हम नित्य नवीन हों

देवप्रिया सिंह

7th January 2021

जीवन में नवीनता का अर्थ क्या है नित्य नवीनता, नित्यनूतन सकारात्मकता। उस परमात्मा के उद्देश्य को पूर्ण करना जिसने बड़े प्रेम से सृष्टि और मनुष्य की रचना की है, इस शरीर में सब कुछ होते हुए भी प्राण निकलने पर इस शरीर में दुर्गंध आने लगती है।

हम नित्य नवीन हों

अगर हम एक पेंटिंग बनाते है तो हम कितने खुश होते है यदि कोई पेंटिंग खराब कर दे तो हमें कितना बुरा लगता है। हम सब ईश्वर की बनाई हुई एक सुन्दर कृति है हम जब बुरे कर्म करते हैं तो उस परमेश्वर को कितना दुख होता होगा, नवीन हम तभी बनेंगे जब हम नकारात्मक विचार त्यागेंगे और जीवन के सकारात्मक उद्देश्य को आत्मसात करेंगे।

महात्मागांधी ने कहा है-

'जीवन समस्त कलाओं से श्रेष्ठï है मैं तो जानता हूं जो अच्छी तरह जीना जानता है वही सबसे सच्चा कलाकार है।'

हमारे ऋग्वेद में कहा गया है-

'कद्व ऋतं कद्नृतक्व प्रत्ना'

'क्या उचित है क्या अनुचित यह निरंतर विचारों।'

मनुष्य किसी भी वस्तु को लेकर अहंकार करता है यही उसकी सबसे बड़ी अज्ञानता है, सत्कर्म ही नवीन और सार्वभौमिक है।

सिकन्दर महान के जीवन की घटना है-

विश्व विजेता सिकन्दर का जुलूस जा रहा था वह अपने विजय के अहंकार में अंधा होकर उन्मत भाव से आगे बढ़ता जा रहा था। सिकन्दर को यह अहंकार हो गया कि उसने समस्त विश्व को जीत लिया है उसके सामने से ही कुछ फकीरों की टोली उधर से जा रही थी उन फकीरों ने सिकन्दर का ना कोई अभिवादन किया और न ही उसके विजयोत्सव में कोई सक्रियता दिखायी यह देखकर सिकन्दर को बड़ा क्रोध आया वह उन फकीरों के पास पहुंचा उसने कहा 'मैं विश्वविजेता सिकन्दर हूं तुमने मेरा स्वागत क्यों नहीं किया? फकीरों ने हंसकर कहा कौन विजेता कैसा विजेता समस्त संसार का विजेता तो ऊपर बैठा हुआ है क्या तुमने उसे भी जीत लिया है, तुम जिस अहंकार के वशीभूत होकर उन्मत भाव से चल रहे हो वह तो हमारे चरणों का दास है तुम तो क्षण मात्र की भी हमारी बराबरी नहीं कर सकते' सिकन्दर को अपनी भूल का एहसास हुआ उसने उन फकीरों से क्षमा मांगी।

कहते हैं सोना आग में ही तपकर कुन्दन बनता है मनुष्य के जीवन में यदि परिस्थितियों की उथल-पुथल न हो तो मनुष्य का व्यक्तित्व कुन्दन नहीं बनता।

नवीन वह है जो हमेशा सीखने की क्षमता रखता हो यदि हम एक फूल को देखें तो चाहे वह देवता के चरणों में चढ़ाया जाए या किसी शव पर, चाहे वह मिट्टी पर ही गिरा हो या वरांगना के गजरे में गूथा जाए परंतु अपनी प्रवृत्ति नहीं छोड़ता वह सुगन्ध बिखेरता ही रहता है, परंतु मनुष्य की प्रवृत्ति बदल जाती है अपने क्षुद्र स्वार्थों के कारण इसीलिए मनुष्य पर इतने सारे मुहावरे बन गये आस्तीन का सांप, गिरगिट की तरह रंग बदलना। मनुष्य कभी यह विचार नहीं करता ईश्वर ने अत्यन्त सूक्ष्म अन्वेषण एवं बड़े ही पवित्र प्रेम से पंच तत्त्वों से निर्मित इस शरीर का निमार्ण किया होगा। संसार में जितने भी प्राणी हैं मनुष्य उन सब से परे हैं। गिरगिट का बच्चा गिरगिट, सांप का बच्चा सांप होता है परन्तु मनुष्य की प्रजाति में हिरण्यकश्यप जैसे दैत्य के घर में प्रह्लïाद भी उत्पन्न होता है, पुलस्त्य ऋषि के कुल में रावण जैसा दुराचारी भी जन्म लेता है।

