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क्या औरत होना अपराध है?

दामिनी यादव

17th August 2018

आज आए दिन रेप के जितने मामले सामने आ रहे हैं, ऐसा लगता है कि उन्होंने जागरूकता पैदा करने की बजाय समाज को उदासीन करने का काम ज़्यादा किया है। लोग चाय के घूंट के साथ इन खबरों को भी पढ़ते हैं और फिर पन्ना पलटकर आगे बढ़ जाते हैं। क्या यही वक्त नहीं है एक पल ठहर कर सोचने का?

क्या औरत होना अपराध है?

तीन महीने की बच्ची के साथ रेप, ग्यारह साल की बच्ची के साथ मंदिर में रेप के बाद हत्या, अस्सी साल की अंधी बुढिय़ा के साथ बलात्कार, महिला के साथ बलात्कार के बाद मंदिर के ही हवन-कुंड में जलाकर मार दिया... ये इस तरह की खबरों में से कुछ एक ही हैं। सबसे ताज़ा मामला है चेन्नई का, जहां ग्यारह साल की बधिर बच्ची का उसी की बिल्डिंग के वॉचमैन, लिफ्टमैन, प्लम्बर, सिक्योरिटी गार्ड, इलेक्ट्रिशियन जैसे कुल मिलाकर लगभग अट्ठारह लोग मिलकर सात महीने तक बलात्कार करते रहे। क्या इस विषय को उठाने के लिए इतनी संख्या काफी है या और आंकड़ों की ज़रूरत है?

कैसी मानवीयता, कैसा समाज

सीमोन द बोउवार के शब्दों में कहें तो औरत पैदा नहीं होती है, बल्कि बनाई जाती है। अगर ये बात सच है तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि जिस दिन औरत को ये अनुभूति हो कि उसने एक 'औरत’ का शरीर पाया है तो उसी दिन से उसे डरना भी शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि ये देह तो इतनी कमज़ोर होती है कि जिसे कोई भी, कभी भी, कहीं भी रौंद सकता है? वर्तमान मानवीय समाज से मानवता गायब हो जाने के बावजूद ये कहा जाता है कि सारे प्राणियों में यही सबसे सभ्य समाज है। इस सभ्य समाज के रखवालों और ठेकेदारों के महान उद्गारों की एक झलक देखें तो साफ दिख जाता है कि महिलाओं की हित चिंता की बत्ती सबसे पहले उनकी नाक के नीचे और उन्हीं के सहयोग से बनती है। उदाहरण के लिए कभी कोई ये कहकर फतवा जारी कर देता है कि ये औरतें जो जींस- स्कर्ट जैसे छोटे कपड़े पहनकर, मोबाइल फोन पर हंसी-ठट्ठा करके पुरुषों को उकसाती हैं, इन्हीं वजहों से बेचारे मर्द बहक जाते हैं और फिर उनके हाथों रेप जैसी घटना हो जाती है। इसी विषय पर समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव के उस विवादित बयान को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि रेप जैसे मामलों में फांसी नहीं दी जानी चाहिए। लड़के तो लड़के हैं और लड़कों से तो गलती हो ही जाती है तो इसकी वजह से उन्हें कोई फांसी पर थोड़े न चढ़ा देंगे। इस बयान के बाद जब उनकी चौतरफा आलोचना होने लगी तो वे अपने बयान से पलट गए कि उनकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है, जबकि ये बयान उन्होंने मुरादाबाद में हज़ारों की संख्या में मौजूद लोगों को एक रैली में संबोधित करते हुए दिया था। आश्चर्य है कि हज़ारों की उस भीड़ में तालियों की गूंज कान फोड़ रही थी। मगर, किसी भी इंसान के शब्द बदले जा सकते हैं, उसकी सोच नहीं, क्योंकि इस बयान के कुछ ही अर्से बाद उन्होंने फिर एक बयान दिया कि रेप कोई एक आदमी करता है और नामज़द चार को कर दिया जाता है, जबकि एक औरत के साथ चार आदमी रेप कर ही नहीं सकते। कितनी अजीब बात है कि ये शब्द उन पदों पर बैठे व्यक्तियों के हैं, जिनसे इस समस्या के समाधान के लिए उम्मीदें बांधी जाती हैं कि ऐसी घटना के बाद वे सहानुभूति जताते हुए मुआवज़ा नहीं, ठोस समाधान दें।

सज़ा से भी नहीं मिलता समाधान

वर्तमान समय में यौन शोषण के पीडि़तों में केवल बच्चियां ही नहीं, बल्कि बच्चे भी शामिल हैं। इस अपराध की गंभीरता को देखते हुए वर्ष 2012 में पास्को एक्ट, यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल असॉल्ट एक्ट-2012 बनाया गया। इसके तहत बच्चों का सेक्सुअल हैरेसमेंट, सेक्सुअल असॉल्ट और प्रोर्नोग्राफी जैसे अपराधों को शामिल किया गया। साथ ही अलग-अलग अपराधों के लिए अनेक सज़ाओं का प्रावधान है। अट्ठारह साल से कम उम्र के सभी बच्चों के लिए इस कानून में अनेक व्यवस्थाएं की गई हैं। लड़के और लड़कियों को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करने वाले इस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों की सुनवाई भी विशेष अदालत में की जाती है। अपराध की गंभीरता के अनुसार इसमें कड़े जुर्माने के साथ ही तीन साल से लेकर दस साल तक की सज़ा का प्रावधान है। कानून के जानकारों के अनुसार, हमारे संविधान में दंड तो हर अपराध के लिए तय है, मगर इसमें कमियां इतनी हैं, जिनके कारण अपराधी अगर एक एक्ट के तहत दंड के दायरे में आता है तो कोई दूसरा एक्ट विकल्प के तौर पर उसके लिए राहत का कारण बन जाता है। कुख्यात निर्भया रेप केस में भी इसका एक उदाहरण देखने को मिला था, जब एक अपराधी को जुवेनाइल होने का लाभ सज़ा में मिल गया था।

