जादुई चिराग - गृहलक्ष्मी लघुकथा

मीरा जैन

7th April 2021

पिछले कई वर्षो से रत्ना और राजेश की तू-तू, मैं-मैं पर अचानक विराम लग गया आये दिन विवाद, राजेश को रत्ना से कुछ न कुछ शिकायत रहती ही थी जिनकी परस्पर आंख-आंख नही बनती वे अब हाथो में हाथ डाले घूमते नजर आ रहे थे।

जादुई चिराग  - गृहलक्ष्मी लघुकथा

वाणी में भी मधुरता और एक दूसरे के प्रति आदर के भाव, यह देख अडोसी-पड़ोसी, मोहल्ले वाले आश्चर्चचकित थे कथित दम्पत्ति में आये इस अभूतपूर्व परिवर्तन को जानने की जिज्ञासा हर किसी को थी अंतत: रत्ना की सहेली लक्ष्मी ने पूछ ही लिया-

'क्या बात है रत्ना! जब से तू मायके से आई है तब से राजेश जीजाजी बिल्कुल बदल गये हैं एकदम सीधे ही नही चलते, बल्कि तेरी पूछ-परख भी बहुत कर रहे हैं। तू मायके से ऐसा कौन सा जादुई चिराग लेकर आई है। मुझे भी बता, मै भी दिन भर इनकी खींच-तान और टोका-टाकी से बहुत परेशान हूँ।'

 रत्ना ने हंसते हुए कहा-

'वो जादुई चिराग तुझे मिलने में अभी समय लगेगा'

आश्चर्य मिश्रित मुद्रा में लक्ष्मी के नयन पसर गये। मुंहसे बरबस ही निकल पड़ा-

 'क्यों?'

'क्योकि! अकेले घर में क्या करते, आनन-फानन में वे भी चले गये अपने चिराग के घर रहने और चिराग तले अंधेरा, तेरा चिराग अभी कुवांरा है।'

यह भी पढ़ें -तोहफा - गृहलक्ष्मी लघुकथा

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