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गर्भावस्था में हुई हानि जैसे मिसकैरिज या नवजात शिशु की मृत्यु का सामना करना

गृहलक्ष्मी टीम

17th September 2019

अगर गर्भावस्था में मिसकैरेज हो जाए या नवजात शिशु की मृत्यु हो जाए तो ये समय अभिभावक के लिए बहुत मुश्किल होता है।

गर्भावस्था में हुई हानि जैसे मिसकैरिज या नवजात शिशु की मृत्यु का सामना करना
गर्भावस्था को एक ऐसा खुशनुमा सफर माना जाता है, जिसमें रहस्य, रोमांच,उत्तेजना, उमंग, शिशु से जुड़े सपने, भय व घबराहट आदि भी शामिल होते हैं।हालांकि ऐसा हमेशा संभव नहीं हो पाता। यदि आपको गर्भावस्था में कोई चोट पहुंची है या आपने अपना नवजात शिशु खो दिया है तो आप बेहतर जानती हैं कि यह दुख शब्दों की सीमा से कहीं परे है। यह अध्याय आपको ही समर्पित है ताकि आप इतने बड़े दुःख से ऊपर उठने की हिम्मत जुटा सकें।
मिसकैरिज
हालांकि यह गर्भावस्था की शुरूआत में ही हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि इसका कोई दुःख नहीं होता। आपने कितनी जल्दी अपना शिशु क्यों न खोया हो, इससे होने वाला दुःख सच्चा होता है। चाहे आपने अल्ट्रासाउंड में भी शिशु को न देखा हो, पर उससे एक नाता तो जुड़ता ही है, न! गर्भावस्था की खबर पाते ही आप शिशु के सपने देखने लगती हैं और स्वयं को मां मानने लगती हैं और फिर महीनों की उत्तेजना व उमंग पल-भर में खत्म हो जाती है। आप उदासी व निराशा में डूब जाती हैं। आपको गुस्सा आता है कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ। आप उन मित्रों व परिवार जन से स्वयं को विरक्त पाती हैं,जिसके यहां शिशु का जन्म हुआ हो। शुरूआत में तो कुछ भी खाना-पीना व सोना तक छूट सकता है। आप काफी रो सकती हैं और हो सकता है कि आप एक आंसू भी न बहाएँ। यह सब कुदरती प्रक्रियाएँ हैं और बिल्कुल सामान्य हैं।
दरअसल कुछ दंपत्तियों के लिए शुरूआत में हुई यह हानि झेलना भी काफी भारी होता है।क्यों? कई लोग तीसरे माह तक यह खबर किसी को बताते नहीं, ऐसे में उन्हें सहारा देनेवाला भी कोई नहीं होता। यहाँ तक कि लोगों के बताने के बावजूद उन्हें इतनी साहनुभूति व सहारा नहीं मिल पाता, जितना कि गर्भावस्था बीतने के बाद मिलता। वे कह सकते हैं। कोई बात नहीं, आप दोबारा कोशिश कर सकते हैं । कोई बात नहीं, अभी तो शुरूआत ही थी।आपके पास शिशु की कोई याद तस्वीर नहीं होती। उसके अंतिम संस्कार की कोई प्रक्रिया नहीं होती ताकि माँ-बाप का दुःख कुछ घट सके।
एक व्यक्तिगत प्रक्रिया
ऐसी हालत में कोई भावनात्मक फार्मूला काम नहीं आता। सभी व्यक्ति निजी रूप से इसका सामना करना चाहते हैं।हो सकता है कि आपको इस दुःख से उबरने में ज्यादा समय लगे या यह भी हो सकता है कि आप जल्दी ही इस सदमे से उबर जाएँ। हो सकता है कि आप जल्दी से दोबारा कोशिश करने को उत्सुक हों। याद रखें, यहाँ वही प्रतिक्रिया सामान्य है, जो आपको सामान्य लगे। अपने-आप को संभालने के लिए आप जो भी करना बेहतर समझें, वही करें। याद रखें कि इस मिकैरिज की वजह से आपको अपनी मर्जी से दुख मनाने या न मनाने की पूरी छूट है। आप किसी भी तरह अपने मनका भार हल्का कर सकती हैं।