ये है हालत देश में रेप के मामलों की

महिलाओं से सामूहिक दुष्कर्म के अनुसार वर्ष 2017 में केवल हरियाणा में ही जितने मामले दर्ज हुए, उससे ये तस्वीर बनती है कि वहां हर दिन कम से कम चार महिलाओं के साथ यौन अपराध हुए हैं। इस प्रकार हरियाणा इस अपराध में नंबर वन राज्य बना हुआ है। वहीं मैट्रो शहरों में दिल्ली को महिलाओं के मामले में सबसे असुरक्षित माना गया है। हरियाणा में ही वहां के महिलाओं के खिला$फ अपराध सेल, यानी सीएडब्ल्यू और राष्ट्रीय महिला अपराध ब्यूरो ने सच्चाई को सामने लाने का काम किया। इन आंकड़ों के अनुसार मात्र हरियाणा में ही वर्ष 2017 की एक जनवरी से लेकर तीस नवंबर तक राज्य में एक हजार दो सौ अड़तीस मामले महिलाओं के साथ दुष्कर्म के और दो हजार नवासी मामले महिला उत्पीडऩ के दर्ज हुए है। ये दशा है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अगुवा राज्य की। यहां इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज भी रेप के जितने मामले दर्ज होते हैं, उससे कई गुना ज़्यादा मामले लोक-लाज के चलते दबा दिए जाते हैं। हरियाणा के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु का नंबर आता है।

एक थी सुज़ैट जॉर्डन

पूरा समाज जानता है कि जब किसी महिला के साथ रेप जैसी घटना होती है तो उसमें उसका दोष न होने के बावजूद सामाजिक बहिष्कार के रूप में जि़ंदगी भर सज़ा उसी को भुगतनी होती है। मान लिया जाता है कि ज़रूर उस औरत ने ही कुछ किया होगा, वरना किसी और के साथ न होकर उसी महिला के साथ ऐसा क्यों होता। बलात्कार का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन सुज़ैट जॉर्डेन जैसी दुस्साहसी महिला और कोई नहीं बन सकी। वर्ष 2012 में कोलकाता में गैंग रेप का शिकार हुई इस दिलेर महिला ने कभी न तो अपने-आप को गुनाहगार माना, न ही अपनी पहचान छिपा कर समाज को ऐसा करने दिया। महिलाओं से जुड़े अपराधों का समाधान कहीं से निकल सकता है तो केवल इसी रूप में कि वे खुद इनके खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करें। स्वयं को शारीरिक रूप से आत्मरक्षा के लिए सक्षम बनाना इन अपराधों की पहली रोकथाम है या फिर बाज़ार में बिकने वाली सारी कैंडेल्स खरीद कर रख ली जाएं। जैसे ही फिर कोई निर्भया बनेगी, वैसे ही हम उन्हें न्याय दिलाने के लिए भीड़ बनाकर इन्हें जलाएंगे।

 

 

औरतों और बच्चों को हमारे संविधान में माइनोरिटी का दर्जा दिया गया है। इनके लिए कानून में विशेष प्रावधान है, लेकिन आज का सच यह है कि कानून, पुलिस, मीडिया सबकी भूमिका संदिग्ध हो चुकी है। कानून बचाने वाले ही अपने स्वार्थ के लिए कानून से खिलवाड़ करते हैं। रिपोर्ट लिखने वाले पुलिस कर्मी चक्कर पर चक्कर कटाते हैं। रिपोर्ट लिखाने गए लोगों में से कितने इस बात को जानते हैं कि पुलिस वाला कभी ऑफ ड्यूटी नहीं होता। मीडिया क्यों भूल गया कि रेप जैसे मामलों की खबर सेंसर करके दिखाई जाती है, न कि ये बताते हुए कि प्राइवेट पार्ट को किस तरह से क्षत-विक्षत कर दिया गया था। रेपिस्ट प्रीडेटर पर्सनेलिटी वाले होते हैं, जो इस माइनोरिटी वर्ग पर घात लगाकर हमला करते हैं और पीडि़त के दर्द को इंज्वॉय करते हैं।

 

 

हमें ये समझ लेना चाहिए कि रेपिस्ट पूरी तरह से मानसिक रोगी होते हैं। उनके निजी जीवन में सेक्सुअल डिसऑर्डर, सेक्सुअल एब्यूज़ जैसे कई कारण मिलते हैं, जो उनके इस अपराध की जड़ में होते हैं। उनमें से कई तो खुद भी यौन हिंसा के शिकार रह चुके होते हैं। हमारे समाज में आज भी सेक्स एजुकेशन का बहुत बुरा हाल है। यहां तक कि लोग इसकी ज़रूरत ही नहीं महसूस करते, जिसका सामाजिक परिणाम हम दिन पर दिन बढ़ रहे यौन हिंसा के अपराधों के रूप में देख ही रहे हैं। आज महिलाएं तो क्या दुधमुंहे बच्चे तक कोई भी सुरक्षित नहींं हैं। रेप जैसे अपराधों में लिप्त व्यक्ति मानसिक रूप से इतना बीमार हो चुका होता है कि उसके लिए पीड़ित का चीखना-चिल्लाना, गिड़गिड़ाना मनोरंजन का साधन होता है, न कि मानवीयता दिखाने का।

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