व्रतों से आरोग्य की प्राप्ति

कुमोदकर कुमार

26th December 2020

व्रत-उपवास से व्यक्ति न केवल आध्यात्मिक शांति व ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है, अपितु निरोगी काया भी पा सकता है। क्या संबंध है व्रतों का आरोग्य से, जानने के लिए पढ़ें यह लेख।

व्रतों से आरोग्य की प्राप्ति
यदि आज हम भारतीय समाज की ओर दृष्टि डालें तो एक बात स्पष्ट रूप से दिखायी देती है कि हमारा समाज पाश्चात्य संस्कृति से इतना प्रभावित हो गया है, इतना ग्रस्त हो गया है कि वह अपनी स्वयं की पहचान ही भूल गया है। वह अपने धार्मिक व्रतों को हेय दृष्टि से निहारता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसे लोगों को इन्हें आचरण में लाने की सलाह देने का प्रयास करता है तो वे उल्टा प्रश्न करते हैं, कहते हैं कि धार्मिक व्रतों के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार या सिद्धांत है क्या? इनके पालन से कोई लाभ है क्या? ऐसे न जाने कितने प्रश्नों की बौछार करके वे स्वयं तो भ्रमित रहते ही हैं, दुर्बल आस्था वालों को डिगा भी देते हैं।
आजकल की छोटी-छोटी बस्तियों, कस्बों, गांवों, शहरों और बड़े-बड़े नगरों में निवास करने वालों की ओर निगाह डालें तो परिणाम अपने-आप सामने आता है। जरा-सी छींक आने, थोड़ा-सा ज्वर होने तथा सर्दी-खांसी से पीड़ित होने पर लोग डॉक्टर की शरण में जाते हैं। तुरंत मूत्र तथा रक्त आदि की जांच कराने की सलाह मिलती है और रिपोर्ट देखकर चिकित्सक इलाज करते हैं। बड़े-बड़े शहरों-नगरों में नर्सिंग होम और विशालकाय हॉस्पिटलों की श्रंृखलाएं फैल रही हैं। आज के युग में कैंसर, ब्लड प्रेशर, मधुमेह, गठिया आदि रोगों से अधिकांश व्यक्ति पीड़ित हैं। कुछ रोग तो ऐसे हैं जो धन के साथ-साथ शरीर का भी नाश कर डालते हैं।
व्रतों का महत्त्व
सौ-दो-सौ वर्षों के इतिहास का ही सिंहावलोकन करें तो आज की तुलना में तत्कालीन भारतीय समाज अधिक स्वस्थ व निरोग था। आज के जैसे भयंकर रोग कोसों दूर थे। सामान्य रोगों का आक्रमण नहीं होता था ऐसी बात नहीं, परंतु वे लोग धर्मशास्त्र के अनुसार आचरण करके स्वस्थ तथा निरोग रहने का प्रयास अवश्य करते थे और उन्हें सफलता भी मिलती थी।
हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव किस प्रकार स्वस्थ जीवन व्यतीत करें, इसकी खोज करके वैज्ञानिक एवं आयुर्वेद के आधार पर धार्मिक व्रतों का अनुपालन करने का उपाय प्रस्तुत किया। इन व्रतों के पालन से अनेक सामान्य रोगों से मानव मुक्ति प्राप्त करके स्वस्थ जीवन का अनुभव करते-करते मानसिक तनाव से छुटकारा पाकर भगवत्प्राप्ति का सहज-सुलभ साधन भी प्राप्त कर सकता है। ऐसा विश्वास व्यक्त किया गया है।
भारत में व्रतों की परंपरा
भारत वर्ष में नव-वर्षारम्भ से अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से संवत्सरपर्यन्त सभी तिथियों में व्रतों का विधान है। मास व्रत, वार व्रत, तिथि व्रत, नक्षत्र व्रत आदि तो प्रसिद्ध ही हैं। सभी व्रत करने संभव तो नहीं हैं तथापि प्रत्येक मास में कम-से-कम एक या दो व्रतों का पालन अवश्य करना चाहिए।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात् नववर्षारम्भ को मुख-मार्जन स्नानादि से निवृत्त होने के उपरान्त सर्वप्रथम कड़वे नीम के पत्तों का सेवन करने का विधान है। प्रतिदिन प्रात:काल कड़वे नीम के पत्तों का सेवन करने से रक्त शुद्ध होकर अनेक चर्म-रोगों से मुक्ति मिलती है।
इन्हीं दिनों श्रीरामनवमी तक चैत्र नवरात्र-उत्सव का शुभारम्भ होता है। अनेक स्त्री-पुरुष इसमें उपवास रखकर भगवान श्रीराम और भवानी माता की उपासना करके दीर्घ शांति और सुख प्राप्त करने की कामना करते हैं।
बैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में अक्षय-तृतीया एक अत्यन्त शुभ मुहूर्त है। इस पवित्र तिथि को उपवासपूर्वक जल से भरा हुआ मृत्तिका-कुंभ, फल-पंखा तथा दक्षिणा सहित दान करने का विधान है। इसी तिथि से प्रतिदिन मिट्टी के घड़े में भरा हुआ जल पीना प्रारंभ करना आरोग्यदायी माना जाता है। मिट्टी के सम्पर्क से जल शुद्ध होता है। पंच तत्त्वों में से ये दो तत्त्व जल और पृथ्वी शरीर के लिए पोषक बनते हैं। सर्दी के दिनों में बना हुआ तथा अग्नि संपर्क से पका हुआ मिट्टी का घड़ा अधिक उपयोगी माना गया है। फ्रिज में रखे हुए जल की अपेक्षा मटके का पानी अधिक लाभकारी है।
