मनुष्य जाति के पहले मनोवैज्ञानिक- बुद्घ

चंद्रमोहन

12th May 2021

बुद्ध पहले मनुष्य हैं तथा मनुष्य जाति के पहले मनोवैज्ञानिक हैं। जिन्होंने मनुष्य का रोग क्या है? मनुष्य का रोग कहां है? मनुष्य दुखी क्यों है? आदि प्रश्नों का उत्तर दिया। बुद्ध ने इसको अविष्कृत किया इसका कारण जाना तथा निदान भी किया।

मनुष्य जाति के पहले मनोवैज्ञानिक- बुद्घ

बुद्ध ने मानव की मनोवृत्ति में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए अपने उपदेशों को गाथाओं के माध्यम से तत्कालीन जनभाषा का प्रयोग कर सही मार्ग प्रस्तुत किया? उनका ऐसा ही एक प्रसंग आइए जानते हैं:सेतव्य नगर के दो व्यापारी चूलकाल और महाकाल भगवान बुद्ध के पास जाकर प्रव्रजित (संन्यस्त) हो गए। महाकाल जो बड़ा था, प्रव्रजित होने के बाद थोड़े ही दिनों में अर्हत्व पा लिया था। किंतु चूलकाल प्रव्रजित होने पर भी उसका मन गृहस्थी और काम भोग विलास की सोच में ही लगा रहा। एक समय भगवान उनके साथ जब सेतव्य नगर गए, तब चूलकाल को स्त्रियों ने पकड़कर श्वेत वस्त्र पहना दिए।

दूसरे दिन महाकाल को भी वैसा ही करना चाहा जैसा चूलकाल के साथ किया लेकिन महाकाल अपने बुद्धिबल से निकल आए। भिक्षुओं ने ऐसा देखते हुए भगवान से पूछा तब भगवान ने कहा, भिक्षुओं, चूलकाल उठते-बैठते शुभ ही शुभ देखता विचारता था, जैसे कि झरने के तट पर कोई दुर्बल वृक्ष हो, किंतु शुभ देखते हुए विचरने वाला महाकाल शैल पर्वत के समान अचल है। कहकर इन गाथाओं को कहा-

सुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु असंवुतं। भोजनम्हि अमत्तमञ्ञु कुसीतं हीनवीरियं। तं- वे पसहति मारो वातो रूख्खं व दुब्बल॥

अर्थ- शुभ ही शुभ देखते हुए विहार करने वाले, इद्रियों में असंयत, भोजन में मात्रा न जानने वाले, आलसी और उद्योग हीन पुरुष को मार वैसे ही गिरा देता है, जैसे वायु दुर्बल वृक्ष को।

असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवुतं। भोजनम्हि च मत्तञ्ञुं सद्धं आरद्धवीरियं। तं वे नप्पसहति मारो वातो सेलं व पब्बतं॥

अर्थ- अशुभ देखते हुए विहार करने वाले, इन्द्रियों में संयत, भोजन में मात्रा जानने वाले, श्रद्धावान और उद्योगी पुरुष को मार वैसे ही नहीं डिगा सकता, जैसे शैल-पर्वत को।

व्याख्या- उपरोक्त बुद्ध के वचन उनके मनोविज्ञान की आधार शिलाएं हैं उपरोक्त गाथाओं में बुद्ध ने पांच दुर्गुणों-विषय रस भोगों को शुभ समझना, इन्द्रियों का असंयत होना, भोजन की मात्रा न जानना, आलसी होना तथा उत्साहहीन होना। इन पांच दुर्गुणों में उलझा मनुष्य मार के द्वारा, मनोविकारों द्वारा अर्थात् अकुशल प्रवृत्तियों द्वारा मारा जाता है। जैसे दुर्बल वृक्ष को आंधी रौंद देती है। वैसे ही उपरोक्त पांचों दुर्गुण मनुष्य को पीड़ामयी स्थिति में पहुंचा देते हैं। मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि विषय में रस है या रस-विषय में या मनुष्य की अपनी धारणा में? इस अनिर्णय की स्थिति के कारण मनुष्य विषय भोगों को शुभ ही शुभ देखता हुआ अविद्या के गर्त में फंस जाता है और दुखी होकर पीड़ा का भागी बनता है। जब मनुष्य को विषय भोग आकर्षक लगने लगते हैं तो स्वभावत: उसकी इन्द्रियां असंयत यानी चंचल हो जाती हैं और जब व्यक्ति को विषय-भोग विवेक की दृष्टि से तुच्छ दिखने लगते हैं तो उसकी इन्द्रियां अपने आप संयत हो जाती हैं।

