अथ देवी कवच

गृहलक्ष्मी टीम

21st October 2020

ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है। र्कण्डेयजी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइए॥1॥

अथ देवी कवच

ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मन्! ऐसा साधन जो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा संपूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो।।2।।

देवी की नौ मूर्तियों के नाम इस प्रकार हैं, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघंटा,चौथी कूष्माण्डा, पांचवीं स्कन्दमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि और आठवीं महागौरी व नौवीं सिद्धिदात्री।।3-5। जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फंस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में पहुंच जाए तो उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता। युद्ध के समय संकट में पढ़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं आती। उन्हें शोक, दुरव और भय की प्राप्ति नहीं होत॥6-7॥

जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करती हो॥9॥

चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। एन्ट्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड पर ही आसन जमाती हैं।।9। माहेश्वरी वषभ पर आरूढ होती हैं। कौमारी क मयूर है। भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किए हुए हैं॥10॥

वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं॥11॥

इस प्रकार ये सभी माताएं सब प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत सी देवियां हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सशोभित हैं॥12॥

ये संपूर्ण देवियां क्रोध से भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी दिरवाई देती हैं। ये शरव, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, रवटक और तोमर, परशु और पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शाहुंगधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना-यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है।।1315।। (कवच आरंभ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए-) महान रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवि! तुम महान भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है।।16।। तुम्हारी ओर देरवना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्र शक्ति) मेरी रक्षा करें। अग्निकोण में अग्निशक्ति, दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैऋर्त्य कोण में रवड्गधारिणी मेरी रक्षा करें। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्य कोण में मग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करें।।17-18।।

उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करें। ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से  मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें।19॥ इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चाणुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें। जया आगे से विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करें।।20।। वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करें।

उद्योतिनी शिरवा की रक्षा करें। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करें।21॥ ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे।।22॥ दोनों नेत्रों के मध्यम भाग में शगिनी और कानों में द्वारवानिी रक्षा करें। कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूल भाग की रक्षा करें।।23॥ नासिका में सुगन्धा और ऊपर के आठ में चचिका देवी रक्षा करें। नीचे के ओठ मे अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करें।।2॥

कौमारी दांतों की ओर चण्डिका कंठ प्रदेश की रक्षा करें। चित्रघंटा गले की घांटी की ओर महामाया ताल में रहकर रक्षा करें।25॥ कामाक्षी ठोडी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करें। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश-(मेरुदण्ड-) में रहकर रक्षा करें।।26॥ कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में वगिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें।।27॥ दोनों हाथों में दण्डिनी और उंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नरवों की रक्षा करें। कुलेश्वरी कुक्षि-(पेट) में रहकर रक्षा करें।।28॥

महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करें। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करें।2977 नाभि में कामिनी और गुह्य भाग की गुह्येश्वरी रक्षा करें। पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें।।30॥

भगवती काट भाग में विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें। संपूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करें।।31॥ नारसिंही दोनी घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठ भाग की रक्षा करें। श्रीदेवी पैरों की उंगलयों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करें।।32॥ अपनी दाढ़ों के कारण भयंकर दिरवायी देने वाली दष्ट्र कराली देवी नरवों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करें। रोमावालियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करें।।3॥ पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करें। आंतों की कालरात्रि और पित्त की मुकेश्वरी रक्षा करें ।।34॥ मूलाधार आदि कमल कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूड़ामणि देवी स्थित होकर रक्षा करें। नरव के तेज की ज्वालामुरवी रक्षा करें। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्य देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करें।।35॥

ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करे। छत्रेश्वरी छाया, की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बद्धि की रक्षा करें।।366।। हाथ में वज धारण करने वाली वजहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करें। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करें।।37॥ रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे।।38॥ वाराही आयु की रक्षा करें। वैष्णवी धर्म की रक्षा करें तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करें।।39।। इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करें और भैरवी पत्नी की रक्षा करें।।40॥ मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करें। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी संपूर्ण भयों से मेरी रक्षा करें।41॥

देवी! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हों, क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो।।42॥ यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाए, कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहां-जहां भी जाता है, वहां-वहां उसे धन-लाभ होता है तथा संपूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्त का चिन्तन करता है, उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान ऐश्वर्य का भागी होता है॥43-44॥ कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है।45॥ देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे देवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं वह अपमृत्यु से रहित हो, सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है।46-47॥ मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी संपूर्ण व्याधियां नष्ट हो जाती हैं। कनेर, भांग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, सांप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जरम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष-ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई असर नहीं होता।।49॥ इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मन्त्र-यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। यही नहीं, पृथ्वी पर विचरने वाले ग्राम देवता, आकाशचारी देव विशेष, जल के संबंध से प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्न कोटि के देवता, अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनिया, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस,ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय मे कवच धारण किए रहने पर उस मनुष्य को देरवते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान बुद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है॥41-42॥ कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और कानों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहां पुत्र-पौत्र आदि संतान परंपरा बनी रहती है॥43-44॥ फिर देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है॥45॥ वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता है और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है।।।46॥

 

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