शायद आप दोनों किसी निकट पारिवारिक सदस्य की मदद लेना चाहें। यदि आप किसी से अपनी भावनाएं बांटना चाहें तो आपको पता चलेगा कि अधिकतर महिलाओं को अपने प्रजनन वर्षों में ऐसे मिसकैरिज का सामना करना पड़ता है परंतु आपको उनके बारे में पता नहीं था। यदि आप किसी से अपना दुख नहीं बांटना चाहते, तो इसे अपने तक ही रखें। याद रखें कि आप उस दिन के शोक को हमेशा याद रख सकते हैं। या उस दिन को हर साल याद रख सकते हैं। उस दिन कोई नए पेड़-पौधे लगाएँ, एक शांत पिकनिक करें,अपने साथी के साथ कहीं बाहर खाने पर जाएँ।
आपको अपने गम को मनाने का पूरा हक है, तभी आप धीरे-धीरे इसके असर से निकल पाएँगे। यदि आपने इस शोक से निकलने की कोशिश नहीं की तो आप ठीक से खा-पी नहीं सकेंगे, रातों को नींद नहीं आएगी, परिवार से कट जाएँगे, तो हालात बिगड़ने पर व्यावसायिक सलाह भी लेनी पड़ सकती है।अपने-आप को यकीन दिलाएँ कि आप दोबारा गर्भवती होकर माँ बनने की क्षमता रखती हैं।
दोहरे मिसकैरिज का सामना
हालांकि इससे दुःख की मात्रा काफी बढ़ जाती है। आप निराश, निरुत्साहित व चिड़चिड़ी हो जाती हैं। आपके मन व शरीर को सदमे से उबरने में काफी समय लग सकता है। कई शारीरिक लक्षण भी उभर सकते हैं। दूसरों से अपने मन की पीड़ा बांटें। स्वयं को समझाएँ कि इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। डॉक्टर की सलाह लें। अपने साथी की मदद से मनका दुःख हल्का करें। इन भावनाओं को मन से निकालकर सोचें कि आपने हर हालत में एक शिशु की माँ बनना ही है।
 गर्भाशय में ही मृत्यु
जब आपको सैकड़ों घंटों तक शिशु की कोई हलचल सुनाई नहीं देती तो मन डर जाता है। उससे भी बुरा तब होता है, जब आपको पता चलता है कि आपका अजन्मा शिशु नहीं रहा।
शिशु की धड़कन सुन नहीं रही, वह गर्भाशय में ही मर गया, यह सुनकर दिल को गहरी चोट लगती है और आप अचानक इस बात का यकीन नहीं कर पातीं। आपकी अवस्था के हिसाब से ही डॉक्टर तय करते हैं कि आगे क्या किया जाना चाहिए। आपका शोक भी उस माता-पिता से कम नहीं है, जिनका शिशु जन्म के दौरान या जन्म के फौरन बाद ही नहीं रहता।
 जन्म के दौरान या उसके बाद शिशु की मृत्यु
 कई बार डिलीवरी के तुरंत बाद शिशु नहीं रहता महीनों शिशु का इंतजार करने के बाद आप खाली हाथ घर लौटती हैं। यह एक ऐसा दुःख है, जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।आपको इस शोक से उबरने के लिए स्वयं ही हिम्मत करनी होगी।
शिशु को गोद में लें, उसे कोई नाम दें अपनी पीड़ा को स्वीकारें। आप किसी बेनाम जीव के लिए दुःख कैसे मना सकते हैं इसलिए शिशु को वहीं कोई नाम दें। चाहे डॉक्टर की राय में उसे देखना ठीक न हो क्योंकि हो सकता है कि वह शिशु आपकी कल्पना जैसा न हो लेकिन उसे देखने पर उसकी मृत्यु स्वीकारना कहीं आसान हो जाएगा। आपको उसके अंतिम संस्कार करने का व उसे अलविदा कहने का अवसर मिल जाएगा। यदि आप उसे कहीं दफनाती हैं तो आप आने वाले समय में वहाँ फूल चढ़ाने भी जा सकती हैं।
उसकी कोई यादगार, पाँव की छाप जैसी कोई चीज़ अपने पास रखें। उसकी खूबसूरती को मन में बसाएँ; जैसे प्यारे बाल, पतली अंगुलियाँ या गुलाबी गाल वगैरह।
प्रसव के बाद अवसाद व मृत्यु
प्रसव के बाद अवसाद व उत्तेजना से दुःख और भी गहरा जाता है। हालांकि इसे शिशु कीवजह से होने वाले अवसाद से अलग करके पहचानना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इलाज तोदोनों में ही चाहिए। जरूरत पड़ने पर व्यावसायिक मदद लेने में संकोच न करें। अपने डॉक्टरकी सलाह से किसी मनोवैज्ञानिक से मिलें। थेरेपी व दवा की मदद से आराम आ जाएगा।
