क्या महत्वाकांक्षाएँ तोड़ती हैं रिश्तों की डोर

मोनिका अग्रवाल

13th June 2020

देखा जाय तो रिश्तों की धुरी "स्त्री" है.स्त्री से ही परिवार बनता है.नाते रिश्ते बनते हैं,बढ़ते हैं. एक समय था,परिवार की स्त्री एक धुरी से बंधी भी रहती थी और सबको बांधे भी रहती थी.पर आज स्त्री ख़ुद आगे बढ़कर नारी मुक्ति के नारे लगाने लगी है.वो जो रिश्ते सहेजती थी,आज ख़ुद तोड़ने को आतुर है रिश्तों की डोर

क्या महत्वाकांक्षाएँ तोड़ती हैं रिश्तों की डोर

 

रिश्ते यानी सम्बंध,एक मीठा एहसास,एक वचन,एक कर्तव्य या एक सुरक्षा.बहुत कुछ छिपा हुआ है इस एक शब्द में.इनका अपना महत्व है,अपनी ज़रूरत है,अपनी गरिमा है.सास-ससुर,ननद-भाभी,देवर-भाभी,पति-पत्नी,सभी अलग-अलग रिश्ते हैं,अलग अलग एहसास,अलग अलग जज़्बात,लेकिन न जाने क्यों आजकल इन रिश्तों का महत्व कम हो रहा है?धूमिल हो रही है रिश्तों की गरिमा .
देखा जाय तो रिश्तों की धुरी "स्त्री" है.स्त्री से ही परिवार बनता है.नाते रिश्ते बनते हैं,बढ़ते हैं. एक  समय था,परिवार की स्त्री एक धुरी से बंधी भी रहती थी और सबको बांधे भी रहती थी.पर आज स्त्री ख़ुद आगे बढ़कर नारी मुक्ति के नारे लगाने लगी है.वो जो रिश्ते सहेजती थी,आज ख़ुद तोड़ने को आतुर है रिश्तों की डोर
इसके लिए अन्य कारणो के अलावा स्त्रियों की महत्वाकांक्षाएँ भी उत्तरदायी हैं.इसमें बुराई नहीं है.ये तो उनकी बौद्धिक क्षमता,प्रतिभा और क़ाबलियत की निशानी है,पर क्या इसके लिए रिश्तों को दाँव पर लगाना ज़रूरी है?क्या महत्वकांक्षा की पतंग घर की छत से नहीं उड़ाई जा सकती?क्या रिश्तों की रेशमी चादर ओढ़ कर सपने सच नहीं हो सकते?क्या ये रूपहली चादर फेंक कर ही उन्नति की राह पर आगे बढ़ा जा सकता है?इस संदर्भ में बम्बई की डॉक्टर नानकी भाटिया कहती हैं,
"मुझे नहीं लगता है कि महत्वाकांक्शा से रिश्तों पर कोई फ़र्क़ पड़ता है.हाँ,एक महत्वाकांक्षी या कामकाजी स्त्री की जिम्मेदारियाँ ज़रूर बढ़ जाती हैं या यू कहें कि उसकी स्तिथी एक सधे रस्से पर फूँक फूँक कर क़दम बढाते  नट जैसी होती है,ज़रा सी नज़र हटी या ध्यान बँटा तो बस....."
           यानी उसे ज़्यादा सावधान,धैर्यवान,चुस्त,संतुलित होना चाहिए,स्त्री को घर व बाहर दोनों जगह अच्छा ख़ासा तारतम्य बिठाना पड़ता है,जो वो थोड़ी सी सूझ बूझ से बिठा सकती है,पर जब ऐसा नहीं होता,कोई एक पक्ष घर या बाहर उनके लिए ज़्यादा प्रबल हो जाता है तो समस्या होती है और जब बाहर का पक्ष उनके लिए प्रमुख हो जाता है तो घर का पक्ष प्रभावित होता है,जिसमें रिश्ते भी शामिल हैं."
परिवेश भी है ज़िम्मेदार-
अक्सर रिश्ता तय करते समय भावी वधु के घरवाले उसके ऊँचे पद और उसकी ऊँची पगार के बारे में सुनकर बहुत ख़ुश होते हैं,पर वही लोग कुछ दिन बाद उसकी नौकरी को लेकर नाराज़ रहने लगते हैं और उनकी नाराज़गी उसकी  हर चीज़ को लेकर ज़ाहिर की जाती है,यहाँ तक कि पति के बर्ताव से भी शादी के बाद वाली वो नरमी चली जाती है .
