तीर्थ यात्रा के बिना अंतर्यात्रा अधूरी है

शशिकांत 'सदैव'

29th December 2020

हिन्दू धर्म में तीर्थ यात्रा का खासा महत्त्व है कहते हैं जिसने तीर्थ यात्रा कर ली उसने अपने कष्टों से मुक्ति पा ली पर क्या तीर्थ यात्रा कर आने मात्र से ही हमें उसका फल मिल जाता है? आइए जानते हैं लेख से-

तीर्थ यात्रा  के बिना अंतर्यात्रा  अधूरी है

कहा जाता है कि तीर्थ यात्रा से मनुष्य अपने पापों से मुक्ति पा लेता है। तीर्थ स्थल की पवित्रता में इतना बल होता है कि उसकी यात्रा एवं दर्शन मात्र से ही मनुष्य अपनी बाधाओं एवं कष्टों से तर जाता है, अपने कर्मों के बंधन से मुक्त होकर, पवित्र होकर लौटता है। तभी तो ऐसे पावन स्थलों को तीर्थ कहा जाता है। यदि यह सत्य है तो कृष्ण की गीता का क्या होगा? कर्म फल यदि तीर्थ यात्रा से कट जाएं तो सबक कैसे मिलेगा? जागरण कैसे संभव होगा? क्योंकि गीता कहती है मनुष्य को उसके कर्मों का फल अवश्य मिलता है जिसका भुगतान एवं प्रायश्चित उसे करना ही पड़ता है। हम जैसे कर्म करते हैं वैसा ही फल भोगते हैं। गंगा नहाने से शरीर तो स्वच्छ हो सकता है मन नहीं। उस मन का क्या करें जहां से सारे भाव पैदा होते हैं? जो सब परिणामों का कारक है? मन पर नियंत्रण का अर्थ है इंद्रियों पर नियंत्रण और जिसने इंद्रियों को जीत लिया या उन पर काबू पा लिया, वह स्वत: ही तर जाता है, मोक्ष को उपलब्ध हो जाता है। वह स्वयं में जीता-जागता, चलता-फिरता तीर्थ हो जाता है फिर गंगा कहीं बाहर नहीं भीतर ही बहती है। अंतर्यात्रा ही तीर्थ यात्रा बन जाती है और स्वयं का दर्शन ही तीर्थ दर्शन यानी प्रभु का दर्शन बन जाता है।

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जब भी हम तीर्थ शब्द सुनते हैं तो मन में स्वत: ही आस्था एवं श्रद्धा का भाव उमड़ आता है तथा आंखों के सामने किसी पवित्र घाट, नदी, मंदिर एवं भक्तों के समूह का दृश्य चित्रित हो जाता है। जहां हजारों की तादाद में लोग इस आशा से आते हैं कि वह पाप मुक्त हो जाएंगे। अगर कहीं उद्धार संभव है तो यहीं तीर्थ स्थल पर ही है। जाने-अनजाने कैसे भी कर्म कर लो उनके परिणाम से बचने के लिए तीर्थ यात्रा या दर्शन सरल एवं कारगर उपाय है। कुछ लोग तो यहां तक मानते हैं कि तीर्थ यात्रा से मोक्ष भी संभव है। ऐसे कृत्य से भगवान प्रसन्न रहते हैं।

मुक्त होने के लिए तीर्थ को माध्यम न बनाएं, कोशिश करें कि तीर्थ जाने की जरूरत ही न पड़े। क्योंकि तीर्थ जाकर लोग स्नानादि तो कर आते हैं, परंतु उनके विचार, उनका स्वभाव, उनका मन एवं आत्मा सब कुछ ज्यों का त्यों रह जाते हैं। फिर तीर्थ पर जाकर कितना भी दान किया जाए, वह तब तक व्यर्थ है जब तक स्वयं का कोई आत्म दान न हो। सारी पूजा-अर्चना, दान-स्नान आदि तब तक व्यर्थ हैं जब तक स्वयं का आत्म जागरण के प्रति कोई योगदान न हो। तीर्थ से तन का मैल तो हट जाता है मन का मैल नहीं हटता। वह तब तक जमा रहता है जब तक हम बाहर, संसार की दौड़ एवं होड़ में लगे रहते हैं। नजर स्वयं पर हो, ध्यान स्वयं के कर्मों पर हो तो ही तरा जा सकता है, पापों से मुक्त हुआ जा सकता है।