शिशु की मृत्यु के बाद दूध सूखना
यदि शिशु नहीं रहा तो भी आपके पास उसकी एक यादगार बची है। आपके स्तनों में उसके लिए दूध भरा हुआ है। यदि शिशु नहीं रहा तो स्तनों में उतर आए दूध को संभालना मानसिक व शारीरिक दोनों से काफी तकलीफदेह हो सकता है। यदि आपको स्तनपान कराने का मौका ही नहीं मिला तो स्तनों में रक्त संकुलता हो जाएगी। ऐसे में गर्म पानी से न नहाएँ, निप्पलों को न रगड़ें या स्तनों से दूध न निकालें वरना और दूध बनेगा।
यदि कुछ दिन स्तनपान के बाद शिशु की मृत्यु हुई हो, अपनी नर्स या डॉक्टर से सलाह लें। आपको हाथ या पंप से दूध निकालने की सलाह दी जाएगी ताकि स्तनों में दूध की कितनी मात्रा बनती है, यह उतना ही और बन जाएगा। आपके स्तनों में दूध की कितनी मात्रा बनती है, यह शिशु द्वारा दूध पीने की मात्रा पर निर्भर करती है। स्तनपान छुड़ाने या पंप इस्तेमाल करना बंद करने के बाद भी कई सप्ताह महीनों तक स्तनों से दूध की बूंदें निकल सकती हैं।
यदि आपके पास पर्याप्त मात्रा में दूध रहा हो तो आप इसे मिल्क बैंक को दान भी दे सकती हैं। इससे आपके मन को भी शांति मिलेगी। डॉक्टर से शिशु की रिपोर्ट लें ताकि आपमें हकीकत कबूलने की हिम्मत आ सके। आपको डिलीवरी रूम में ही काफी कुछ बताया गया होगा लेकिन दवाओं, हार्मोन व अवस्था व सदमे की वजह से आप सब कुछ आसानी से समझ नहीं पाई होंगी। दोस्तों व संबंधियों से कहें कि आपने घर पर शिशु के स्वागत की जो तैयारियाँ की थीं उन्हें यूं ही रहने दें वरना घर लौटने पर इस नंगी हकीकत को कबूल करने में और भी परेशानी होगी।
याद रखें कि गम भुलाने की इस प्रक्रिया में आपको अकेलेपन, रोष, क्रोध व अवसाद की अवस्था से गुजरना पड़ सकता है। हर कोई अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है। हो सकता है कि आप कुछ और महसूस कर रही हों।
यह दौर काफी कठिन होगा। आपकी नींद व खाना-पीना छूट जाएगा। दुख व अवसाद में घिर जाएंगी। बच्चों व पति पर झल्लाएंगी।आपको आधी रात को अपने उस शिशु का रोना सुनाई देगा। अपने प्रियजन से घिरे होने के बावजूद स्वयं को अकेला पाएँगी। आपको लगेगा कि आप स्वयं एक बच्चा बन जाएँ जिसे कोई दुलारे, सहलाए व कंधो से लगाए।यह सब सामान्य है।
रोएँ-जितना जी चाहे दिल खोलकर रोएँ। याद रखें कि पिता भी दुःखी होते हैं। माना कि शिशु को उसने नौ महीने तक पेट में नहीं रखा लेकिन फिर भी उसका दुःख किसी मायने में आपसे कम नहीं है। उसे अपने भावों को छिपा कर आपके पास मजबूत बनकर आना पड़ रहा है। आप दोनों मिलकर इस बारे में बात करें ताकि मन हल्का हो जाए। एक-दूसरे का सच्चा सहारा ही इस समय काम आएगा।
एक-दूसरे का ध्यान रखें। अपने गम में इतने मग्न न हों कि दूसरे की सुध ही न रहे। ऐसे हालात में कई बार रिश्तों में भी दरार आ जाती है। माना कि कभी-कभी आप अकेला रहना चाहेंगी लेकिन साथी का दुःख बाँटना भी जरूरी है। दुनिया का अकेले सामना न करें। अगर आप पहली बार मिलने वालों के सवाल से कतरा रही हैं तो जवाब देने के लिए किसी सहेली को साथ लें। वह तकरीबन हर जगह इस खबर को पहुंचा देंगी और आपको इस बारे में खुलासा नहीं करना पड़ेगा। 