इसकी सबसे बड़ी वजह है स्त्री की पारम्परिक छवि और नए दौर में उभरे उसके व्यक्तित्व के बीच टकराव.आई. पी कॉलेज की भूतपूर्व मनोविज्ञान की प्रवक्ता वीना गुप्ता मानती हैं कि,अभी तक हमारे समाज में स्त्री की भूमिका की अच्छे ढंग से व्याख्या नहीं हो पाई है .उसके लिए इस सारे ढाँचे के पुनर्निर्माण की ज़रूरत है .जहाँ परिवार के लोग व वे लोग,जिनसे रिश्तों की डोर जुड़ी है,समझदार हैं,खुले विचारों के हैं,सहयोगी प्रवत्ति के हैं,वहाँ रिश्ते बदस्तूर चलते हैं,पर जहाँ ऐसा नहीं होता,वहाँ महत्वाकांक्षी या कामकाजी स्त्रियों पर जिम्मदारियां और भी अधिक हो जाती हैं और उनसे अपेक्षाएँ भी अधिक.ऐसी स्तिथी में रिश्ते टूटें या ना टूटें,भावनात्मक रूप से ज़रूर कुछ छूट जाता है.
                         फिर भी महत्वकांक्षा कोई बुरी चीज़ नहीं है.महत्वकांक्षा आदमी को जीने के लिए शक्ति प्रदान करती है और फिर आज के व्यस्त भागते-दौड़ते जीवन में रिश्तों का प्रगाढ़ होना सिर्फ़ रोज़ मिलना या दिखावा ही क्यों? रिश्ते अगर मन के धरातल पर हैं,तो कोई उन्हें तोड़ नहीं सकता और अगर रिश्तों की डोर इतनी कमज़ोर,इतनी बारीक है तो फिर वे रिश्ते,रिश्ते नहीं,पानी के बुलबुले हैं
      प्रवक्ता वीना गुप्ता का मानना है,कि महत्वाकांक्षा किसी के भी व्यक्तित्व के विकास के लिए ज़रूरी है,चाहे वो स्त्री हो या पुरुष.महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व में ही सम्भावनाएँ होती हैं,ऐसा व्यक्तित्व ही निखरता है.हाँ ,महत्वाकांक्षा की अति,चाहे वो स्त्री की हो या पुरुष की,दोनों के लिए नुक़सानदायक है.
   "जहाँ तक रिश्तों की बात है,रिश्तों को ढोने का उत्तरदायित्व सिर्फ़ स्त्री का ही क्यों है,पुरुष क्यों नहीं ?"
कहती है IIT दिल्ली की एक असिस्टेंट प्रोफेसर,जिनका हाल ही में विवाह सम्पन्न हुआ है ,"पुरुष क्यों नहीं ये उत्तरदायित्व निभाता?एक महत्वाकांक्षी पुरुष ,"मुझे कुछ कर दिखाना है"अपनी ज़िम्मेदारियों व अपेक्षाएँ से विमुख हो सकता है,व्यस्तता का जामा पहन कर छोटे छोटे सुख-दुःख से उदासीन हो सकता है,पर यहीं जब स्त्री,"मुझे कुछ करना है"के पथ पर अग्रसर होना चाहती है तो ,उसकी राह में जगह जगह कर्तव्य,ज़िम्मेदारी,फ़र्ज़ के तथाकथित रोड़े क्यों अटकाए जाते हैं. जब पुरुष के मामले में घर वाले सहयोग देते हैं,तो सम्बंधित लोग वो ही सहयोग स्त्री को क्यों नहीं देते ?यही कारण है कि महत्वाकांक्षी स्त्री को थोड़ा हठीला  होना पड़ता है."
सही भी है .यदि पुरुष की तरह एक महत्वाकांक्षी स्त्री को भी समर्थन दिया जाय तो ,नि:संदेह न रिश्तों की डोर टूटेगी और न महत्वाकांक्षा की.