श्रीपुरुषसूक्त में एक ऋचा है- चन्द्रमा मनसो जात: अर्थात् परमब्रह्मï परमात्मा मन से चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई है। चन्द्रमा शीतल है। कहते हैं कि चन्द्र-किरणों से अमृत की वर्षा होती है। मानव की सम्पूर्ण क्रिया मन से ही होती है। चन्द्रमा और भगवान श्रीगणेश का अद्वितीय संबंध है। इसी दृष्टि से मन की शांति-हेतु और बुद्धि प्राप्ति-हेतु श्रीगणेश चतुर्थी का उपवास फलदायी होता है। प्रत्येक मास में दो चतुर्थी आती हैं। अधिकांश लोग कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का व्रत करते हैं। दिनभर उपवास रखकर शाम को भगवान श्रीगणेश का पूजन करके चन्द्रोदय के पश्चात् चन्द्र का दर्शनकर भोजन करना उपयुक्त है। भगवान श्रीगणेश को तिल-गुड़ का नैवेद्य या मोदक अधिक प्रिय है। चन्द्रोदय के पश्चात् भोजन करने से अन्न में उत्पन्न चन्द्रमा का अमृत एवं उसकी शीतलता मन को शांति प्रदान करती है।
धार्मिक व्रतों में एकादशी, प्रदोष और शिवरात्रि, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, श्रीराम नवमी आदि का बड़ा महत्त्व है। वर्षभर में चौबीस एकादशियां आती हैं। इनमें विष्णुशयनी, प्रबोधिनी एकादशी तथा महाशिवरात्रि व्रत का अपने आप में बड़ा महत्त्व है।
चातुर्मास का महत्त्व
यद्यपि साल भर धार्मिक व्रतों का अपार भंडार है तथापि चातुर्मास व्रतों के पालन का आरोग्य प्राप्ति की दृष्टि से अनोखा एवं अद्वितीय महत्त्व माना गया है। यदि हम चातुर्मास में धार्मिक व्रतों का सही-सही पालन करें तो आरोग्य प्राप्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक शांति भी प्राप्त कर सकेंगे। चातुर्मास में वात-पित्त-प्रकोपक साग-सब्जियों का त्याग करना श्रेयस्कर होता है। साथ ही एक समय हल्का भोजन करना चाहिए। एक कहावत है- वैद्यानां शारदी माता पिता च कुसुमाकर:। अर्थात् चिकित्सकों के लिए शरद-ऋतु लाभकारी है। यह एक माता की भांति वैद्य लोगों की परवरिश करती है तो वसन्त ऋतु एक पिता की तरह उनका पालन-पोषण करता है। दोनों ऋतुएं अपना प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर डालती हैं। अधिकांश व्यक्ति इन दो ऋतुओं के आगमन के साथ-साथ ज्वर, मलेरिया, पीलिया आदि रोगों से पीड़ित होते हैं। इन रोगों से बचने का घरेलू सामान्य उपाय धार्मिक व्रतों का पालन (आचरण) कर अपने खान-पान पर ध्यान देते हुए ईश्वर की आराधना करना है, इससे शरीर निरोग तो रहता ही है, आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त होता है। वर्षा-ऋतु में अनेक सब्जियां सड़ती हैं, उनमें कीड़े प्रवेश करते हैं, तालाब आदि का जल दूषित हो जाता है। मच्छर, विभिन्न प्रकार के कीड़े-कीट वर्षा-ऋतु और शरद ऋतु में पैदा होते हैं। इन कीड़ों-मकोड़ों से रोग-मुक्ति के लिए धार्मिक व्रतों का विशेष रूप से आयोजन होता है। आरोग्य की दृष्टि से कम-से-कम एक दिन उपवास करके उस दिन से संबंधित देवता की आराधना-पूजा-अर्चना करना पुण्यदायक है। सोमवार भगवान शंकर के लिए, गुरुवार भगवान दत्तात्रेय-हेतु, शुक्रवार या मंगलवार माता भवानी के हेतु, शनिवार श्रीहनुमान एवं शनिदेव की आराधना- हेतु व्रत किया जाता है। सोमवार को शाम के समय भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करके भोजन करना उपयोगी होता है। अन्य दिन-रविवार और बुधवार को मध्याह्न के पश्चात् एक समय भोजन करना चाहिए। सामान्यत: दूध, फल, साबूदाना, सिंघाड़ा, मखाना आदि सात्विक, सुपाच्य और हल्के पदार्थों का सेवन करना अत्यन्त लाभकारी है। संभव हो तो पूर्ण रूप से निराहार एवं निर्जल व्रत करना चाहिए। अधिकांश व्रतों-त्योहारों में दान करने की परम्परा है। दान का बड़ा महत्त्व है। दान देना व्यक्ति के मानसिक विकास की दृष्टि से और सामाजिक कल्याण की दृष्टि से भी आवश्यक है। चातुर्मास के उपवास और नियम-धर्म इस दृष्टि से भी उपयोगी होते हैं। उपवास और नियम-धर्मों का पालन करने वाले व्यक्तियों का स्वास्थ्य तो उत्तम रहेगा ही, साथ ही उनके व्यक्तित्व का भी विकास होगा।
अत: धार्मिक व्रतों का उचित पालन (आचरण) करने से शारीरिक शुद्धि होकर आध्यात्मिक शांति भी प्राप्त होगी।

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