चाहेंगे कि बचपन से पालपोश कर बड़ा करने के बाद ऐसा कुछ हो जाए। एग्जाम में मार्क्स काम आने की टेंशन , प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटने का डर, पेरेंट्स का दूसरे बच्चों के साथ तुलना करना, किशोरावस्था में स्कूल या कॉलेज में प्यार में मिलने वाला धोखा या फिर हमेशा आगे निकलने की होड़ वजह कुछ भी हो लेकिन जन्म लेता है किशोरों में डिप्रेशन...... 
ये डिप्रेशन किशोरों के मन मस्तिष्क में इतना हावी हो जाता है कि उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता , पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता और कई बार तो उन्हें अपने ही माता-पिता अपने दुश्मन नज़र आने लगते हैं। ऐसे में पेरेंट्स कुछ ख़ास तरीके अपनाकर किशोरावस्था में बढ़ रहे बच्चों को डिप्रेशन की स्थिति से बचा सकते हैं। 
 
 
किशोरावस्था में बच्चों को स्पेशल केयर और सपोर्ट दें 
किशोरावस्था ऐसी अवस्था है जब बच्चा जो भी करता है सही या गलत उसे वो सही ही लगता है ऐसे में बच्चे को स्पेशल केयर की ज़रुरत होती है बच्चों के साथ बैठकर हर मुद्दे पर बातचीत करनी चाहिए। बच्चों का पूरा सपोर्ट करना चाहिए जिससे वो अपनी हर बात का निर्णय पेरेंट्स की मदद से कर सकें। 
 
बच्चों के जीवन का उद्देश्य तय करने में उनकी मदद करें 
 
पेरेंट्स को चाहिए कि  बच्चों को जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य तय करने में उनकी मदद करें।  बच्चों को बताएं कि  उनके स्किल्स के हिसाब से उनके लिए किस क्षेत्र में जाना ठीक है। कई बार ऐसा भी होता है कि पेरेंट्स जिस क्षेत्र में बच्चे को भेजना चाहते हैं बच्चा उसमें नहीं जाना चाहता है।  ऐसे में उसकी प्रतिभा को ध्यान में रखकर ही बच्चे को  दिशा निर्देश दें। कई बार आपका सख्त रवैया बच्चे को डिप्रेशन की स्थिति में ले आता है। 
 
स्कूल का माहौल बदलने की कोशिश करें 
कई बार ऐसा होता है कि स्कूल का माहौल बच्चे की प्रगति में बाधा उत्पन्न करता है जैसे कि  स्कूल में अलग-अलग परिवेश के बच्चे आते हैं और सबका सोचने समझने का और काम करने का ढंग अलग होता है। यदि आपको लगता है कि स्कूल का माहौल बच्चे को तनावग्रस्त कर रहा है तो उसकी टीचर से बात करके माहौल बदलने का पत्र्यास करें। यदि ऐसा न हो पाए तो बच्चे को उस स्कूल से निकालकर दूसरे स्कूल में दाल दें। 
 
सोशल और इमोशनल वैल्यूज सिखाएं 
बच्चा यदि इस उम्र में अलग रहना पसंद करता है तो  उसे समाज और रिश्तों की अहमियत समझाएं और उसे सबके बीच बैठकर बातें करने की सलाह दें। बच्चे को बहुत ज्यादा देर तक अकेला न छोड़ें अकेले रहने से बच्चा समाज से अलग महसूस करने लगता है। और कई बार डिप्रेशन में चला जाता है। 
 

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