        लेकिन बारीकी से विश्लेषण किया जाय तो पुरुषों में भी,जो आज सफल हैं,किसी भी क्षेत्र में,उनके पारिवारिक पहलू चटके हैं,दरके हुए हैं उनके रिश्ते.उनका परिवार उनसे संतुष्ट नहीं रहता.इसी तरह से अगर एक स्त्री महत्वाकांक्षी है ,कुछ करना चाहती है,तो बहुत से लोग उससे भी असंतुष्ट होंगे,पर क्या इसका मतलब रिश्तों की डोर टूट गई?कदापि नहीं .
                रिश्ते घर से शुरू होते है और "घर "घरवाली से बनता है,जब तक स्त्री घर से जुड़ी रहती है,अनेक रिश्ते आबाद रहते हैं,अनेक नए रिश्ते जन्म लेते हैं.जब स्त्री बच्चे को जन्म देती है,तभी एक पुरुष पिता बनता है और स्त्री माँ और बहुत से सम्बंधित लोग नाना-नानी,दादा-दादी वग़ैरह बनते हैं.जहाँ तक स्त्री के सम्बंध में सामाजिक ढाँचे के पुनर्निर्माण का सवाल है,सामाजिक ढाँचे को बदला जा सकता है ,पर ईश्वर के बनाए गए नियमों में फेरबदल कौन कर सकता है?
         डॉक्टर नानकी कहती हैं," स्त्रियों में अगर महत्वकांक्षा हो तो अपना मूल्य चुकाना पड़ता है,वो चाहे रिश्तों के रूप में ही क्यों न हो ?देखा जाय तो पुरुष रिश्तों के लिए ज़िम्मेदार कभी था ही नहीं,वो तो रिश्तों की इकाई भर है.रिश्तों की लड़ी की पुरुष सिर्फ़ एक कड़ी है,एक महक और स्त्री वो मज़बूत डोरी है,जिसमें एक एक मनका पिरोया जाता है.अगर डोरी ही न रहेगी या कमज़ोर होगी और टूटेगी तो मनके तो बिखरेंगे ही लड़ी भी टूट जाएगी."
प्रक्रतिदत्त ईश्वर द्वारा दिए गए  अधिकार स्त्री के लिए बोझ नहीं वरदान हैं.उनके लिए किसी वाद विवाद का प्रश्न ही नहीं उठता
अगर पुरुष आकाश है तो स्त्री धरती. बादल का कोई टुकड़ा ऊपर से गिरता है,तो धरती उसे सहेज भी लेती है,पर जब धरती फटती है तो कहीं कोई सहेजने वाला नहीं होता.
अतः ज़रूरत है सूझबूझ की,विवेक की,बहुत सी सहनशीलता की और साथ में एक मज़बूत व पक्के इरादे की.इन सब के साथ अगर स्त्री अपने सपनों की डगर पर आगे बढ़ेगी तो न ही रिश्तों की डोर टूटेगी और न ही महत्वकांक्षा की डोर हाथ से छूटेगी.
यह भी पढ़ें-

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

क्यों बदल गए...

क्यों बदल गए प्यार के मायने

इन सर्दियों ...

इन सर्दियों में धूप के साथ लाएं रिश्तों में...

जरूरी है सुह...

जरूरी है सुहागरात की प्लानिंग

राशि के अनुस...

राशि के अनुसार चुनें अपना जीवनसाथी

पोल

आपकी पसंदीदा हिरोइन

गृहलक्ष्मी गपशप

पहली बार घर ...

पहली बार घर रहे...

लाॅकडाउन से पहले अक्षय कुमार की फिल्म सूर्यवंशी रीलीज़...

अनलाॅक 2 में...

अनलाॅक 2 में 31...

मिनिस्ट्री आफ होम अफेयर्स ने कहा है कि जो डोमैस्टिक...

संपादक की पसंद

गुरु एक सेतु...

गुरु एक सेतु है,...

गुरु तो एक सेतु है, एक संभावना है। गुरु एक तरह की रिक्तता...

दिल जीत लेंग...

दिल जीत लेंगे जयपुर...

जयपुर को गुलाबी शहर कहा जाता है लेकिन ये महलों का शहर...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription