चमत्कार को नमस्कार

Neeraj Gupta

16th May 2020

इस विषय पर अपनी बात प्रारम्भ करने से पहले हम स्पष्ट कर देना चाहेंगें कि हमारा उद्देश्य न तो किसी की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना हैं और न हीं किसी पर अनावश्यक दोषारोपण करना ! हम तो मात्र आपके सामने कुछ तथ्य रखना चाहते हैं, जिससे चमत्कार सम्बन्धी बातों पर भरोसा करने से पहले आप उनको अच्छे से परख लें ताकि नीहित स्वार्थी तत्वों द्वारा ठगे जाने की संभावना न रहे I

चमत्कार को नमस्कार

चमत्कार है क्या ?

यह चर्चा प्रारंभ करने से पहले आवश्यक है हम जान लें कि 'चमत्कार' है क्या ? वस्तुतः जब हमारे सामने कोई ऐसी घटना घटती है जो विज्ञान के ज्ञात नियमों के अनुसार या कोई कार्य करने वाले की क्षमता को दृष्टिगत रखते हुए संभव प्रतीत न हो, तो उसे चमत्कार की श्रेणी में रखा जाता है . उदाहरण के लिए, पानी का वेग ऊँचाई की ओर होना विज्ञान-सम्मत नहीं है, अतः विश्व में गिने-चुने स्थानों पर जहां भी ऐसा देखा जाता है, उसे प्राकृतिक चमत्कार कहा जाता है . इसी प्रकार पानी पर चलना या हवा में उड़ना मनुष्य के लिए संभव नहीं है . अतः यदि कोई व्यक्ति ऐसा करके दिखाये तो उसे चमत्कार कहेंगें . परन्तु उल्लेखनीय है कि किसी कार्य को चमत्कार की श्रेणी में रखना या न रखना देखने वाले की जानकारी के स्तर पर भी निर्भर करता है . उदाहरण के लिए, किसी आदिवासी इलाके में जहां किसी ने माचिस न देखी हो, उससे अग्नि प्रज्ज्वलित होती देखकर लोग चमत्कार मान लेंगें, परन्तु किसी शहर-कस्बे में ऐसा नहीं होगा .  

असली चमत्कार ईश्वरीय व्यवस्था

ईश्वर ने जिस प्रकृति की रचना की है, उसके अज्ञात ही नहीं, ज्ञात वैज्ञानिक नियम भी किसी चमत्कार से कम नहीं हैं . ज़रा सोचिये, अनंत ब्रह्माण्ड में स्थित अनगिनत आकाश-गंगाएं, उनमें असंख्य ग्रह, उपग्रह, तारे, सबका अपनी धुरी पर घूमते हुए अपनी-अपनी निर्धारित कक्षाओं में बिना एक दूसरे से टकराए विचरण करते रहना, निश्चित समय पर दिन निकलना व रात होना, सर्दी-गर्मी-बरसात का क्रम से आना-जाना, जीवों का पैदा होना, फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाना, एक छोटे से बीज में विशाल वट-वृक्ष का अस्तित्व समाया होना, परदादा के स्वभाव के विशिष्ट गुण हुबहू परपोते में आ जाना, आदि भला किस चमत्कार से कम हैं ? तभी तो ऐसे चमत्कारी उस सृष्टि रचयिता को हम बारम्बार प्रणाम करते हैं !

क्या मनुष्य के लिए चमत्कार करना संभव है ?

लगभग सभी धर्मग्रंथों में वर्णन किया गया है कि निर्दिष्ट आध्यात्मिक मार्ग पर चलकर मनुष्य अतीन्द्रिय शक्तियां प्राप्त कर सकता है . कठिन तपस्या व सतत अभ्यास के द्वारा ऐसी आठ सिद्धियां (अष्ट-सिद्धि) प्राप्त कई विभूतियों का वर्णन हिन्दू धर्म-ग्रंथों में मिल जाता है (पवनपुत्र आंजनेय महाबली हनुमान उनमें से एक हैं) . साथ ही ऐसे कई पौराणिक प्रसंग भी आते हैं, जिनमें ऐसी किसी सिद्धि पाने वाले व्यक्ति द्वारा अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन का निषेध किया गया है . एक कथा में बताया गया कि एक साधू ने तपस्या करके पानी पर चलने की सिद्धि प्राप्त की और खुशी-खुशी यह समाचार देने के लिए पैदल नदी पार कर अपने गुरु के पास पहुंचे . गुरु ने पूछा कि यदि तुम पानी पर न चलकर नाव में बैठकर आते तो क्या होता, इसपर साधू ने कहा कि तब मुझे नाव के किराए के रूप में एक रुपया खर्च करना पड़ता . तब गुरु ने कहा कि जो कार्य तुम एक रूपया देकर कर सकते थे, उसके लिए तुमने अपनी अलौकिक शक्ति का प्रयोग किया . अतः इसका अर्थ यह हुआ कि तुम्हारी सिद्धि का मूल्य एक रूपया है, क्योंकि जिस कार्य के लिए तुम अपनी शक्ति का प्रयोग करोगे, उसके अनुसार ही उसका मूल्य भी आंका जाएगा .

