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बच्चे के विकास के लिए अपनाएं स्पिरिचुअल पैरेंटिंग

संविदा मिश्रा

28th September 2019

कहा जाता है कि बच्चे का मन बहुत कोमल होता है और उसे बचपन से ही किसी भी रंग में ढाला जा सकता है। ऐसा ज़रूरी नहीं है कि बच्चा हर क्षेत्र में कामयाबी की बुलंदियों को छू सके लेकिन ये आवश्यक है कि वो एक अच्छा इंसान बन सके। यह बात अक्षरशः सत्य है कि जब बच्चा एक अच्छा इंसान बनेगा तब उसे कामयाब होने से कोई रोक नहीं सकता है।

बच्चे के विकास के लिए अपनाएं स्पिरिचुअल पैरेंटिंग
ऐसा माना जाता है कि अच्छा इंसान हर जगह अपनी एक विशेष जगह बना लेता है। बच्चों का सम्पूर्ण विकास करने के लिए स्पिरिचुअल पैरेंटिंग एक बेहतर तरीका है। स्पिरिचुअल पेरेंटिंग के जरिए आप बच्चे को अच्छा और कामयाब इंसान बना सकते हैं। 

गर्भावस्था  से करें शुरुआत 

कहा जाता है कि बच्चा बहुत सी चीज़ें मां के गर्भ में ही सीख लेता है। इसलिए बच्चे को गर्भ से बाहर  आने से पहले ही बहुत सी अच्छी बातें सिखा  देनी चाहिए। गर्भवती महिला यदि अच्छी किताबें पढ़ती है ,उसके आस-पास का वातावरण अच्छा होता है या फिर मन में अच्छे विचारों का निर्माण करती है तो गर्भ में ही बच्चे को अच्छे संस्कार मिलने शुरू हो जाते हैं। 

स्वयं को बदलें 

बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए पैरेंट्स को स्वयं को बदलना अति आवश्यक है। बच्चों को अच्छे संस्कार देने के लिए अपनी बुरी आदतों को बदलें क्योंकि बच्चे के कोमल मन पर सबसे ज्यादा असर उस बात का पड़ता है जो वह अपने माता -पिता को करते हुए देखता है। 

व्यवहार में हो प्यार

आमतौर पर देखा गया है कि बच्चा जब किसी चीज़ की जिद करता है या फिर कोई बात नहीं मानता है तब पैरेंट्स उस पर गुस्सा दिखाते  हैं या फिर उसको डांटते या मारते हैं  जिसका बच्चे के मानस पटल पर गलत असर होता है। पैरेंट्स को चाहिए कि बच्चे को थोड़ा प्यार से समझाने की कोशिश करें । 

बच्चे को कहें ना 

प्यार का मतलब ये कदापि नहीं होता है कि आप बच्चे की हर छोटी -बड़ी मांग को पूरा करें भले ही आप उसको पूरा कर पाने में समर्थ न हों। बच्चे के रोने और चिल्लाने से कभी भी उसकी नाजायज मांगें पूरी न करें और उसे उस चीज़ के लिए मना  करें।  यदि हम बच्चे के रोने के डर से उसकी सारी  मांगें पूरी करने लगते हैं तो उसमे अनुशाशन की आदत कभी नहीं पड़  सकती है।

निर्णय लेना सिखाएं

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि बच्चे को अच्छे बुरे या सही गलत में फर्क करना नहीं आता है। लेकिन कभी-कभी बच्चे को निर्णय लेने के लिए फ्री छोड़ देना चाहिए। शुरुआत छोटे निर्णयों से करें जैसे उसके दोस्तों का चुनाव , छुट्टी के दिन की प्लानिंग , किसी एक्स्ट्रा करीकुलर एक्टिविटी का चुनाव आदि। जब बच्चा ऐसे छोटे निर्ण लेने में सक्षम हो जाएगा तभी वो आगे चलकर जीवन के बड़े निर्णय ले पाएगा।  

 

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