कई बार इस मौके पर दोस्तों व रिश्तेदारों को अफसोस जताना नहीं आता। उन्हें समझ ही नहीं आता कि वे क्या कहें। वे कुछ ऐसी बातें कह सकते हैं, जो दिल को ज्यादा चोट पहुंचाती हैं,जैसे मुझे पता है कि तुम क्या महसूस कर रही हो, अच्छा हुआ कि मोह पड़ने से पहले ही शिशु चल बसा, हालांकि उनके कहने का मतलब यही है कि आपको सहानुभूति दी जाए लेकिन वे अपने आप को सही तरीके से प्रकट नहीं कर पाते और आपका दिल दुखा देते हैं।
अपने खास रिश्तेदारों या माँ-बाप को सहारा लें। वे आपके दुःख को समझेंगे और आपको संभलने में मदद करेंगे।
अपना ध्यान रखें। भावनात्मक अवस्था आपकी शारीरिक अवस्था को नुकसान पहुंचा सकती है। सही समय पर खाएँ-पिएँ व सोएँ। व्यायाम भी काफी असरदायक रहेगा। खाने की इच्छा न होने पर भी थाली लगाकर बैठें। गुनगुने पानी से नहाएँ। रात को खाने के बाद टहलें। अपने गम को कुछ देर के लिए भुलाकर कोई फिल्म देखें या किसी मित्र के यहां हो आएँ। जिंदगी तो रुकती नहीं और आपको उसके साथ जीना है।
याद रखें कि शिशु की मौत का गम मनाने के लिए आप अपने हिसाब से चलें। चाहें तो पति-पत्नी इस दुःख को बाँटें या फिर दोस्तों,रिश्तेदारी या बिरादरी को साथ लें।
अपने बच्चे की याद में कोई भलाई का काम करें। चाइल्ड केयर सेंटर के लिए किताबें खरीदें। अनाथालय में चंदा दें। अपने घर या पार्क में कोई नया पौधा रोपें। धर्म व आध्यात्म से भी आपके मन को शांति मिलेगी।
गम के घेरे से निकलने के बाद ही दोबारा गर्भवती होने के बारे में सोचें ताकि भावी शिशु की देखरेख में कमी न हो।माना कि यह दुःख भूलने वाला नहीं है लेकिन इस घटना के छः से नौ महीने के भीतर भी आपका दुःख कम न हो, केंद्रित होने में मुश्किल हो, जीवन के लिए रस न रहे तो आपको व्यावसायिक मदद लेनी चाहिए। अपराधबोध की भावना न पालें। इसकी वजह से आपको दुःख के घेरे से निकलने में परेशानी हो सकती है। अगर आपको लगता है कि आपकी देखरेख में कमी से शिशु नहीं रहा तो व्यावसायिक मदद लें ताकि आपको एहसास हो सके कि यहां आपकी कोई गलती नहीं थी।आप मन हल्का करने के लिए अजन्मे शिशु के नाम पत्र भी लिख सकती हैं, जिसमें आपकी सारी पीड़ा, दुख, आत्मसंदेह व अपराधबोध आजाए।
जुड़वां में से एक शिशु की मृत्यु
जिन माता-पिता के यहाँ जुड़वां या तीन शिशुओं में से एक की मौत हो जाती है तो उन्हें अफसोस व खुशी का जश्न एक साथ मनाने पड़ते हैं।
एक शिशु के जीवित रहने से दूसरे की मौत का अफसोस कम नहीं होता। आपका दिल चूर-चूर हो जाता है। आपको उस शिशु की मौत का गम मनाने का पूरा-पूरा हक है।आपको अपने शिशु की मौत को एक हकीकत माना होगा, तभी आप उस गम से उबर पाएँगे। अपने जीवित शिशु के लिए मन में उमड़ते प्यार को न दबाएँ। उसके भाई-बहन की मृत्यु का मतलब यह नहीं कि उसे आपके प्यार से वंचित होना पड़ेगा। उसके अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है कि आप उसे दिल से अपनाएँ।
खुशखबरी गम के साथ आई है, इसका मतलब यह नहीं कि आप उसका जश्न न मनाएँ। यदि आपको ऐसा मुश्किल लगे तो पहले अपने मृत शिशु का अफसोस मनाएँ फिर दूसरे शिशु की दावत दें।
हो सकता है कि आप स्वयं को इसके लिए दोषी मानने लगें कि आपको ही ज्यादा शिशु संभालने की फिक्र हो रही थी या आप लड़की चाहती ही नहीं थी। याद रखें कि आपकी इच्छा या कल्पना का उस मौत से कोई लेना-देना नहीं है। मान सकते हैं कि आप महीनों से जुड़वां के आने की तैयारी कर रहे थे लेकिन एक ही शिशु को घर ले जा पाएँगे। ऐसे में निराशा स्वाभाविक है लेकिन इसे अपने ऊपर हावी न होने दें। जुड़वां में से एक शिशु की मौत की खबर स्वयं न देना चाहें तो अपनी किसी सहेली को साथ लें। कुछ समय तक घर से निकलने पर उसे साथ रखें ताकि आपको लोगों के सवालों का जवाब न देना पड़े।