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि किसी सिद्ध पुरुष के पास वास्तव में कोई अलौकिक शक्ति होगी तो वे उसका प्रयोग स्वयं अपने आध्यात्मिक उत्थान व जन-कल्याण के लिए करेंगें न कि तमाशा दिखाने या भौतिक लाभ उठाने के लिए ! अतः इस लेख में हम सच्चे सिद्ध पुरुषों से इतर उन कलयुगी बाबाओं के विषय में बात करेंगें जो तथाकथित अलौकिक शक्तियों के नाम पर भोले-भाले लोगों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं .

विज्ञान के सहारे चमत्कार

विरोधाभास देखिये कि जो विज्ञान बिना तर्क किसी तथ्य को स्वीकार नहीं करता, अधिकतर चमत्कार दिखाने वाले लोग उसी विज्ञान के उन नियमों का प्रयोग करते हैं, जिनके बारे में जन-सामान्य को कोई जानकारी नहीं होती और फिर सबके सामने उसे इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो वह सबकुछ उन्होंने अपनी मायावी शक्तियों से किया हो . उदहारण के लिए कई बाबा किसी के सामने साबुत नींबू को चाकू से काटकर निचोड़ते हैं और उसमें से लाल रंग का तरल पदार्थ निकलता दिखाकर, उस व्यक्ति को भयभीत करने के लिए शोर मचा देते हैं कि देखो इससे खून निकल रहा है . परन्तु वास्तव में वे चाकू पर खाने वाला सोडा लगाकर रख लेते हैं, जो नींबू काटते समय उसके रस के संपर्क में आ जाता है . यहाँ वे रसायन-शास्त्र के उस नियम का लाभ उठाते हैं, जिसके अनुसार क्षार (alkal.) व अम्ल (ac.d) साथ मिलकर लाल रंग का निर्माण करते हैं . अतः खाने वाला सोडा (जो क्षार होता है), नींबू के रस (जो अम्ल होता है) के साथ मिलकर लाल हो जाता है, जिसे वे खून कहकर देखने वालों को डरा देते हैं .

इसी प्रकार किसी की मुट्ठी में एक धातु का सिक्का देकर कहा जाता है कि यदि उसके ऊपर कोई संकट आया होगा तो यह सिक्का अपने आप गर्म हो जाएगा या उससे भभूत झड़ने लगेगी . इसके लिए भी दो अलग-अलग तरह के रसायनों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें से पहला किसी धातु के संपर्क में आने के कुछ देर बाद गर्मी पैदा करना प्रारंभ करता है, जबकि दूसरा उसे धीरे-धीरे राख में बदल देता है . ऐसे में पहले से विपदा में फंसे लोग इनपर भरोसा कर आसान शिकार बन जाते हैं . अतः ऐसे चमत्कारों से प्रभावित न हों, क्योंकि यदि ये बाबा इतने ही शक्तिशाली होते तो चंद रुपयों के लालच में यूँ आपको भरमाने की कोशिश में दिन-रात एक न करते !

चमत्कार और हाथ की सफाई

आपने बहुत से बाबाओं को बंद मुट्ठी से भभूत पैदाकर भक्तों को बांटते या फिर हवा में हाथ हिलाकर उनकी पसंद की मिठाईयाँ प्रस्तुत कर उन्हें हतप्रभ करते देखा होगा . परन्तु यदि कोई भक्त किसी ऐसी मिठाई का नाम ले दे जो बाबा के झोले में पहले से उपलब्ध न हो, तो बाबाजी बड़े प्यार से उस मिठाई से भक्त को कोई रोग होने की संभावना बताकर झोले में उपलब्ध कोई दूसरी मिठाई देकर संतुष्ट भी कर देंगें और कृतार्थ भी कि बाबाजी उसके स्वस्थ्य का कितना ख्याल रखते हैं !

वास्तव में उक्त सभी कार्य ‘हाथ की सफाई' की श्रेणी में आते हैं, जो आजकल जादू के बड़े-बड़े कार्यक्रमों में टिकट बेचकर और पहले जमाने में गली-मौहल्लों में तमाशा दिखाने के बाद झोली फैलाकर खुशी से कुछ देने की प्रार्थना करने वाले मदारी व बाजीगर खूब दिखाते थे . इसमें सम्बंधित कार्य गुप्त उपकरणों की सहायता से इतनी शीघ्रता-पूर्वक किया जाता है कि देखने वाला भ्रम में पड़ जाए . परन्तु इनमें और उक्त बाबाओं में केवल एक अंतर होता है और वो यह कि जादूगर, मदारी या बाजीगर अपनी कला से दर्शकों को मंत्र-मुग्ध करने के साथ ही स्पष्ट रूप से उन्हें बता देते हैं कि जो कुछ भी उन्होंने देखा, वह सत्य नहीं था, बल्कि उसे हाथ की सफाई अथवा दृष्टि-भ्रम कह सकते हैं . जबकि उन्ही ट्रिकों को दिखाकर कुछ बाबा इसे चमत्कारिक शक्तियों का परिणाम बताकर तो कुछ इससे भी आगे बढ़कर स्वयं को साक्षात ईश्वर का अवतार घोषित कर अंधभक्तों से अपनी पूजा तक करवाने लगते हैं . परन्तु अफ़सोस कि जहां सच बोलकर करतब दिखाने वाले बाजीगर को हम लोग 10-20 रुपये देने में भी झिझकते हैं, वहीं फरेब का जाल फैलाकर वैसे ही करतब दिखाने वाले बाबाओं पर सबकुछ न्योछावर करने को तैयार हो जाते हैं .