मनुष्य की वर्तमान जीवनशैली बड़ी व्यस्त है परंतु मनुष्य में कहीं न कहीं संवेदनाएं बची हैं, जीवन में हर पल नवीन ढंग से जीना चाहिए। हमें जीवन के किसी भी क्षण का सकारात्मक ढंग से चिन्तन करना चाहिए। समुद्रमंथन से अमृत और विष दोनों निकला था, अमृत किन-किन देवताओं ने पीया हम सभी के नाम नहीं जानते पर जगत कल्याण के लिए भगवान शंकर विष पीकर नीलकंठ बन गये।

मनुष्य के जीवन में साहित्य का विशेष महत्त्व है साहित्य एक चिकित्सक की भांति है जो हमारे बुरे विचारों का इलाज कर जीवन में नैतिक मूल्यों का संचार करता है।

विश्व विजेता सिकन्दर के जीवन का एक प्रसंग है-

सिकन्दर के पास ईरान का एक दूत पेटी लेकर आया उसने कहा 'ये पेटी विशेष तौर पर आपके लिए भेजी गई है इसमें जो आपकी सबसे अमूल्य वस्तु हो उसमें रख दीजिए' सिकन्दर के दरबारियों ने राय दी कि इसमें आप अपना खजाना रख दें सिकन्दर ने कहा 'जिस खजाने को पाने के लिए मैंने लाखों घर उजाड़े हों वह खजाना मेरे लिए अमूल्य कैसे हो सकता है?' फिर उसके मंत्रियों ने राय दी कि इसमें आप अपनी तलवार रख दें जिसके द्वारा आपने विश्व विजय प्राप्त की है सिकन्दर ने कहा 'जिस तलवार से मैंने लाखों लोगों का खून बहाया जिसमें न जाने कितनी आहें छुपी हों वह तलवार भला अमूल्य कैसे हो सकती है?'

इस पेटी में मैं होमर के प्रसिद्ध ग्रंथ इलियड को रखता हूं। ये अमूल्य है ये है साहित्य की महत्ता। 

कई बार हम गलत रास्तों पर चल पड़ते हैं और इस आत्मग्लानि से जलते रहते है  कि हम चाह कर भी जीवन का सकारात्मक सदुपयोग नहीं कर सकते परंतु हर रात के बाद एक नयी सुबह आती है।

एक बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है-

अष्टïछाप के प्रसिद्ध संत कवि कृष्णदास एक बार किसी मित्र से मिलने आगरा गये सड़क पर उन्हें एक स्त्री का मधुर गान सुनाई पड़ा वे उस ओर आकृष्टï हो गये वे उस ओर चल दिए जहां से वह स्वर आ रहा था, वह एक वेश्या थी उसका पूरा गीत सुनने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि इसकी संगीत साधना अनुपम है इसे श्रीनाथ जी के पदों में समर्पित करना चाहिए जैसे ही गीत समाप्त हुआ वह सज्जन पुरुष को देख सामने बोली भगवान आप इस पतिता के यहां कैसे?

उन्होंने कहा 'यदि तुम श्रीनाथ जी के सामने नृत्य गान करोगी तो तुम्हें मुंहमांगा धन मिलेगा', एक भटकी हुई जीवात्मा ने प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया, स्नान के पश्चात वीणा उठाकर मंदिर गई, वीणा बजी उसके कंठ से निकले स्वरों ने उपस्थित जन-जन को रुला दिया स्वर थे-

मेरो मन गिरिधर छवि पे अटक्यो, सजल श्याम धन विरन लीन है फिर चित्त अनतन भटक्यौं? उसने प्रभु के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया जीवन कभी भी बदल सकता है बस जब हमें सकारात्मक आचरण की चेतना जागरूक कर दे। यही जीवन की नवीनता है। 

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