लोग आपसे सहानुभूति जताने व जीवित शिशु को आशीर्वाद देने के चक्कर में कुछ ऐसी बातें कह सकते हैं, जिनसे आपके दिल को चोट पहुंचेगी। ऐसे में अपने निकटजन से अपनी भावनाएँ बांटें। उन्हें बताएँ कि जीवित शिशु के लिए खुश होने के साथ-साथ आप उस मृत शिशु के लिए भी दुखी हैं। अवसाद को स्वयं पर हावी न होने दें। इस तरह आपकी व शिशु की देखरेख में कमी आ सकती है। अपने शिशु की मानसिक व शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हिम्मत जुटाएँ।
दुःख की व्यवस्था
कई बार डॉक्टर कह सकते हैं कि मल्टीपल प्रेगनेंसी में किसी एक शिशु को खत्म करना जरूरी है क्योंकि वह जिंदा नहीं रह पाएगा या उसकी वजह से दूसरे शिशु की भी मृत्यु हो सकती है, ऐसे में अपने मन पर अपराधबोध न लें। डॉक्टर की सलाह लें। वे जैसा कहें, वैसा करने में ही आपकी भलाई है। जो भी फैसला लें, शांत व ठंडे दिमाग से लें। अपने मित्रों व साथी की मदद लें।यदि रोने को चाहे तो रो लें पर यह न सोचें कि अपने एक शिशु को पाने के लिए दूसरे को बलिदान किया है। धर्म व आध्यात्म का सहारा लें। यदि चाहें तो दूसरों को बताएँ, यदि न चाहें तो अपने तक ही सीमित रखें।
दोबारा कोशिश करना
ऐसे सदमे के बाद दोबारा गर्भवती होने का फैसला करना आसान नहीं होता। यह व्यक्तिगत फैसला काफी तकलीफदेह भी हो सकता है
क्यों?
इस सवाल का हमेशा कोई जवाब नहीं होता लेकिन आपको नवजात की मृत्यु का असली कारण पता लगाना ही होगा। शिशु की पूरी जांच व गर्भावस्था हिस्ट्री से ही पता लगाया जा सकता है कि ऐसा क्यों हुआ। यदि शिशु भ्रूण में ही मर जाए या स्टिलबर्थ हो तो किसी अच्छे पैथेलॉजिस्ट विशेषज्ञ द्वारा प्लेसेंटा की जांच होनी चाहिए।इस तरह आप अपनी भावी गर्भावस्था को सुरक्षित बना पाएँगी।
इस प्रक्रिया के लिए तैयार होने पर स्वयं को बधाई दें क्योंकि ऐसा फैसला लेने के लिए काफी साहस चाहिए। सही समय वही है, जो आपको सही लगे।आपको भावनात्मक रूप से तैयार होने में थोड़ा या फिर अधिक समय लग सकता है। अपने दिल की सुनें। किसी के कहने में न आएँ व पूरी तरह तैयार होने पर ही गर्भधारण करें। अपने डॉक्टर से पूछें कि क्या आप शारीरिक रूप से माँ बनने के लिए स्वस्थ हैं। यदि आप तैयार नहीं हैं तो गर्भ धारण के लिए शारीरिक रूप से फिट हों। 
हो सकता है कि यह गर्भावस्था पहले से कहीं अधिक चिंता व तनाव लाए क्योंकि आपको पता है कि हर गर्भावस्था का अंत सुखद नहीं होता। आपके मन में अनहोनी का डर समाया है। आप नए शिशु को खुलकर अपनाने से भी डरेंगी। आपको शरीर के हर छोटे-बड़े बदलाव से चिंता होगी जो कि स्वभाविक ही है। बस इतना ध्यान रहे कि इन भावनाओं की वजह से शिशु के पोषक में कमी न आए। पिछली घटना की ओर मुड़कर देखने की बजाए आने वाले शिशु पर ध्यान केंद्रित करें व याद रखें कि गर्भावस्था में एक शिशु की मृत्यु के बावजूद अधिकतर माँएं स्वस्थ शिशुओं को जन्म देती हैं। व उनकी गर्भावस्था भी पूरी तरह सामान्य होती है।

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