सम्मोहिनी विद्या का प्रयोग

सम्मोहन एक प्राचीन विद्या है, जिसे आधुनिक विज्ञान भी मान्यता देता है . इसमें कर्ता द्वारा लक्षित व्यक्ति या समूह के मस्तिष्क को इस सीमा तक प्रभावित कर लिया जाता है कि उसकी सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है और वह सम्मोहन-कर्ता के आदेशों का पालन करने को विवश हो जाता है . इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते हैं, जिनमें भड़कीली पोशाकों, आकर्षक लाइटों तथा रहस्यात्मक आवाजों आदि के मिले-जुले प्रभाव से वातावरण को लक्ष्य का ध्यान भटकाने के अनुकूल बनाना सम्मिलित है . परन्तु जहां प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक इसका प्रयोग मानसिक रूप से विचलित रोगियों को ठीक करने के लिए करते हैं, वहीं ये शातिर बाबा आम जनता को लूटने के लिए . सामान्यतः सम्मोहन का प्रभाव अस्थायी होता है, परन्तु जब भक्त लोग इन बाबाओं पर आँख-मूँद कर भरोसा करने लगते हैं तो उनकों सम्मोहन से मुक्त कर पाना बड़ा कठिन होता है, जो अक्सर तभी टूटता है जब उनका सब कुछ लुट चुका होता है .

बाबाओं का इंद्रजाल

ये बाबा पढ़े-लिखे लोगों को भी कभी अपनी मीठी-मीठी बातों से, तो कभी कोई चमत्कार (हाथ की सफाई) दिखाकर इतना प्रभावित कर लेते हैं कि वे स्वयं उनके सामने समर्पण कर देने के साथ-साथ अपने घर की महिलाओं तक को, न केवल इनसे अकेले में मिलने का अवसर दे देते हैं, बल्कि इनके आश्रमों में रहने के लिए भी भेज देते हैं, जहां एकबार जाकर वापस आना लगभग असंभव होता है . इनमें से कई बाबा जब TV पर बैठकर उलजलूल बाते करते हैं, तो एकबार को विश्वास ही नहीं होता कि कोई ज़रा सी समझ रखने वाला व्यक्ति, इनसे बात करना भी पसंद करेगा ! परन्तु उनकी सभा में सैंकड़ो सभ्रांत  लोगों को हाथ जोड़े खड़े देखकर आप सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं कि ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे !

इसका परिणाम क्या होता है, ये पिछले कुछ वर्षों से कई प्रसिद्ध बाबाओं की कारगुजारियां जोर-शोर से बयां कर रही हैं . परन्तु अफ़सोस कि आज भी जब एक के बाद एक ऐसे बाबा अनेकों युवतियों का यौन-उत्पीड़न कर या बहुत से भक्तों का धन इकट्ठा कर भाग रहें हैं, फिर भी बाकी बचे और नए बने बाबाओं पर भरोसा करने वालों की संख्या में कमी नहीं आती, क्योंकि इनसे प्रभावित हर व्यक्ति यही समझता है कि ये तो दूसरे बाबा हैं जो ऐसे घ्रणित कार्य करते हैं, उनके बाबा तो बिलकुल सच्चे हैं, वे कोई गलत कार्य कर ही नहीं सकते . परन्तु कुछ समय बाद यही लोग अपने उसी बाबा, जिसको ये लोग ईश्वर से भी ऊँचा दर्जा देते थकते नहीं थे, के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखा रहे होते हैं, जबकि अन्य लोग किसी दूसरे बाबा को ऐसे अवसर उपलब्ध कराने में जी-जान से जुटे होते हैं .   

अतः हम पाठकों को यही सन्देश देना चाहेंगें कि वे समय रहते चेत जाएँ और ऐसे बाबाओं के चक्कर में आकर व्यर्थ के झंझटों में न फंसे . शायद उन्हें मालूम हो कि कुछ दिन पहले एक प्रसिद्ध बाबा, जो आजकल लम्बी जेल-यात्रा पर गए हुए हैं, की वायरल बातचीत में उन्हें कहते सुना गया था कि जब जानते-बूझते लोग मूर्ख बनने के लिए खुद हमारे पास आते हैं, तो हम उन्हें लूटें न तो क्या करें ?

 

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