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कहां से आई दिवाली पर ताश खेलने की परम्परा

यशोधरा वीरोदय

10th October 2019

हर प्रचलित परम्परा या रीति-रिवाज के पीछे कोई पौराणिक या धार्मिक मान्यताएं होती हैं, दिवाली की रात जुए खेलने की रिवाज के पीछे भी ऐसी ही एक पौराणिक मान्यता प्रचलित है।

कहां से आई दिवाली पर ताश खेलने की परम्परा
दिवाली यानी कि रौशनी का त्यौहार, जब दुनिया अंधकार पर प्रकाश की विजय और असत्य पर सत्य की जीत का जश्न मनाती है। ऐसे में देखा जाए तो ये त्यौहार पूणर्तया व्यवहारिक और प्रांसगिक है, वहीं इसके पौराणिक मान्यता की बात करें तो पांच दिन तक चलने वाले इस महापर्व में देवी देवताओं के पूजन के साथ कई सारी प्राचीन मान्यताएं और लोक परम्पराओ  भी जुड़ी हुई हैं। दिवाली पर ताश खेलने का रिवाज भी ऐसी ही एक पुरानी और प्रचलित परम्परा है, जो कि सदियों से चली आ रही है। बहुत सारे लोग इस परम्परा का अनुसरण करते हुए हर दिवाली पर ताश जरूर खेलते हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम ही लोग हैं, जिन्हें इस परम्परा के पीछे की मान्यताओं के बारे में पता है। चलिए दिवाली की रात ताश खेलने की इस रिवाज के पीछे की असल मान्यता के बारे में जानते हैं।

ये है पौराणिक मान्यता

दरअसल, हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, दिवाली की पूरी रात भगवान शिव और माता पार्वती ने साथ में  ताश खेला था, जिससे दोनों के बीच स्नेह और प्रेम का संचार हुआ। ऐसे में इस लोककथा के साथ ही ये मान्यता प्रचलित हो गई कि जो व्यक्ति दिवाली की रात ताश खेलेगा, वो उसे धन और सौभाग्य की प्राप्ति होगी और फिर लोग शगुन के तौर पर दिवाली की रात ताश खेलने लगें। माना जाता है कि इस रात ताश खेलने और उसमें जीत हासिल करने वाले व्यक्ति को जीवन में धन-धान्य की प्राप्ति होती है। लोग आज भी इस लोक परम्परा का पालन करते हैं। यहां तक कि मॉडर्न फैमिली में ये चलन नए ट्रेंड के रूप में शामिल हो चुका है। अब तो लोग दिवाली की रात खासतौर पर ताश पार्टी का आयोजन करते हैं,जिसमें परिवार और दोस्‍तों के साथ मिलकर खेलते हैं। अगर आप भी इस दिवाली ताश की बाजी खेलना चाहते हैं तो बेशक खेलिए, लेकिन इतना ध्यान रखिए कि दिवाली की रात ताश सिर्फ सांकेतिक तौर पर या शगुन के लिए खेला जाना चाहिए, क्योंकि जुए की लत किसी भी रूप में सही नहीं हैं। क्योंकि शौकिया शुरू किया गया किसी काम को लत बनते देर नहीं लगती। 

शगुन ना बन जाएं शौक

दरअसल, ऐसा देखा गया है कि लोग दिवाली की रात जब शगुन के तौर पर जुआ खेलते हैं और अगर उन्हें उसमें हार का सामना करना पड़ता है, तो वो फिर उस हारी हुई रकम को हासिल करने आगे भी जुआ खेलते हैं, जिससे उनमें धीरे-धीरे जुए की लत लग जाती है। वहीं अगर दिवाली की रात खेले गए जुए में अगर जीत भी हासिल होती है, तो उससे प्रोत्साहित होकर उनमें जुए की प्रति लालसा जागती है और इस तरह उन्हें जुए की लत लग जाती है।ऐसे में किसी भी परम्परा और रीति-रिवाजों का पालन भी पूरे विवेक और समझदारी के साथ करने में ही भलाई है। क्योंकि जहां पौराणिक मान्यताओं में दिवाली की रात भगवान शिव और पार्वती के बीच जुए खेलने का प्रसंग मिलता है, वहीं महाभारत जैसे धार्मिक ग्रन्थ में जुए के चलते पाण्डवों के वनवास और द्रौपदी के चीरहरण प्रकरण का भी वर्णन मिलता है। इसलिए अगर आप इस दिवाली शगुन के तौर पर जुआ या ताश खेलने जा रहे हैं। तो इससे होने वाले नुकसान के प्रति भी सचेत रहे हैं। 
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