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जि़ंदगी से हारिए नहीं, जि़ंदगी को संवारिए

दामिनी यादव

17th August 2018

आत्महत्या के लगातार बढ़ते मामलों ने इस बात की ज़रूरत पैदा कर दी है कि इसके कारण को समझकर इसके समाधान की दिशा में व्यापक कदम उठाए जाएं। एक कोशिश हमारी भी इस विषय को समझने की-

जि़ंदगी से हारिए नहीं, जि़ंदगी को संवारिए

अगर आपके पड़ोसी के घर में चोरी हो रही है और आप आराम से सो रहे तो याद रखिए, अगला नंबर आपका है। जाने-माने मोटिवेटर शिव खेड़ा जी के ये शब्द इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि वर्तमान समाज में दो घरों के बीच इतनी गहरी खाई है, जितना पहले दो देशों के बीच भी शायद ही रही हो। क्या ये हैरानी की बात नहीं है कि हमारे बीच ही रहते, सहज से लगते परिवार के ग्यारह-ग्यारह लोग सामूहिक रूप से आत्महत्या कर लेते हैं और आस-पास के लोगों को सचेत होने में घंटों लग जाते हैं! परीक्षा में कम नंबर आना इतनी बड़ी हार बन जाता है कि वे बच्चे, जिन्हें अभी जि़ंदगी की कई परीक्षाओं का, कई चुनौतियों का सामना करना है, वे उनसे जूझने की बजाय फांसी के फंदे से झूलना कहीं ज्यादा आसान समझते हैं! ज़रा सा अभाव, ज़रा सी चुनौतियां, ज़रा सी नाकामी जि़ंदगी के उतार-चढ़ाव का हिस्सा न लगकर जि़ंदगी का खात्मा करने के कारण बन जाते हैं। क्या आज वाकई हमें किसी के जीने या मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता!

आगे भी आए तो जि़ंदगी से पिछड़कर

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ अर्सा पहले जारी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की थी कि पूरे विश्व में प्रति वर्ष लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या कर लेते हैं, जिनमें से इक्कीस प्रतिशत मामले अकेले भारत के ही होते हैं। हमारे देश में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल इस सूची में सबसे ऊपर हैं, जिनमें से बुंदेल तो इस मामले में कुख्यात हो चुका है। हमारा देश पूरी दुनिया में इस विषय में अव्वल है। इस विषय ने समाजविज्ञानियों को भी गहरी चिंता में डाल दिया है और इस समस्या के समाधान के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों के ठीक उलट भारत में आत्महत्या के मामले डेढ़ फीसदी की दर से लगातार बढ़ रहे हैं। वैसे तो आज किसी भी वर्ग को इन आंकड़ों से बाहर नहीं रखा जा सकता, लेकिन आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक संख्या दैनिक मज़दूरों की दर्ज की गई है और उनके बाद नंबर आता है महिलाओं का। नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो ने भी कुछ अर्सा पहले इस बात की पुष्टि की थी कि ऐसा करने वालों में अट्ठारह से इकत्तीस वर्ष के आयु वर्ग के लोग ही ज़्यादा होते हैं।

क्या हैं इस पराजय के कारण

इस विषय में मनोविज्ञानियों का कहना है कि आत्महत्या के मामलों में युवाओं की तादाद का लगातार बढऩा एक बड़ी चिंता की वजह है। युवावस्था तो उम्र के उस पड़ाव का नाम होती है, जब पूरी दुनिया जीत लेने का जज्बा दिलों में पलता है। ऐसे में कारण चाहे जो हो, बहुत ज़रूरी है कि इस बात को गंभीरता से लिया जाए और इसका समाधान तलाशा जाए। आत्महत्या के लगभग नब्बे प्रतिशत मामलों में लोग मनोरोग की चपेट में आ चुके होते हैं। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, दूसरों से तुलना, पढ़ाई या नौकरी में लगातार बढ़ती प्रतियोगिता, बेहतर से बेहतरीन करते रहने का दबाव, प्रेम या वैवाहिक संबंधों में असफलता, आर्थिक समस्याएं, अहम का बड़ा होना या अत्यधिक संवेदनशील होना, कारण कुछ भी हो सकता है। पहले के समय में ये मान लिया जाता था कि आत्महत्या करने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी रूप में असफल लोग ही होते हैं, लेकिन पिछले कुछ अर्से में ये बात तेज़ी से उभरकर सामने आई है कि जि़ंदगी में कामयाब लोग भी इसकी चुनौतियों की दौड़ में पिछडऩे पर आत्महत्या जैसा कदम उठाने लगे हैं। समाज शास्त्रियों का तो यहां तक कहना है कि अब ये समस्या किसी एक व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित न रहकर पूरे समाज के मानसिक स्वास्थ्य तक फैल चुकी है।

साझे प्रयास हों समाधान के

इस समस्या की जड़ अगर पूरे समाज में फैलने लगी है तो इसके समाधान के लिए भी पूरे समाज को आगे आना पड़ेगा। 'हमें क्या’ वाला नज़रिया बदले जाने की सख्त ज़रूरत है। ज़रूरी नहीं है कि हर जान-पहचान और मुलाकात के पीछे कोई वजह ही छिपी हो। कुछ सरोकार सिर्फ इंसान होने के नाते भी निभाए जाते हैं। मानवीय समाज कोई जंगल नहीं है। हम और आप भी इसी समाज का हिस्सा हैं, इसलिए जब अगली बार कोई गुमसुम नज़र आए तो एक कोशिश ज़रूर कीजिएगा उस चेहरे पर मुस्कान लाने की।

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