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तीर्थ जाओ, अवश्य जाओ, परंतु वहां से खाली मत लौटो, नए संकल्प लेकर लौटो। वहां की पवित्रता से भीतर के जगत को परिवर्तित करो। वहां की शांति एवं ऊर्जा से मन को नहलाओ। वहां के अनुभव एवं सत्संग को आत्म रूपांतरण में लगाओ। पाप करने के लिए तीर्थ यात्रा नहीं होती कि पहले तो दुष्कर्म कर लिया फिर उसके फल से बचने के लिए तीर्थ पर चले गए।

अपनी त्रुटियों से सबक लेना, उनको आगे पुन: न दोहराना तथा अपने किए हुए कर्मों का खुली आंख से प्रायश्चित करना, स्वयं को तन-मन एवं वचन तीनों से सद्कर्म में लगाना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। और जिस दिन ऐसा होता है तब पूरा शरीर अंगूठे से सर तक स्वयं तीर्थ बन जाता है। शरीर एक मंदिर बन जाता है और मनुष्य स्वयं परमात्मा हो जाता है। तभी तो संत कबीर दास जी कहते हैं-

'मो को कहां ढूंढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।

ना मैं मंदिर, ना मैं मस्जिद, ना काबा कैलास में।।

कहीं भगवान है तो वह हमारे अंदर ही है, कहीं शांति है तो वह हमारे भीतर ही है। बाहर घूमकर मन को क्षण भर का सुकून मिल सकता है परंतु शोश्वत आनंद का बीज तो इस देह में ही व्याप्त है।

शास्त्रों में लिखा है कि मानव शरीर पांच तत्त्वों से बना है और वही पांच तत्त्व इस सृष्टि में विद्यमान हैं। स्वयं भगवान शब्द भी इन पांच वस्तुओं से बना है भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, (अ) से अग्नि और न से नीर (पानी)। तो फिर जिन चीजों से संसार बना है, सृष्टि बनी है वही सारी चीजें मनुष्य में भी विद्यमान हैं। इन पांच तत्त्वों में जिस तरह पानी धरती पर अधिक मात्रा में पाया जाता है उसी तरह मानव शरीर में भी पानी अधिक मात्रा में पाया जाता है। दोनों का अनुपात बराबर है। सृष्टि का ही अंग है मनुष्य। फिर नहाने के लिए बाहर की गंगा में क्या जाना स्वयं को दया एवं करुणा के सागर में परिवर्तित करना ही तीर्थ के समान है। होम कुंड में हवन सामग्री को क्या जलाना? यदि स्वयं में क्रोध और ईर्ष्या की लपटें जलती रहें। धरती पर मीलों की यात्रा या चढ़ाई करने से क्या फायदा, यदि धरती की तरह स्वयं को सहनशील एवं उत्पत्तिदायक नहीं बनाया? आकाश की ओर हाथ उठाकर दुआ या माफी मांगने का क्या प्रयोजन, यदि अपने भीतर के अनंत आकाश को न छुआ हो। हवा में मंत्र जाप करने का लाभ तभी होगा जब मन हवा की तरह हल्का एवं निर्भार होगा क्योंकि तनाव एवं चिंताओं से परिपूर्ण मन से तथा कर्म फल से बचने के डर से मंत्रों का उच्चारण करना बेकार है। इसीलिए शरीर की प्राणवायु पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है।

मनुष्य का पूर्ण शरीर तीर्थ है। सर से पांव तक, पंच तत्त्वों का बना शरीर बिना किसी मिलावट के पवित्र एवं पूजनीय है। जो जातक चोर या डाकू बनते हैं उनके पास भी यही शरीर होता है। सभी के पास शरीर होता है, सभी के अंदर ऊर्जा होती है फर्क है तो मात्रा का ऊर्जा के प्रयोग का। जो लोग स्वयं के महत्त्व को समझते हैं वह स्वयं से प्रेम करना जानते हैं और जो लोग स्वयं से प्रेम करते हैं वह जानते हैं परमात्मा कहीं दूर नहीं स्वयं में ही है। इसके लिए किसी मंदिर की सीढ़ियां साफ करने की आवश्यकता नहीं मन को साफ करने की जरूरत है। घर से भागकर, कहीं दूर जाकर स्वयं को कष्ट देने की आवश्यकता नहीं। सभी स्वर्ग, सभी तीर्थ  स्वयं में विद्यमान हैं। तीर्थ यात्रा अंतर्यात्रा के बिना अधूरी है और अंतर्यात्रा बिना इस शरीर के असंभव है। पहचानों अपने शरीर को, पूजा अपने आपको, प्रेम करो स्वयं से तब तुम पाओगे तुम ही तीर्थ हो कहीं और जाने की जरूरत नहीं।

यह भी पढ़ें -राम मंदिर की बनावट क्यों है खास, बनने के बाद दिखेगा ऐसा

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