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दूसरों की देखादेखी से अच्छा है कुछ प्रकृति से सीखें

जग्गी वासुदेव

20th September 2017

दूसरों की देखादेखी उन्हीं के सांचे में अपनी जिंदगी को ढालने का प्रयत्न करेंगे तो जीवन नरक बन जाएगा हां... अपनी प्रकृति को समझे बिना, उल्टी दिशा में पतवार चलाना ही सभी दिक्कतों का कारण है...

दूसरों की देखादेखी से अच्छा है कुछ प्रकृति से सीखें
 
किसी चौराहे पर चंद मिनट खड़े होकर वहां से गुजरने वाले लोगों पर गौर कीजिए। ध्यान से देखिए, कितने लोगों के चेहरे पर खुुशी नाच रही है। सौ जने निकल गए तो उनमें से केवल चार-पांच चेहरों पर आपने हंसी देखी होगी। वे लोग नौजवान भी हैं। क्या कारण है, बाकी लोग उदासी में मुंह लटकाए खोए-खोए नजर आए? ऐसा क्यों?
 
किसलिए बाहर जाकर देखना है? खुद अपने को आईने में देखिए न... क्या आपके चेहरे पर खुशी और प्रसन्नता है? या जबर्दस्ती हंसी लानी पड़ती है?
पांच साल की उम्र में आप बगीचे में तितली के पीछे भाग रहे थे, याद आ रहा है? तितली को छूते हुए उसके रंग आपके हाथ पर झिलमिलाते हुए चिपक गए। उस समय आपको यही अनुभव हो रहा था कि दुनिया में उससे बढ़कर और कोई आनंद है ही नहीं। आपके अंदर से खुशी उमग-उमग कर फूट रही थी, है न?
पांच साल में आपका कद कितना था? अब आपकी लंबाई कितनी है? आपकी खुशी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए थी न?
 
मासूमियत से भरी उस अबोध वय में आपने खुशी के सिवा और किसी भाव को नहीं जाना था। उसके बाद क्या हुआ? आप पलकर बड़े हुए। खुशी से रहने के लिए कई चीजों को ढूंढ-ढूंढ कर इकट्ठा किया। ऊंची पढ़ाई, कम्प्यूटर, अपना मकान, मोटर बाइक, गाड़ी, क्रेडिट कार्ड, टेलीविजन, डी.वी.डी, ए.सी. मोबाइल फोन वगैरह-वगैरह... अपनी-अपनी कोशिशों के मुताबिक जाने कितनी सुविधाएं आप लोगों ने एकत्रित कर लीं? सारे जहां को जीतने का दम भरने वाले शहंशाहों को भी इतनी सारी सुविधाएं मयस्सर नहीं थीं, पता है आपको?
 
लेकिन क्या हुआ? खुशियां पाने के लिए जिंदगी में इतना सब कुछ ढूंढने के बावजूद आपने सिर्फ खुशी को गवां दिया कहां गईं आपकी खुशियां?
इच्छित वस्तु न मिलने पर यदि आप मुंह लटकाए फिरें वह भी मूर्खता ही है। लेकिन वांछित वस्तु मिलने के बाद भी खुशी भोगने का गुर जाने बिन किसलिए भटक रहे हैं?
 
प्रकृति से आपको सीखने के लिए कई सारी बातें हैं
 
नारियल के पेड़ को ही लीजिए। आपके बाग में ऊंचा खड़ा यह नरियल का पेड़ गुच्छे पर गुच्छे जायकेदार नारियल देता रहता है। दूसरे पेड़ों को काटने पर भी नारियल का पेड़ काटने का आपका मन नहीं करेगा। पानी सींचकर उसकी परवरिश करते हैं। क्या वह आपसे पानी की प्रतीक्षा करते हुए नारियल के गुच्छों को ढोता है?
उसकी जो प्रकृति है, सौ फीसदी उसी के मुताबिक काम होता है। उसे जो पानी मिलना होता है, कहीं न कहीं से मिल ही जाता है।
प्रकृति... उसके अनुरूप कार्य... फिर उसका फल... यही कुदरत की नियति है लेकिन आप?
 
आप सचिन की तरह क्रिकेट खेलना चाहते हैं, ऐश्वर्या राय की खूबसूरती चाहते हैं, बिल गेट्स की तरह धन-कुबेर बन जाने की इच्छा करते हैं, इस तरह का एक बंगला, उस तरह की कार, उनकी जैसी सुखमय जिंदगी, इनकी जैसी धाक... आप पहले से ही फल का चुनाव कर लेते हैं, फिर उस लक्ष्य को पाने के लिए काम पर उतर जाते हैं। इस बात की चिंता या परवाह नहीं करते कि वह आपकी प्रकृति के अनुरूप है या नहीं? आप उसे अपनी प्रकृति बनाने की कोशिश करते हैं।
 
इस तरह दूसरों की देखादेखी उन्हीं के सांचे में अपनी जिंदगी को ढालने का प्रयत्न करेंगे तो जीवन नरक बन जाएगा हां... अपनी प्रकृति को समझे बिना, उल्टी दिशा में पतवार चलाना ही सभी दिक्कतों का कारण है...
आपकी मूलभूत इच्छा में कोई दोष नहीं है।
लेकिन अपनी प्रकृति क्या है, इसे आप कैसे समझेंगे? सवाल यही है।
 
 
   सद्गुरू जग्गी वासुदेव

 

 
 

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