मोक्ष - गृहलक्ष्मी लघुकथा

विभा रानी श्रीवास्तव

16th April 2021

21.09.2017 आज न जाने ऐसा क्या हुआ जब से उसे पढ़ाने बैठा तो पढ़ाने में मन नहीं लग रहा था। हर क्षण यही मन होता उसके रूप-सौंदर्य का पान करता रहूँ... मेरी यह स्थिति देखकर उसने मुझे टोका, - 'सर! लगता है आज आपका मूड ठीक नहीं है... तो आज छोड़ दीजिए..,'

मोक्ष - गृहलक्ष्मी लघुकथा

'नहीं! नहीं!! ऐसा न करें। आज कुछ इधर-उधर की बातें करें...' 'तो ठीक है कोई कहानी सुना दीजिये!' मेरा मन खट्टा हो गया।

09.10.2017 कई दिनों के पश्चात आज न जाने क्यों मन बार-बार बेचैन हो रहा है कि उससे अपने प्यार का इज़हार कर ही दूँ.... मुझे ऐसा लगता है वह भी मुझे प्यार करती है.... कहने से शायद डरती है.... समझ में नहीं आता क्या करूँ...? इसी उधेड़बुन में आज फिर उसे ठीक से पढ़ा नहीं सका.... वह कुछ कहना चाहती थी शायद, मगर कह न सकी....

05.05.2018 आज जैसे ही मैं पढ़ाने बैठा... उसने एक प्लेट में मिठाइयाँ लाकर मेरे सामने रख दीं.... मैं समझा शायद रिजल्ट अच्छा आया है.... पास होने की इतनी मिठाई... एक दो पीस बर्फी का ही काफी था.... उसने शर्मीली मुस्कान छोड़ते हुए बहुत धीमे से कहा, 'मैं जिस लड़के से प्यार करती थी... उसी से मेरी शादी तय हो गयी है....' इतना सुनते ही मैं 'बधाई' शब्द तक नहीं कह पाया और मिठाई मुझे ऐसी लगी... जैसे मैं ज़हर खा रहा हूँ।

19। 10। 2018 उसकी शादी के बाद आज उससे, उसके पति के साथ पहली भेंट हुई। सिंदूर-खेला के बाद दोनों मेरे चरण छूकर आशीष लेने आये थे। उसके दीप्त चेहरे से प्रेमन् रागात्मक वृत्ति का संचार हो रहा था। दूर कहीं रावण पुतले को जलाया जा रहा था। और अब मेरे अंदर में बसा ज़हर बह रहा था। वासनात्मक अवस्था से भावात्मक अवस्था में आया हुआ राग ही वास्तव में अनुराग है। असीम शांति फैल रही थी... अब मैं अनुरागी था।

यह भी पढ़ें -जादुई चिराग - गृहलक्ष्मी लघुकथा

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