 

जो व्यक्ति भोजन पर संयम नहीं रख पाता वह मन को क्या साध सकता है। अपर्याप्त भोजन आलसी बनाता है। अत: भोजन वही ठीक है जो स्वच्छ, सात्विक और सुपाच्य हो, और उसे कड़ी भूख लगने पर संतुलित मात्रा में लिया जाए। कुसीत होना यानी आलसी होना भी दुर्गण है। जो मनुष्य आलसी है वह भौतिक उन्नति नहीं कर सकता, ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक साधना या उन्नति क्या कर सकेगा? अत: किसी भी क्षेत्र में उन्नति के लिए आलस्यहीन तथा उद्योगशील होना आवश्यक है। आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है। आलस्य असंयत जीवन का परिणाम हैं। हीनवीर्य होना यानी उत्साहहीन होना। जिस व्यक्ति में उत्साह नहीं वह इस संसार पर एक प्रकार बोझ है। वह सेवा, स्वाध्याय और साधना से मन चुराएगा और ऐसे व्यक्ति की जीवन-ऊर्जा उसके अपने भीतर ही संघर्षरत रहेगी। बुद्ध ने कहा है कि, 'यह संसार अनित्य है परिवर्तनशील है, क्षणभंगुर है।

जिस व्यक्ति की यह समझ में आ गया कि विषयों में रस नहीं है- वह इन्द्रिय संयमी होगा और जो संतुलित भोजन करेगा वह सुख से रहेगा और साधना में आगे बढ़ेगा। जब तक व्यक्ति में उद्देश्य प्राप्ति के लिए श्रद्धा तथा मनोबल नहीं होगा तब तक उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा, साधना सफल नहीं होगी। यदि व्यक्ति श्रद्धावान और मनोबली है तो उसे साधना एवं उद्देश्य की प्राप्ति में शीघ्र सफलता प्राप्त होती है।

यह भी पढ़ें -अपनी शिक्षा से दिखा रही हैं समाज को रास्ता

धर्म -अध्यात्म सम्बन्धी यह आलेख आपको कैसा लगा ?  अपनी प्रतिक्रियाएं जरूर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही  धर्म -अध्यात्म से जुड़े सुझाव व लेख भी हमें ई-मेल करें-editor@grehlakshmi.com

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

पुनर्जन्म का...

पुनर्जन्म का सिद्घांत - परमहंस योगानंद

रहिमन प्रीति...

रहिमन प्रीति सराहिए मिले होत रंग दून

कैसे करें जी...

कैसे करें जीवनदायी तत्त्वों की साज-संभाल...

ईशान कोण की ...

ईशान कोण की उपयोगिता

पोल

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत किस देश से हुई थी ?

वोट करने क लिए धन्यवाद

इंग्लैण्ड

जर्मनी

गृहलक्ष्मी गपशप

बच्चे के बार...

बच्चे के बारे में...

माता-पिता बनना किसी भी वैवाहिक जोड़े के लिए किसी सपने...

धन की बरकत क...

धन की बरकत के चुंबकीय...

पैसे के लिए पुरानी कहावत है जो आज भी सही है कि "बाप...

संपादक की पसंद

परिवार के सा...

परिवार के साथ करेंगे...

कोरोना काल में हम सभी ने अच्छी सेहत के महत्व को बेहद...

इन डीप नेक ब...

इन डीप नेक ब्लाउज...

यूं तो महिलाएं कई तरह के वेस्टर्न वियर को अपने वार्डरोब...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription